इस गांव में किसानों के खेत में फसल नहीं 'कार' खड़ी हो रही है, जानिए इसके पीछे की कहानी

 जलेल पंचायत के जलेल गांव में कभी हरी भरी फसल उगती थी लेकिन अब यहां कुछ ही खेतों में फसल नजर आ रही है. 

इस गांव में किसानों के खेत में फसल नहीं 'कार' खड़ी हो रही है, जानिए इसके पीछे की कहानी

मोहित प्रेम शर्मा/ शिमला: भारत में किसानों के समृधी की बाते और दावे किए जाते हैं. कहा जता है की किसान खुशहाल हैं तभी डेढ़ भी खुशाली की ओर आगे बढेगा लेकिन जिला शिमला की जलेल पंचायत में किसानों की खुशहाली वाले तमाम दावों की पोल यहाँ की स्थिति को खो. जलेल पंचायत के अधिकतर किसानों ने खेती छोड़ दी है और अपने खेत को एक कार कम्पनी को किराय पर दे दी हैं. किसानों का कहना है की साल भर की मेहनत के बाद जंगली जानवर उनकी फसल को पूरी तरफ से तबाह कर देते हैं जिससे उनको सिर्फ और सिर्फ नुकसान उठाना पड़ता है लेकिन अब उनके खेतों में कार कम्पनी के हज़ारों नए वाहनों की पार्किंग उन्हें थोड़ा सहारा दे रही हैं.

शिमला- चंडीगढ़ नेशनल हाइवे पर सती जेलेल पंचायत में दाखिल होने पर यहां के किसानों की असल स्थति को समझ में आती है. जलेल पंचायत के इस जलेल गाँव में कभी हरी भरी फसल लहलाती थी लेकिन अब यहाँ कुछ ही खेतों में थोड़ी थोड़ी फसल ही नजर आ रही है.

किसान परिवार खेती-बाड़ी को छोड़ चुके हैं
शिमला शहर से मात्र 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित जलेल पंचायत में अब लगभग हर किसान परिवार खेती-बाड़ी को छोड़ चुके हैं. इसकी वजह इलाके में जंगली जानवरों का वो डर है जो पिछले कुछ सालों में ही किसानों की आजीविका पर जमकर बरपा है.. कभी यहाँ अधिक फसल की पैदावार हुआ करती थी और उस समय ये इलाका अपने आप में मिसाल कायम किया करता था.

लेकिन आज यहाँ बंदरों , जंगली सूअरों , नील गाए और लंगूरों जेसे जंगली जानवरों का ऐसा आतंक मच चुका है जिससे यहाँ के किसानों ने खेती बाडी को छोड़ने का फैसला किया..अब यहाँ के खेतों में फसलों की बजाए हज़ारों वाहन खड़े हैं जो एक कार कम्पनी ने इन किसानों से सस्ती दरों पर मासिक किराए के रूप में लिए हैं.

किसानों को यहाँ इस नई गाड़ियों को पार्क करने की एवज में कार बिक्री कम्पनी 3000 हज़ार रूपए प्रति माह से लेकर 20 हज़ार रूपए प्रतिमाह देती है. ये गाड़ियां शिमला, सिरमौर और सोलन में चार बिक्री कम्पनी के शो रूम ले जाई जाती हैं.

किसान खेतों को दे रहे किराए पर 
अब किसानों को ये सौदा घाटे का नहीं लग रहा है. गाँव के किसानों का कहना है की जहां उन्हें एक पैसे की आमदन नहीं हो पा रही है तो वहीँ अपने खेत किराए पर देने से वो कम से कम अपने परिवार का गुजर बसर कर रहे हैं. किसानों का कहना है की साल भर की कड़ी मेहनत और फसलों पर पैसा खर्च करने के बाद भी उनके हाथ खाली के खाली हैं ऐसे में खाली खेतों में वाहनों के लिए किराया आना उनके लिए एक बहुत बड़ी राहत है. 

इनका ये भी कहना है की की ये भले ही उनकी मजबूरी हो लेकिन अपने परिवार का जिम्मा उठाने के लिए उनके पास कोई और विकल्प था ही नहीं .. सरकार सिर्फ उनके उत्थान की बाते करती हैं लेकिन अपनी बातों को भी वो भूल चुकी है.