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मायावती के कार्यकाल में चीनी मिलों की बिक्री में घोटाले की जांच करेगी सीबीआई

अधिकारियों ने बताया कि 2011-12 में मायावती के कार्यकाल के दौरान चीनी मिलों की बिक्री से सरकारी खजाने को कथित तौर पर 1,179 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था.

मायावती के कार्यकाल में चीनी मिलों की बिक्री में घोटाले की जांच करेगी सीबीआई
प्रतीकात्‍मक फोटो

नई दिल्ली: सीबीआई ने यूपी के मुख्यमंत्री के तौर पर मायावती के कार्यकाल के दौरान 21 सरकारी चीनी मिलों की बिक्री में हुई कथित अनियमितता की जांच शुरू की है, जिससे बसपा सुप्रीमो की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. अधिकारियों ने बताया कि 2011-12 में मायावती के कार्यकाल के दौरान चीनी मिलों की बिक्री से सरकारी खजाने को कथित तौर पर 1,179 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था.

उन्होंने कहा कि सीबीआई ने कथित अनियमितताओं की जांच के लिए एक प्राथमिकी दर्ज की है और छह प्रारंभिक जांच (पीई) शुरू की है. सीएम योगी आदित्यनाथ ने इस घोटाले की जांच कराने के लिए सीबीआई को 12 अप्रैल 2018 को पत्र लिखा था. इसमें कहा गया था कि प्रदेश की जो भी 21 चीनी मिलें बीचे गईं, वह सब फर्जी दस्तावेजों के आधार पर बनाई गईं बोगस कंपनियों ने खरीदीं. जो चीनी मिलें खरीदी गईं उनमें से देवरिया, बरेली, लक्ष्मीगंज, हरदोई, रामकोला, चित्तौनी और बाराबंकी की बंद पड़ी सात चीनी मिलें भी शामिल थीं.

खजाने को हजारों करोड़ का चूना लगाया गया
भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक(सीएजी) की रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन 35 चीनी मिलों को बसपा सरकार ने औने-पौने दामों में बेचकर सरकारी खजाने को हजारों करोड़ का चूना लगाया, उनकी मूल्यांकन प्रक्रिया अत्यंत त्रुटिपूर्ण थी. यह मूल्यांकन प्रक्रिया विभिन्न चीनी मिलों  की संपत्तियों को भी चीनी मिलों के साथ खरीदारों को भारी एवं अनुचित लाभ देने के उद्देश्य से बनाई गई थीं. दरअसल यह सारा खेल मायावती सरकार के चहेते शराब माफिया पोंटी चड्ढा ग्रुप को लाभ पहुंचाने के लिए खेला गया. यहां तक कि टैक्‍स काटने के बाद भी फायदे में चल रही तीन चीनी मिलों बिजनौर, बुलंदशहर एवं चांदपुर को बेच दिया गया.

चीनी मिलों की बिक्री में नियमों का उल्‍लंघन
सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश सरकार ने चीनी मिलों की बिक्री में केन्द्र सरकार द्वारा निर्धारित विनिवेश नीति का उल्लंघन किया. चीनी मिलों की भूमि के अलावा संयंत्र, मशीनरी व फैक्ट्री के भवनों, चीनी गोदामों के साथ रिहायशी आवासों और अन्य अचल संपत्तियों के मूल्यांकन में भारी धांधली की गई. मूल्यांकन में बिना कारण बताए भूमि के मूल्य में और भवनों में 25 प्रतिशत की छूट दी गई. सर्किल रेट को अनदेखा करने के कारण स्टांप ड्यूटी में चोरी से 600 करोड़ से अधिक की क्षति हुई.

जरवलरोड, सहारनपुर एवं सिसवां बाजार चीनी मिलों ने 2008-09 में तथा खड्डा चीनी मिल ने वर्ष 2009-10 में लाभ अर्जित किया था, लेकिन इन्हें भी बेच दिया गया. इसके बावजूद संयंत्र चीनी मिल की मशीनरी और संयंत्रों का स्क्रैप के रूप में मूल्यांकन किया गया. यह भी नहीं बताया गया कि इन चीनी मिलों के संयंत्र एवं मशीनरी को किस आधार पर स्क्रैप मानकर मूल्यांकन किया गया. दस चीनी मिलों की अनुमानित कीमत के बदले इनके संयंत्र और मशीनरी को स्क्रैप में रूप में मूल्यांकन करने से 82.08 करोड़ की क्षति हुई.

अमरोहा की चीनी मिल, जिसकी प्रतिदिन उत्पादन क्षमता 3000 टन की है, वह वेब लिमिटेड को 17.10 करोड़ में बेची गई, जबकि उस मील के अंदर रखी चीनी और  शीरा का मूल्य ही 13.64 करोड़ का था. इस तरह 30.4 एकड़ जमीन तथा चल-अचल सम्पत्ति का निर्धारण केवल 4.07 करोड़ रुपए ही आंका गया. अमरोहा चीनी मिल शहर में स्थित है, उसका क्षेत्रफल 76 एकड़ है, जिसमें 4 बड़े बंगले, 6 कालोनियां और 20 अन्य क्वाटर्स हैं. डीएम सर्किल रेट के अनुसार केवल जमीन का दाम 250 करोड़ रुपए है.

जनपद बिजनौर की चीनी मिल जो 84 एकड़ क्षेत्रफल में है, उसको पीबीएस फूड्स लिमिटेड को मात्र 101 करोड़ में बेच दिया गया. चीनी मिल के अंदर रखे सामान की कीमत ही 71.38 करोड़ रुपए आंकी गई थी. इसका मतलब जमीन और बाकी शेष चीजों का दाम 10.5 करोड़ ही लगाया गया. जनपद बहराइच के जरवल रोड स्थित चीनी मिल जो 94 एकड़ क्षेत्रफल में फैली है, जो इंडियन पोटास लिमिटेड को मात्र 26.95 करोड़ रुपए में बेच दी गई. मिल के अंदर रखी चीनी और शीरा का दाम ही केवल 32.05 करोड़ रुपए निकलता. इसका मतलब यह हुआ कि जमीन और बाकी शेष कीमती सामान आदि और 5.0 करोड़ रुपया लगभग मुफ्त उपहार स्वरूप दे दिया गया. बरेली, देवरिया, बाराबंकी, हरदोई की बंद पड़ी चीनी मिलें भी औने-पौने दामों में बेच दी गईं.

चीनी निगम की बिड़वी चीनी मिल 35 करोड़ में बेच दी गई, जबकि इसकी अनुमानित कीमत 503 करोड़ थी. इसी तरह कुशीनगर को खड्डा इकाई को 22 करोड़ में बेचा गया, जबकि अनुमानित कीमत 175 करोड़ थी. बुलंदशहर की चीनी  मिल 29 करोड़ में बेची गई, जबकि इसकी अनुमानित कीमत 175 करोड़ थी. इसी तरह रोहनकला, सरवती तंडा, सिसवा बाजार, चांदपुर और मेरठ की चीनी मिलें  औने-पौने दामों में बेच दी गई हैं. नेकपुर की चीनी  मिल को 14 करोड़ में बेचा गया, जबकि सर्किल दर के अनुसार इसकी कीमत 145 करोड़ है. इसमें स्क्रैप ही 50 करोड़ का था. लगभब 41 एकड़ क्षेत्र में फैली घुघली  चीनी  मिल की कीमत 100 करोड़ से ज्यादा है, इसे मात्र पौने चार करोड़ में बेचा गया.

कैसे हुआ घोटाला
सारा घोटाला सम्पत्तियों के मूल्यांकन के दौरान ही किया गया था. इस तरह कुल 35 सरकारी चीनी मिलों को मायावती सरकार ने अपने चहेते ग्रुप को लाभ पहुंचाने के लिए गैरपारदर्शी ढंग से बेचा और सरकारी राजस्व को लगभग 25 हजार करोड़ का चूना लगाया. सीएजी रिपोर्ट में चीनी मिलों के मूल्यांकन में हेराफेरी और मनमाने ढंग से मूल्यांकित मूल्य में कमी करने, मूल्यांकन में सर्किल रेट के आधार पर आंकलन ना करने, गैरपारदर्शी तरीके से नीलामी और टेंडर प्रक्रिया में हेराफेरी से हजारों करोड़ के राजस्व हानि की पुष्टि की.

शुरुआत में 6 चीनी मिलें स्‍था‍प‍ित की गईं
उत्तर प्रदेश राज्य चीनी  निगम लिमिटेड की स्थापना 1971 में हुई. 1971 से 1989 में 29 चीनी मिलों को अधिग्रहीत किया गया. 1978 से 1988 तक छह चीनी मिलों स्थपित की गईं. इन 35 चीनी मिलों में पांच चीनी मिलों चीनी निगम की सब्सिडियरी के प्रबंधन में दी गईं. इनमें किच्छा चीनी मिल, नंदगंज व सिरोही चीनी मिलें  छाता चीनी मिल व घाटमपुर चीनी मिल शामिल हैं. शेष 30 कंपनियां चीनी निगम के सीधे नियंत्रण में थीं. मई 1995 में चीनी निगमों को भारी घाटा होने के कारण बीआईएफआर में चली गईं. इसके सुझाव के आधार पर चीनी निगम 11 अच्छी चलने वाली मिलें चलाने का निर्णय लिया गया तथा दस बंद मिलें (इसमें बाराबंकी, बरेली, छितौनी, घुघली, हरदोई, मोहाली, मेरठ, मुंडेरवा, नवाबगंज तथा रामपुर शामिल हैं) तथा आठ बीमार चीनी मिलों (भटनी, भूरवल, देवरिया, रामकोला तथा साहदगंज, बैतालपुर, लक्ष्मीगंज और पिपराइच) को मई 2002 में गठित उत्तर प्रदेश राज्यचीनी एवं गन्ना विकास निगम लिमिटेड को दे दी गई. डोईवाला और किच्छा चीनी मिलों 2002 में उत्तराखंड को दे दी गईं तथा चारचीनी मिलें  नंदगंज, छाता, घाटमपुर और रायबरेली चीनी निगम की सब्सिडियरी के पास रह गईं.

बसपा सरकार के समय बेची गईं चीनी म‍िलें
वर्ष 2009 से चीनी मिलों के विनिवेश के लिए इनके मूल्यांकन की प्रक्रिया शुरू की गई. उत्तर प्रदेश में तीन प्रकार की चीनी मिलों  हैं. सरकारी, प्राइवेट, कोआपरेटिव. शुगर कॉरपोरेशन की 35, शुगर फेडरेशन की 28 और 93 प्राइवेट मिलें हैं. शुगर कॉरपोरेशन तब अस्तित्व में आया जब काफी चीनी मिलो  घाटे में थीं. सन 1971 से 1989 के बीच में उन्हें राष्ट्रीयकृत किया गया. अभी पिछले कई सालों से उत्तर प्रदेश शुगर कॉरपोरेशन की चीनी मिलें  घाटे में चल रही थीं. राज्य की बसपा सरकार ने इसमें अपना निजी स्वार्थ साधने की नियत से और अवैध लाभ कमाने के लिए इन चीनी मिलों को औने-पौने दामों में बेचना शुरू कर दिया. शुरुआती बोली का दौर दिल्ली में पिछले साल सम्पन्न कराया गया. उस दौर में  चीनी  उद्योग से जुड़े कुछ बड़े नाम जैसे बिरला शुगर, डालमियां ग्रुप, सिम्बोली शुगर, धामपुर शुगर, द्वारिका शुगर, उत्तम शुगर, त्रिवेणी शुगर और मोदी शुगर ने बोली में भाग लिया. लेकिन इण्डियन पोटास और वेव इण्डस्ट्री को छोड़कर बाकी शेष बड़े नामों ने खुद को बोली से अलग कर लिया.

आरोप लगा की बसपा सरकार ने सुनियोजित तरीके से अपने चहेते उद्यमी ग्रुप जिसके पास इससे पहले तक केवल एक चीनी  मिल थी, उसी की फंट्र कम्पनीज के पक्ष में नीलामी स्वीकार की. जो नीलामी की गई, उसमें जो बोली लगाई गई या लगवाई गई वह दिखावा मात्र थी क्योंकि चीनी मीलों  की जमीन की कीमत से भी कम बोली लगी थी. आरोप है कि बाकी बोली लगाने वाले जिन्होंने पहले हिस्सा लिया था उनको नीलामी में भाग लेने से रोका गया. जरूरत से कम दामों में बोली लगाने से कुछ खास चहेतों को लाभ पहुंचाकर बोली के न्यूनतम मूल्य से कम की बोली लगवाई गई. जमीन का दाम न के बराबर लगाया गया. उस मिल की मशीनें, भवन, रॉ-मेटेरियल्स तथा आवासीय परिसर की सुविधाओं को भी ध्यान में नहीं रखा गया. उनका मूल्य भी नहीं के बराबर लगाया गया. डिस्काउंट कैश फ्लो मेथड के जरिए इनकेमूल्य का आकलन किया गया. इस तरीके से बोली की शुरुआत ही कम कीमत से हुई. और अपारदर्शी ढंग से बेची गईं चीनी मिलें.