UP: परफॉर्मेंस ग्रांट घोटाले में 5 अफसरों के खिलाफ दर्ज हुआ केस, योगी सरकार सख्त

UP: परफॉर्मेंस ग्रांट घोटाले में 5 अफसरों के खिलाफ दर्ज हुआ केस, योगी सरकार सख्त

एफआईआर के मुताबिक परफॉर्मेंस ग्रांट के लिए ग्राम पंचायतों के चयन के लिए अप्रैल 2016 में निदेशक पंचायती राज की अध्यक्षता में समिति का गठन हुआ था.

UP: परफॉर्मेंस ग्रांट घोटाले में 5 अफसरों के खिलाफ दर्ज हुआ केस, योगी सरकार सख्त

लखनऊ: अब पंचायती राज परफॉर्मेंस ग्रांट घोटाला सामने आया है. मामले में जांच के बाद विजिलेंस ने पंचायती राज्य निदेशालय के डिप्टी डायरेक्टर समेत पांच अफसरों के खिलाफ अलीगंज थाने में धोखाधड़ी, जालसाजी, गबन, आपराधिक साजिश व भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज करवाया है. आरोप है कि इन लोगों ने मिलीभगत कर परफॉर्मेंस ग्रांट के लिए 1,130 अपात्र ग्राम पंचायतों को सूची में शामिल करवा दिया. 14वें वित्त आयोग के तहत वर्ष 2016 में यूपी के 31 जिलों की 1,798 ग्राम पंचायतों को 700 करोड़ रुपये की परफॉर्मेंस ग्रांट दी जानी थी.

विजिलेंस के इंस्पेक्टर अनिल कुमार यादव ने डिप्टी डायरेक्टर गिरीश चंद्र रजक, अपर निदेशक राजेंद्र सिंह, तत्कालीन मुख्य वित्त एवं लेखाधिकारी केशव सिंह, अपर निदेशक शिव कुमार पटेल और सहायक नोडल अधिकारी रमेश चंद्र यादव के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज करवाई है. एफआईआर के मुताबिक परफॉर्मेंस ग्रांट के लिए ग्राम पंचायतों के चयन के लिए अप्रैल 2016 में निदेशक पंचायती राज की अध्यक्षता में समिति का गठन हुआ था.

समिति में अपर निदेशक पंचायती राज और संयुक्त निदेशक सदस्य और मुख्य लेखा एवं वित्त अधिकारी सदस्य सचिव व सदस्य नोडल अधिकारी नामित किए गए थे. जिलों से पात्र ग्राम पंचायतों के चयन की जिम्मेदारी चयन समिति के सदस्य व नोडल अधिकारी गिरीश चंद्र रजक व पटल सहायक रमेश चंद्र यादव को मिली थी. इन लोगों ने करोड़ों की ग्रांट हड़पने के 1,798 की सूची में 1,130 अपात्र ग्राम पंचायतों को सूची में शामिल कर दिया.

कैसे हुआ घोटाला
जिन जिलों में गड़बड़ी पाई गई, वहां के जिला पंचायत राज अधिकारियों की अनुसंशा की गई. ग्राम पंचायतों की कम या ज्यादा की सूची बनाकर निदेशालय को भेज दी गई. गिरीश चंद्र रजक और रमेश चंद्र यादव ने वहां से आई सूची में गड़बड़ी करके उसे चयन समिति के सामने पेश कर दिया. जिसमें पात्र की जगह अपात्र ग्राम पंचायत को परफॉर्मेंस ग्रांट मिल सके.

तत्कालीन अपर निदेशक राजेन्द्र सिंह ने उस पर बिना कोई जांच किये उसे पास कर दिया. तत्कालीन अपर निदेशक शिव कुमार पटेल और तत्कालीन मुख्य वित्त अधिकारी केशव सिंह ने भी बिना कोई जांच पड़ताल किए उसे पास कर दिया, जिससे ग्रांट एप्रूव्ड हो गया.

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