UP के दो मुख्यमंत्रियों के रोचक किस्से: एक खुद को 'चोर' कहता था तो दूसरा चाय-नाश्ते का पैसा खुद भरता था
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UP के दो मुख्यमंत्रियों के रोचक किस्से: एक खुद को 'चोर' कहता था तो दूसरा चाय-नाश्ते का पैसा खुद भरता था

यूपी की राजनीति से जुड़े ऐसे ही दो मुख्यमंत्रियों के रोचक किस्सों को हम बताने जा रहे हैं. पढ़ें...

UP के दो मुख्यमंत्रियों के रोचक किस्से: एक खुद को 'चोर' कहता था तो दूसरा चाय-नाश्ते का पैसा खुद भरता था

नई दिल्ली. उत्तर प्रदेश में 2022 विधानसभा चुनाव को लेकर तैयारियां शुरू हो गईं हैं. चुनाव की तारीखों के एलान से पहले ही नेताओं ने जुबानी जंग छेड़ दी है. इन सबके बीच राजनेताओं के किस्सों की भी चर्चा हो रही हैं. चौराहे पर लोगों के एकत्रित होने पर पॉलिटिकल किस्से शुरू हो जाते हैं. यूपी की राजनीति से जुड़े ऐसे ही दो मुख्यमंत्रियों के रोचक किस्सों को हम बताने जा रहे हैं. पढ़ें...

1- चंद्रभानु जो खुद को बताते थे मैं 'चोर' हूं
चंद्रभानु गुप्ता उत्तर प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री बने. लखनऊ और चंद्रभानु गुप्ता एक दूसरे पूरक रहे हैं. मुख्यमंत्री रहते हुए उनपर जब-जब विरोधियों द्वारा करप्शन का आरोप लगाया जाता था, तब-तब वे सभी आरोपों को हंसकर हवा उड़ा दिया करते थे. आलम यह था कि वह मजाकिया अंदाज में कहा करते थे, कि 'गली-गली में शोर है, चंद्रभानु गुप्ता चोर है'. हालांकि जब उनकी मौत हुई तो उनके अकाउंट में सिर्फ 2 हजार रुपए थे.

लखनऊ से था गहरा नाता
चंद्रभानु गुप्ता का जन्म अलीगढ़ के बिजौली में 14 जुलाई 1902 को हुआ था. पिता हीरालाल समाज सेवक थे. चंद्रभानु का मन भी समाज सेवा में रम गया. इसके लिए वह आर्यसमाज से जुड़ गए थे और आजीवन ब्रह्मचर्य रहे. उनकी शुरुआती पढ़ाई लखीमपुर खीरी में हुई. लखनऊ से उन्होंने वकालत की और यहीं से वकालत शुरू कर दी.

पहली बार 1960 में बने मुख्यमंत्री
चंद्रभानु यूपी के तीन बार मुख्यमंत्री बने थे. पहली बार वह वर्ष 1960 से वर्ष 1963 तक मुख्यमंत्री रहे. वर्ष 1967 के चुनाव में जीतने के बाद वो फिर मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनका कार्यकाल सिर्फ 19 दिनों तक ही रहा. इसके बाद वर्ष 1969 में चंद्रभानु गुप्ता ने एक बार फिर मुख्यमंत्री पद की शपथा ली. 11 मार्च 1980 को उन्होंने इस दुनिया का अलविदा कह दिया.

2- पंडित गोविंद बल्लभ पंत जो अपनी जेब से भरते थे चाय-नाश्ते का पैसा
वर्तमान राजनीति में जहां मुख्यमंत्रियों पर पैसे गबन करने के आरोप लगते हैं. वहीं, एक दौर में एक ऐसा मुख्यमंत्री भी था, जो अपनी जेब से खुद चाय और नाश्ते का पैसा देता है. उस मुख्यमंत्री का नाम डित गोविंद बल्लभ पंत था. दरअसल एक बार पंत जी सरकारी बैठक कर रहे थे. बैठक में चाय-नाश्ते का बिल जब उनके पास आया तो उन्होंने उसे पास करने से मना कर दिया.

इस पर उन्होंने कहा कि सरकारी बैठकों में सरकारी खर्चे से केवल चाय मंगवाने का नियम है. ऐसे में नाश्ते का बिल नाश्ता मंगवाने वाले व्यक्ति को खुद देना होगा. नाश्ते पर हुए खर्च को मैं सरकारी खजाने से चुकाने की इजाजत कतई नहीं दे सकता. उनकी इस बात पर सभी मंत्री चुप हो गए थे. 

सीधी-सादी जिंदगी से उतरकर यूपी की सियासत में आए
उस मुख्यमंत्री का नाम पंडित गोविंद बल्लभ पंत था. पंत पहाड़ की सीधी-सादी जिंदगी से उतरकर यूपी की घाघ सियासत में आए और फिर छा गए. उनका व्यवहार ऐसा था कि विपक्ष भी तारीफ में कसीदे पढ़ता था. अल्मोड़ा में जन्मे गोविंद बल्लभ पंत मूल रूप से मराठी थे.

राजनीति में आने से पहले करते थे वकालत
राजनीति में आने से पहले गोविंद बल्लभ पंत वकालत किया करते थे. एक दिन वह चैंबर से गिरीताल घूमने चले गए. वहां उन्होंने देखा कि दो लड़के स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में चर्चा कर रहे थे. यह सुन पंत ने उन युवकों से पूछा कि क्या यहां पर भी देश-समाज को लेकर बहस होती है? इस पर उन युवकों ने कहा कि यहां बस नेतृत्व की जरूरत है. इस बात को सुनकर पंत इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने वकालत छोड़ राजनीति में आने का फैसला किया.

1921 में आए सक्रिय राजनीति में
1921 में गोविन्द बल्लभ पंत ने सक्रिय राजनीति में पदार्पण किया और लेजिस्लेटिव असेंबली में चुने गए. उस वक्त उत्तर प्रदेश दो हिस्सों में बंटा था. एक को यूनाइटेड प्रोविंसेज ऑफ आगरा और दूसरे को अवध के नाम से जाना जाता था. 1932 में पंत जी एक्सिडेंटली पंडित नेहरू के साथ बरेली और देहरादून जेलों में बंद रहे. उस दौरान ही पंडित नेहरू से  उनकी दोस्ती हो गई. नेहरू से वह बहुत प्रभावित हुए. पंत 1946 से दिसंबर 1954 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. 

हिंदी को दिलाई पहचान
1955 से 1961 के बीच गोविंद बल्लभ पंत केंद्र सरकार में गृह मंत्री रहे. गृह मंत्री रहने के दौरान उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन था. उस वक्त ये आशंका जतायी जा रही थी कि ये देश की एकता के लिए घातक हो सकती है मगर हुआ ठीक इसके उलट. हालांकि उन्हें अगर किसी चीज के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता है तो वह है हिंदी को राजकीय भाषा का दर्जा दिलाने के लिए. 

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