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उत्तराखंड की जागर कला को नई पहचान दिलाने के लिए प्रीतम भरतवाण को मिलेगा पद्मश्री

प्रीतम से पहले 2017 में जागर को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए बसन्ती बिष्ट को भी पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है.

उत्तराखंड की जागर कला को नई पहचान दिलाने के लिए प्रीतम भरतवाण को मिलेगा पद्मश्री
photo : Zee news

देहरादून : उत्तराखंड से इस बार तीन शख्सियतों को पद्म पुरस्कार देने का एलान हुआ है. माउण्ट एवरेस्ट फतेह करने वाली पहली भारतीय महिला बछेन्द्री पाल को पद्म भूषण जबकि प्रसिद्व फोटोग्राफर अनूप शाह और जागर सम्राट प्रीतम भरतवाण को पद्मश्री पुरस्कार देने का एलान हुआ है.

जागर गायिका बसन्ती बिष्ट के बाद प्रीतम भरतवाण को मिलेगा पद्मश्री
प्रीतम भरतवाण को जागर, ढोल सागर और लोक संगीत के संरक्षण और बढ़ावा देने में अहम योगदान निभाने के लिए पद्मश्री पुरस्कार मिलेगा. इससे पहले 2017 में जागर को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए बसन्ती बिष्ट को भी पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है. बसन्ती बिष्ट में गढवाल और कुमाऊं में खत्म हो रही सदियों पुरानी जागर परम्परा को नई ऊंचाईयों तक पहुंचाया. इस बार जागर और ढोल सागर पर शोध कर रहे प्रीतम भरतवाण को पद्मश्री देने का एलान के बाद पूरे प्रदेश में खुशी की लहर है. पद्मश्री बसन्ती बिष्ट ने कहा कि ये सम्मान पहाड़ की गौरवशाली लोकपरम्परा का सम्मान है जो हमारे पूर्वजों ने हमें सौंपा. प्रीतम भरतवाण के साथ कई लोकगीतों को साथ में गा चुकी लोकगायिका मीना राणा कहती है प्रीतम भरतवाण ने पहाड़ के जागरों और पवाडों को लोकगीतों के रुप में गाया जो काफी प्रसिद्ध हुए.

प्रीतम भरतवाण ने दिया जागर को नया कलेवर
प्रीतम भरतवाण को लोक संस्कृति और संगीत को विरासत में मिली. प्रीतम के पिता और दादा भी जागर गायक थे और उन्हें ढोल सागर का काफी ज्ञान था. मात्र 5 साल की उम्र से प्रीतम भरतवाण लोक संगीत को नई ऊचाईयों पर पहुंचा रहे हैं. उत्तराखंड की जागर कला को उन्होंने एक नया रुप और नया कलेवर दिया. पहाड़ की दम तोड़ती जागर विधा को उन्होंने अपनी जादुई आवाज में नई पहचान दी. केवल जागर ही नहीं बल्कि पहाड़ की संस्कृति,रीति रिवाज,परम्पराएं और त्यौहारों को अपनी आवाज में नई लोगों तक पहुंचाया. प्रीतम भरतवाण के साथ कार्य कर चुकी लोक गायिका संगीता ढौंढियाल कहती है कि ये सम्मान पहाड़ के उन कलाकारों का भी है, जो सदियों से ढोल दमाऊ और जागर को गाते आते है. संगीतकार संजय कुमोला कहते हैं, प्रीतम भरतवाण को पद्मश्री मिलने की काफी खुशी है और प्रीतम भरतवाण ने वास्तविक रूप से जमीनी स्तर पर जागर और पवाडों को संरक्षित करने के लिए कार्य किया.

मात्र 5 साल की उम्र से संगीत की सीखना शुरू किया
प्रीतम भरतवाण ने मात्र 5 साल से ही थाली बजाकर पहाडी संगीत को सीखना शुरू कर दिया था. वे ना सिर्फ जागर गाते हैं बल्कि लोकगीत, पवांडा, और लोकगीत भी गाते हैं. प्रीतम लोकगायक ही नहीं बल्कि उच्च कोटि के गीत लेखक भी हैं. प्रीतम ने केवल लोकगीतों को गाया ही नहीं बल्कि पहाड के पारम्परिक वाद्य यंत्रों को बजाने में उन्हें महारत हासिल है. प्रीतम कहते है उन्हें ये कला अपने पूर्वजों से हासिल हुई जो सदियों से ढोल दमऊ को बजाते रहे है. वे ढोल, दमाऊ, हुड़का, डौंर थाली आदि कई लोक वाद्य यंत्रों के वादन में भी दक्ष है. प्रीतम का जन्म देहरादून के रायपुर ब्लॉक के सिला गांव में हुआ था. प्रीतम का जन्म एक औजी परिवार में हुआ है, जिस कारण लोक संगीत उन्हे विरासत में मिला है. उनके घर पर ढोल, डौर, थाली जैसे कई उत्तराखंडी वाद्य यंत्र हुआ करते थे. इसके साथ ही उनके घर में भी संगीत का मौहाल था. उनके पापा और दादा घर पर ही गाया करते थे. पहाड़ में होने वाले खास त्यौहारों में प्रीतम का परिवार जागर लगाया करता था. वहीं से उन्होने संगीत की ट्रेनिंग भी ली. प्रीतम भरतवाण की तीन बेटियां और एक बेटा है. उनकी पत्नी कहती है पद्मश्री पुरस्कार के एलान के बाद उन्हें काफी खुशी हो रही है. उनकी पत्नी रसना देवी पद्मश्री पुरस्कार के एलान के बाद से काफी भावुक है. वे कहती है उन्हें मां भगवती पर पूरा भरोषा था कि उनके पति को पद्मश्री पुरस्कार मिलेगा.

बचपन से ही उन्हें लोक संगीत में काफी रुचि थी
प्रीतम की शुरूवाती शिक्षा गांव के पास ही एक विद्यालय में हुई. संगीत के प्रति रूझान और उनकी कला की पहचान सबसे पहले स्कूल में रामी बारौणी के नाटक में बाल आवाज़ देने से हुई. बचपन में प्रीतम भरतवाण के गुरु उनके पिता हेमदास भरतवाण थे, जिन्होंने उन्हें लोक संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा दी. उसके बाद उन्होने संगीत विद्यालय ऋषिकेश से शिक्षा ग्रहण की. प्रीतम भरतवाण बचपन से ही होनहार बालक थे. उन्होने मसूरी के एक नृत्य नाटक में डांस किया, जिसके बाद स्कूल के शिक्षकों पर उनकी नजर पड़ी. इसके स्कूल के बच्चों के साथ प्रीतम ने प्रिसिंपल की नजर जब प्रीतम पर पड़ी तो वे उनका हुनर पहचान गए. इसके बाद तो उन्हे स्कूल के हर कार्यक्रमों में गाने का मौका मिलने लगा. सबसे खास बात यह रही कि मात्र 12 साल की उम्र में ही उन्होने लोगो के सामने जागर गाना शुरू कर दिया था. इस जागर को गाने के लिए उनके परिवार के जीजाजी और चाचा ने उन्हे कहा था.

लोकसंगीत के लिए यह दौर काफी मुश्किल है: भरतवाण
जब अपने परिवार के लोगो के साथ शादी बारात में जाया करते थे. जहां उनके पिता और चाचा जागर लगाया करते थे. एक दिन जब आधी रात को जागर लगाते समय उनके पिता थक गए तो इसके बाद उनके पिता ने कहा कि प्रीतम अब इसके बाद तुम जागर लगाओं फिर प्रीतम ने ऐसा जागर प्रस्तुत किया सभी मन्त्रमुग्ध हो गए. यही संगीत के क्षेत्र में उनकी पहली परफॉमेंस थी. प्रीतम को पहली सफलता उनकी कैसेंट तौंसा बौं से मिली जो कि रामा कैसेट से रिलीज हुई थी. यह कैसेट 1995 मे निकली थी. इसके साथ ही उन्हे सबसे ज्यादा पॉपुलैरिटी सरूली मेरू जिया लगीगे गाने से मिली.  आज के वक्त में उत्तराखण्ड की संस्कृति प्रीतम भरतवाण के बिना अधूरी सी लगती है. प्रीतम भरतवाण के कई लोकगीत रिलीज हुए, जिन्हें दर्शकों ने काफी पसन्द किया, लेकिन उनका जागर नारैणी ने विदेशों तक में धूम मचा दी. उन्होनें कई लोक गायिकाओं के साथ काम किया है, जिनमें संगीता ढौंढियाल, मीना राणा प्रमुख है. लोकगायक और लेखक जितेन्द्र पंवार ने कहा कि प्रीतम भरतवाण दास समुदाय से आते हैं, जो पहाड़ों में ढोल दमऊ बजाते है. जब समाज और सरकारों की उपेक्षा से दास समुदाय ढोल और दमऊ को बजाने से परहेज कर रहे थे. ऐसे मौके पर प्रीतम भरतवाण ने ढोल-दमऊ को बजाना शुरु किया.

लोक गायक प्रीतम भरतवाण इन दिनों पहाड़ी संस्कृति का झंडा अमेरिका में बुलंद किए हुए हैं. अपने अमेरिका प्रवास में वह  ओहायो की सिनसिनाटी यूनिवर्सिटी में अमेरिकियों को ढोल-दमौं की बारिकियां सिखा रहे हैं. श्री भरतवाण जी के उत्तराखंड के लोक संगीत में  उल्लेखनीय योगदान देखते हुए उन्हें उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय हल्द्वानी कुमायूं ने (डॉक्ट्रेट) मानद उपाधि से गवर्नर के हाथों सम्मानित किया है.