क्या गुमनामी बाबा ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे? जानिए क्या कहती है जांच आयोग की रिपोर्ट

तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद गुमनामी बाबा की जांच रिपोर्ट के लिए जस्टिस विष्णु सहाय आयोग का गठन 2016 में किया था. अब योगी सरकार ने इस रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए सार्वजनिक किया है.

क्या गुमनामी बाबा ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे? जानिए क्या कहती है जांच आयोग की रिपोर्ट
फाइल फोटो.

नई दिल्ली: 23 जनवरी 1897, इसी दिन नेताजी सुभाषचंद्र बोस का जन्म हुआ था. असल मायनों में आजादी के सबसे बड़े नायक सुभाष चंद्र बोस ही थे. वह अंग्रेजों से लड़कर आजादी छीनने के पक्षधर थे. लेकिन नेहरू और गांधी की छत्रछाया में नेताजी का योगदान इतिहास में भुलाने की कोशिश भी की गई है. नेताजी की मौत का रहस्य अब भी बरकरार है. 

क्या नेताजी की मौत 1945 में प्लेन क्रैश में ही हुई थी? इसको लेकर देश विदेश में लगातार खोज चल रही है. कई लोगों का मानना था कि नेताजी जी की मौत प्लेन क्रैश में नहीं हुई. नेताजी गुमनामी बाबा के नाम से यूपी में 1985 तक रह रहे थे. नेताजी पर रिसर्च करने वाले बड़े-बड़े विद्वानों का मानना है कि गुमनामी बाबा ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस थे.

लेकिन इसकी पुष्टि अब तक सरकार की तरफ से नहीं की गई है और ना ही कोई ठोस प्रमाण एैसा सामने आया है. इन सब के बावजूद गुमनामी बाबा को ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस मानने वालों की संख्या हजारों में है. गुमनामी बाबा जो कि अपनी अंतिम अवस्था में यूपी के अयोध्या के राम भवन में निवास करते थे, उनके कई गुण नेताजी सुभाषचंद्र बोस से मिलते थे. उनकी आवाज, उनका ज्ञान, उनका संगीत, सिगार, बंगाली भोजन ये सब नेताजी ये मिलते जुलते थे. 

 

Gumnami baba

जनता की इसी मांग को देखते हुए तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद गुमनामी बाबा की जांच रिपोर्ट के लिए जस्टिस विष्णु सहाय आयोग का गठन 2016 में किया. जस्टिस विष्णु सहाय आयोग का मुख्य काम यह पता लगाना था कि गुमनामी बाबा की असली पहचान क्या है ? क्या गुमनामी बाबा ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस थे? 

तीन साल बाद जस्टिस विष्णु सहाय आयोग ने अपनी रिपोर्ट यूपी विधानसभा में पेश की. इस रिपोर्ट को यूपी सरकार ने स्वीकार कर लिया है. इस रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ ने रिपोर्ट को सार्वजनिक करते हुए लिखा है, 'आयोग द्वारा गुमनामी बाबा उर्फ भगवान जी की पहचान नहीं की जा सकी. गुमनामी बाबा के बारे में आयोग ने कुछ अनुमान लगाए हैं.'

गुमनामी बाबा पर जस्टिस सहाय आयोग का अनुमान 

  • गुमनामी बाबा बंगाली थे.
  • गुमनामी बाबा बंगाली, अंग्रेजी और हिंदी भाषा के जानकार थे.
  • गुमनामी बाबा एक असाधारण मेधावी व्यक्ति थे.
  • गुमनामी बाबा के राम भवन से बंगाली, अंग्रेजी और हिन्दी में अनेक विषयों की पुस्तकें प्राप्त हुई हैं.
  • गुमनामी बाबा को युद्ध, राजनीति और सामयिक की गहन जानकारी थी.
  • गुमनामी बाबा के स्वर में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के स्वर जैसा प्राधिकार का भाव था.
  • गुमनामी बाबा में प्रचंड आत्मबल और आत्मसंयम था.
  • अयोध्या में 10 वर्षों तक गुमनामी बाबा पर्दे के पीछे रहे.
  • पर्दे के पीछे से जो लोग गुमनामी बाबा को सुनते थे, वो सम्मोहित हो जाते थे.
  • गुमनामी बाबा पूजा और ध्यान में पर्याप्त समय व्यतीत करते थे.
  • गुमनामी बाबा संगीत, सिगार और भोजन के प्रेमी थे.
  • गुमनामी बाबा नेताजी सुभाषचंद्र बोस के अनुयायी थे. 
  • लेकिन जिस समय यह बात प्रसारित होनी शुरू हुई कि वो नेताजी सुभाषचंद्र बोस थे, उन्होंने तत्काल अपना मकान बदल लिया.
  • भारत में शासन की स्थिति से गुमनामी बाबा का मोहभंग था.

जस्टिस विष्णु सहाय आयोग का निष्कर्ष
जस्टिस विष्णु सहाय आयोग ने अपने निष्कर्ष में अंतिम में लिखा है गुमनामी बाबा एक मेधावी आदमी थे. उनकी तरह के लोग बहुत ही कम होते हैं. जो अपनी अभिज्ञातता के रहस्य भंग के स्थान पर मृत्यु पसंद करते हैं. लेकिन बड़ी लज्जा का प्रकरण था कि उनका अंतिम संस्कार इस प्रकार आयोजित किया गया कि मात्र 13 व्यक्ति इसमें सम्मिलित हो सके. 

 

Gumnami baba

कैसी विधि की विडिम्बना है. जिससे मना नहीं किया जा सकता कि वह इस धरा से बहुत अधिक सम्मान के साथ विदाई के योग्य थे. कुल मिलाकर अभी भी गुमनामी बाबा की पहचान गुमनाम ही बनी हुई है. क्या केन्द्र या यूपी सरकार गुमनामी बाबा के कमरे से मिले सामान को सार्वजनिक करेगी? शायद इस कदम के बाद ही गुमनामी बाबा की असली पहचान सामने आ सके.

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