आज से शुरू हो रहा है झंडा मेला, दर्शन के लिए देश-विदेश से पहुंचे लाखों श्रद्धालु

दोपहर 2 बजे के बाद झंडे जी के आरोहण की प्रक्रिया शुरू की जाएगी और करीब 4 बजे लाखों श्रदालुओं की मौजूदगी में झंडे जी को दोबारा स्थापित किया जाएगा.

आज से शुरू हो रहा है झंडा मेला, दर्शन के लिए देश-विदेश से पहुंचे लाखों श्रद्धालु
350 सालों से हो रहा है झंडे जी का आरोहण

देहरादूनः 25 मार्च को देहारादून का ऐतिहासिक झंडा मेला शुरू हो रहा है. करीब 350 साल पुराने झंडे मेले के इतिहास में ही देहरादून के जन्म की कहानी जुड़ी है. होली के पांचवे दिन गुरु राम राय के जन्म दिवस पर झंडा मेला शुरू होता है, जो करीब एक महीने तक चलता है. झंडा मेला में इस साल करीब दस लाख से अधिक श्रद्धालु पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड से पहुंचेंगे. 25 मार्च को सुबह करीब 6 बजे दरबार साहिब के बाहर स्थित झंडे जी को उतारा जाएगा उसके बाद झंडे जी को दूध, दही और पवित्र गंगा जल से नहलाया जाएगा और गुरु राम राय दरबार साहिब के महंत श्री देवेंद्र दास महाराज की मौजूदगी में झंडे जी को नहलाया जाएगा. दोपहर 2 बजे के बाद झंडे जी के आरोहण की प्रक्रिया शुरू की जाएगी और करीब 4 बजे लाखों श्रदालुओं की मौजूदगी में झंडे जी को दोबारा स्थापित किया जाएगा.

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350 साल पुराना है झंडा मेला का इतिहास
झंडा मेला आज से करीब 350 साल पुराना है. सिक्खों के 7वें गुरु हरराय महाराज के जेष्ठ पुत्र गुरुराम राय बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे और जन्म के बाद से ही कई चमत्कार दिखाने शुरू कर दिए. उस दौर में मुगल शासक औरंगजेब भी गुरु राम राय के चमत्कारिक शक्तियों के कारण उनके अनुयायियों में शामिल थे. गुरु राम राय ने जब उत्तराखंड का रुख किया तो औरंगजेब ने टिहरी नरेश को जमीन देने का आदेश दिया. टिहरी नरेश ने देहरादून के पास स्थित 7 गांवों की जमीन गुरुराम राय को दान में दे दी और इसी जगह पर वर्तमान देहरादून स्थित है. देहरादून में गुरु राम राय ने दरबार साहिब और अपना निशान झंडे जी को स्थापित किया. 1675 में देहराखास गांव के पास गुरुराम राय ने डेरा डाला तो तभी ये इसे देहरादून कहा जाने लगा.

The Jhanda Mela is starting from today in Dehradun

आज भी साझा चूल्हे में भक्तों के लिए बनता है खाना
गुरु राम राय ने जब देहरादून में दरबार साहिब की स्थापना की तो उसी समय दीन, दुखियों और गरीबों के सेवा शुरू कर दी और साझा चूल्हा बनाया गया जहां कोई भी आए वो भूखा ना जाए. तब से लेकर आज तक साझा चूल्हा गरीबों और जरूरतमंदों के लिए लंगर चला रहा है. वर्तमान में मेला शुरू होने के बाद करीब 7 जगहों पर लंगर चलाये जा रहे हैं.

हिन्दू, मुस्लिम और सिक्ख सम्प्रदाय की एकता की मिसाल है झंडा मेला
झंडा मेला उत्तर भारत का प्रसिद्ध मेला है ये केवल सिक्ख सम्प्रदाय ही नही बल्कि हिन्दू और मुश्लिम के धर्म के श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. दरबार साहिब और गुरुराम राय के प्रति क्रूर मुगल शासक औरंगजेब की भी आस्था जुड़ी है. दरबार साहिब के दीवारों पर मुगलकालीन वित्त चित्र आज भी कौमी एकता की मिसाल है. मेलाधिकारी के एक जुयाल ने कहा की दरबार साहिब के झंडा मेला देहरादून के साम्प्रदायिक सौहार्द की अनोखी मिसाल है. उन्होंने कहा कि 350 साल पहले इस मेले में दुकानदार जिस दुकानें जिस जगह पर लगाते थे उनके वंशज उसी जगह पर दुकानें लगाते है.

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दरबार साहिब में होती है भक्तों की हर मुराद पूरी
देहरादून के प्रति झंडे जी और दरबार साहिब की ख्याति सात समंदर तक फैली है. गुरु राम राय की चमत्कारिक शक्तियों और परोपकारी कार्यों के कारण ही उनके अनुयाही दुनियाभर में मौजूद हैं. दरबार साहिब में दर्शन और मन्नते मांगने के लिए देश भर से भक्त यहां पहुंचते हैं. अम्बाला से झंडा मेले में पंहुचे सतीश प्रजापति की दरबार साहिब में अटूट आस्था है. वे कहते है कि उनके एक बेटे की मृत्यु हो गई थी और उसके बाद वे काफी दुख में थे, लेकिन जब दरबार साहिब में आये तो उसके बाद उन्हें दोबारा पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई और उसके बाद से उनकी आस्था और बढ़ गई.