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शाहजहांपुर: जहां फिजाओं में गूंजती हैं काकोरी के अमर शहीदों की गाथाएं

शाहजहांपुर के रहने वाले शहीद अशफाक उल्ला खान, शहीद पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और ठाकुर रोशन सिंह ने आजादी के लिए हंसते हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था. 

शाहजहांपुर: जहां फिजाओं में गूंजती हैं काकोरी के अमर शहीदों की गाथाएं
अशफाक उल्‍लाह खां, राम प्रसाद बिस्मिल, रोशन सिंह (बाएं से दाएं). (फाइल फोटो)

शाहजहांपुर (संवाददाता - शिव कुमार): 'सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है. देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है .' यह लाइनें उन अमर शहीदों की जुबान से निकली हैं जिन्होंने देश की आजादी के खातिर फांसी के फंदे को चूम लिया. हम बात कर रहे हैं शाहजहांपुर के रहने वाले शहीद अशफाक उल्ला खान, शहीद पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और ठाकुर रोशन सिंह की. शाहजहांपुर के रहने वाले इन शहीदों पर यहां के लोग फक्र महसूस करते हैं.

अशफाक उल्ला खान एक ऐसे अमर शहीद हैं जिन्होंने पूरे देश में हिंदू मुस्लिम एकता की मिसाल पेश की है.उनकी राम प्रसाद बिस्मिल से दोस्ती की आज भी इस नगरी में कसमें खाई जाती है . 

अमर शहीद अशफाक उल्ला खान का जन्म मोहल्ला एमन जई जलाल नगर में 22 अक्टूबर 1900 में हुआ था. अशफाक उल्ला खान से जुड़ी तमाम यादें आज भी उनके परिवार के पास एक धरोहर के रूप में रखी हुई है. जेल में उनके हाथों से लिखी गई एक डायरी और अपनी मां को लिखी गई कई चिट्ठियां इस बात को बयां करती है कि वह अपनी मां को बहुत प्यार करते थे. 

अशफाक उल्ला खान और पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की दोस्ती पूरे देश में हिंदू मुस्लिम एकता की मिसाल पेश करती है . आज इन अमर शहीदों के बलिदान पर उनका परिवार खुद पर फक्र महसूस करता है . उन्हें इस बात पर गर्व है कि उन्होंने ऐसे परिवार में जन्म लिया है जिन्हें आज पूरा मुल्क सलाम करता है.

घर के पास में ही अशफ़ाक़ उल्ला की मजार बनी हुई है . जहां हर राष्ट्रीय त्योहार पर उनकी शहादत के लिए उन्हें सलामी दी जाती है . 

वहीं शहर के बीचो बीच में अशफ़ाक़ उल्ला खान, पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और शहीद ठाकुर रोशन सिंह की प्रतिमा है जो हर वक्त देश के लिए उनकी कुर्बानी को याद दिलाती है . यहां के एवीरिच इंटर कॉलेज में पंडित राम प्रसाद बिस्मिल एक ही क्लास में पढ़ाई करते थे. काकोरी कांड में 17 दिसंबर 1927 को अशफाक उल्ला खान, शहीद पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और ठाकुर रोशन सिंह को फांसी दे दी गई थी. 

आज शाहजहांपुर को इन्हीं शहीदों के नाम से एक पहचान मिली है . यही वजह है कि शहीदों के नगरी के लोग ऐसे अमर शहीदों पर गर्व महसूस कर रहे हैं और उनके नक्शे कदम पर चलने की बात कर रहे हैं.