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भगवान राम ने रखी थी इस मंदिर की आधारशिला, सूर्य के बाल रूप की होती है पूजा

सूर्य मंदिर होने के वजह से यहां पर सदियों से सूर्य षष्ठी के दिन भव्य मेले का आयोजन होता है. जो एक सप्ताह तक चलता है.

भगवान राम ने रखी थी इस मंदिर की आधारशिला, सूर्य के बाल रूप की होती है पूजा
मंदिर प्रांगण में सूर्य कुंड बना हुआ है. मान्यता है कि इस सूर्य कुंड में स्नान करने से कई बीमारियां दूर हो जाती हैं.

मऊ: उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के ऐतिहासिक सूर्य मंदिर का पौराणिक महत्व है. ऐतिहासिक साक्ष्यों और पुराणों के अनुसार मऊ का यह सूर्य मंदिर देश के पांच बड़े सूर्य मंदिरों में से एक है. मान्यता है कि त्रेतायुग में भगवान राम नें यहां पर सूर्य मंदिर की आधारशिला रखी थी. वहीं, पुराणों में लिखित कथाओं के अनुसार, इस मंदिर के बारे में जानकार बताते है कि यह मंदिर पांडवों के काल का है. यह स्थान देवल मुनि के आश्रम के रुप में भी पूरे देश में ख्याति प्राप्त है. इसी के चलते इस स्थान को देवलास कहा जाता है.  इस मंदिर में भगवान सूर्य के बाल रुप की पूजा की जाती है.

सूर्य मंदिर होने के वजह से यहां पर सदियों से सूर्य षष्ठी के दिन भव्य मेले का आयोजन होता है. जो एक सप्ताह तक चलता है. सूर्य षष्ठी पर लगने वाले मेले में देश के कोने-कोने से श्रद्वालु आते हैं. भगवान भास्कर को नमन कर उनसे आशीर्वाद लेते हैं. मंदिर प्रांगण में सूर्य कुंड बना हुआ है. मान्यता है कि इस सूर्य कुंड में स्नान करने से कई बीमारियां दूर हो जाती हैं.

यह सूर्य मंदिर जनपद मु्ख्यालय से तीस किमी दूर मोहम्मदाबाद तहसील के देवलास गांव में स्थित है. यह स्थान महर्षि देवल मुनि की तपोस्थली भी रही है. जनश्रुतियों के अनुसार देवल मुनि ब्रम्हा के पुत्र दक्ष प्रजापति के पुत्र थे. त्रेतायुग में अयोध्या के महाराज दशरथ के राज्य की पूर्वी छोर की सीमाएं यहां लगती थीं. भगवान राम ने वनगमन के दौरान पहले दिन इसी स्थान पर रुककर विश्राम किया था और सूर्य की उपासना की थी. इसे बालार्क सूर्य मंदिर के नाम से भी जाना जाता है. भगवान राम के वनगमन के दौरान पहले दिन यहां रुकने का प्रमाण वाल्मीकि रामायण से मिलता है. भगवान राम तमसा नदी के किनारे अपने पहले पड़ाव पर रुके थे. हालांकि, जनश्रुतियों में इसे पांडवयुगीन भी कहा जाता है.