उत्तर प्रदेश में नरेंद्र मोदी के आगे धरी रह गई प्रशांत किशोर की रणनीति

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन को मिली करारी शिकस्त को चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर से भी जोड़कर देखा जा रहा है. प्रशांत किशोर वही शख्स हैं जिनकी रणनीति के चलते 2014 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनाई. भाजपा की ऐसी हवा चली कि उसने 282 सीटों पर कब्जा जमा लिया, लेकिन हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर की रणनीति फेल हो गई.

उत्तर प्रदेश में नरेंद्र मोदी के आगे धरी रह गई प्रशांत किशोर की रणनीति
पीएम नरेंद्र मोदी के आगे फेल प्रशांत किशोर की रणनीति

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन को मिली करारी शिकस्त को चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर से भी जोड़कर देखा जा रहा है. प्रशांत किशोर वही शख्स हैं जिनकी रणनीति के चलते 2014 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनाई. भाजपा की ऐसी हवा चली कि उसने 282 सीटों पर कब्जा जमा लिया, लेकिन हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर की रणनीति फेल हो गई.

इतना ही नहीं लोकसभा चुनाव के बाद प्रशांत की लोकप्रियता में जबर्दस्त इजाफ हुआ और यही वजह रही कि बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान नीतीश कुमार ने उन्हें चुनाव की बागडोर सौंप दी. परिणाम जदयू के पक्ष में आया औप इस तरह से प्रशांत किशोर को चुनावी जीत का चाणक्य समझा जाने लगा. लेकिन उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव ने इस सभी गणित और दावों को झुठला दिया. 

अखिलेश यादव और राहुल गांधी के गठबंधन को महज 53 सीटों से संतोष करना पड़ा. जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा गठबंधन 325 सीटें लाने में कामयाब हो गई. पंद्रह साल के बाद प्रदेश में भाजपा का वनवास ख़त्म हुआ और करीब 35 साल बाद ऐसा मौका आया जब किसी पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 300 से ज़्यादा सीटें जीती.      

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एक राष्ट्रीय दैनिक अख़बार को दिए साक्षात्कार में प्रशांत किशोर ने उत्तर प्रदेश में हार का ठीकरा कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर फोड़ा. उन्होंने कहा, 'मुझे उत्तर प्रदेश में स्वतंत्र तरीके से काम नहीं करने दिया गया. कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने मेरी बात नहीं मानी'. उन्होंने साफ-साफ शब्दों में कहा कि अगर मेरी रणनीति में कोई कमी होती तो कांग्रेस प्रचंड बहुमत से पंजाब विधानसभा चुनाव में जीतकर नहीं आती. 

गौरतलब है कि पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 77 सीटें अपनी झोली में डाल ली, जबकि भाजपा-शिरोमणि अकाली दल को 18 और आम आदमी पार्टी को महज़ 22 सीटों से संतोष करना पड़ा. 

कांग्रेस की पीके पर निर्भरता: कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी संभालते हुए प्रशांत किशोर ने राज्यभर में राहुल गांधी की रैलियां करवाई. दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस की वरिष्ठ नेता शीला दीक्षित को उत्तर प्रदेश के लिए मुख्यमंत्री पद का उम्मीवार बनाया जाना भी इसी रणनीति का एक हिस्सा था. राहुल गांधी की खाट सभा का आयोजन को भी पीके के दिमाग की उपज माना जाता है. यहां तक कि चुनाव से ठीक पहले भाजपा को मात देने के लिए समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन प्रशांत किशोर की सबसे बड़ी चाल रही, लेकिन ये सारी रणनीति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के आगे धरी की धरी रह गई.    

समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन: कांग्रेस ने सपा के साथ 105 सीटों पर समझौता किया था. पूरे दो महीने तक दोनों पार्टियों का प्रचार चला. इस दौरान अखिलेश यादव और राहुल गांधी ने चार संयुक्त रैली को संबोधित किया, जबकि चार शहरों में साथ-साथ रोड-शो करते नज़र आए.