ट्रंप से ‘शुभ-मंगल’ लेकिन ज्यादा सावधान

 ट्रंप ने भारत आने से पहले आयुष्मान खुराना की ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’ को ‘ग्रेट’ बताया है, गे लव पर आधारित ये फिल्म परंपरागत भारतीय सोच के लिए कुछ ज्यादा ही आधुनिक और परदेसी विचार वाली है. इसमें जड़ों को हिलाने की क्षमता है. ट्रंप से मुलाकात में बड़े नतीजों का दिन शायद मंगलवार ही होगा तो जरूरत ट्रंप से शुभ मंगल लेकिन ज्यादा सावधानी की है.ट्रंप अपने हक में ‘बिजनेस डील’ करना चाहेंगे ताकि कह सकें कि उन्होंने विदेश में ‘अमेरिका फर्स्ट' के अपने नारे को आगे रखा और डील न हुई तो कह सकें कि उन्होंने अमेरिकी हितो से कोई समझौता नहीं किया.

ट्रंप से ‘शुभ-मंगल’ लेकिन ज्यादा सावधान
फाइल फोटो.

मनीष कौशल/नई दिल्ली: प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से कई बार मिल चुके हैं, भारत में ये उनकी पहली मुलाकात है. उम्मीद की जा रही है कि ट्रम्प की इस यात्रा से दोनों देशों के रिश्ते को लेकर कुछ नायाब निकलेगा. हालांकि संकेत कुछ ऐसे हैं जहां हो हल्ला तो खूब सुनाई दे सकता है लेकिन हासिल-ए-महफिल क्या बनेगा इस पर बहस संभव है. ट्रंप आने से पहले ही कह चुके हैं कि भारत ने अमेरिका से बुरा बर्ताव किया है. वे भारत को ‘ट्रैरिफ किंग’ का तमगा दे चुके हैं, हार्ले डेविडसन मोटरसाइकिल के बहाने भारत पर दबाव की रणनीति की परख भी कर चुके हैं.  

अब तक पलड़ा उधर भारी दिखा है जिधर भारत की अमेरिका से दोस्ती की चाहत कुछ मोल भाव को दबे मन से स्वीकार कर लेती दिखी है. ट्रंप इससे अनजान नहीं हैं वे भारत से अपने हिसाब वाले ‘जुल्म के रिश्ते’ को बदलना चाहेंगे. इसलिए आने से पहले उन्होंने ‘ संभावित बिजनेस डील’ को लेकर ‘टू बी ऑर नॉट टू बी’ वाली ब्यूह रचना की है. 

प्रधानमंत्री मोदी भी सयाने हैं. वे ट्रंप की मंशा समझते हैं लेकिन वे बिजनेस डील या ऐसे ही ‘कुछ’ के बदले रणनीतिक मोर्चे पर ट्रंप की फराकदिली के तलबगार होंगे. चीन और पाकिस्तान की दोहरी घेरेबंदी की काट के लिए अमेरिका जैसी महाशक्ति का साथ, शक्ति संतुलन की होड़ में लंबे वक्त तक बने रहने का भरोसा देता है.  

हालांकि सवाल ये है कि बिजनेस डील से हट कर ट्रंप की इस रणनीतिक साझेदारी में कितनी दिलचस्पी होगी? ये इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी के साथ गुजश्ता मुलाकात में वे अनायास ही उपमहाद्वीप की अपनी भगौलिक और रणनीतिक समझ की कमजोरी उजागर कर चुके हैं. अमेरिका को तब बड़ी शर्मिंदगी हुई थी जब प्रधानमंत्री मोदी से एक मुलाकात के दौरान ट्रंप ने बहुत मासूमियत से पूछ लिया था कि आप काहे इतने चिंता में हैं भारत, चीन के साथ कोई सीमा थोड़े ही साझा करता है. सोचिए ये सुन कर पीएम मोदी पर क्या गुजरी होगी?  

ये वाकया ट्रंप की शख्सियत के बड़े पहलू को सामने रखता है. ये वो पहलू है जिसकी बदौलत वे कई बार आलोचनाओं का शिकार बने, फिर बड़े से बड़े संकट से घिरने के बाद उसमें उलझे बिना बच भी निकले. ट्रंप अक्सर विदेश विभाग के अपने अफसरों के दिए ज्ञान पर अमल नहीं करते. प्रोटोकॉल को लांघ जाते हैं. ज्यादातर बार सोची समझी रणनीति पर अमल करने के बजाए अपने स्वभावजन्य बर्ताव की बदौलत कोई ऐसा हल खोज लाते हैं जिस पर कैरियर डिप्लोमैट और प्रशिक्षित रणनीतिकारों ने विचार ही नहीं किया होता है.        

चीन की आर्थिक चुनौती का उन्होंने जिस तरह से सामना किया, वो ट्रंप को एक शातिर राजनेता ही साबित करता है. चीन से व्यापार युद्ध तैशबाजी में लिया गया फैसला नहीं था. याद कीजिए ओबामा युग में किताबी रणनीति के सहारे चीन से मुकाबला करता अमेरिका कैसा बेचारा नजर आता था. फिर ट्रंप आए. उन्होंने अपनी नातिन का चीनी भाषा में बोलते हुए वीडियो को ट्वीट कर बहुत मुलायम शुरुआत की, धीरे-धीरे ये सख्त होती चली गई. चीन जब तक कुछ समझता वो ट्रंप के फैलाए व्यापार युद्ध में बेतरह उलझ गया. 

दरअसल बुनियादी रूप से ट्रंप एक बिजनेसमैन हैं, वे सबकुछ नफे-नुकसान की कसौटी पर परखते हैं. वे जानते थे कि अमेरिका को चुनौती देने वाली चीन की अर्थव्यवस्था बहुत हद तक अमेरिका पर ही आश्रित है. उन्होंने नुकसान सह कर, सामने वाले का ज्यादा नुकसान करने की रणनीति आजमाई जिसने चीन को बेबस कर दिया. चीन अभी अमेरिका या कहें कि ट्रंप के चक्रव्यूह से ठीक तरह से निकल भी नहीं पाया था कि उसकी बदकिस्मती से कोरोना वायरस ने भी चीन की अर्थव्यवस्था को भारी झटका दिया. निर्यात पर टिकी चीन की अर्थव्यवस्था अगर संभल नहीं सकी तो अरबों डॉलर के कर्ज और दूसरे संकटों की वजह से चीन अपने पूर्ववर्ती ‘एशियाई टाइगर्स’ की तरह नाकामी का इतिहास लिखेगा. इस आंच में दुनिया और हमारी अर्थव्यवस्था भी झुलस सकती है. यह इसी से समझा जा सकता है जब कोरोना संकट से भारत में दवाओं के दाम महँगे हो जाने के आसार बनने लगे हैं. 

बहरहाल ट्रंप ने दिखा दिया कि वे शातिर बिजनेसमैन क्यों माने जाते थे और बिना लड़े ही दुश्मन को पटखनी देने की तुरुप चाल क्या है. चीन को उन्होंने जिस तरह से आजमाया है उसने घरेलू मैदान में उन्हें और मजबूत किया. मेक्सिको सरहद पर ऊंची दीवारे तामिल करने के फैसले से लेकर H1B वीजा जैसे तमाम बड़े मामलों में उनकी ‘राष्ट्रवादी’ जिद ने अमेरिकी जनमत को उनके पक्ष में खड़ा करने मेंं बड़ी भूमिका निभाई. कहा जाता है कि इसी घरेलू समर्थन को अपने साथ रखने के लिए ही ट्रंप सारे जतन और प्रपंच करते हैं. आखिर उन्हें दूसरी बार राष्ट्रपति जो बनना है.  

लिहाजा ट्रंप से किसी समझौते तक पहुंचने के लिए उनकी शख्सियत के तिलिस्म तक पहुंचना बहुत जरूरी है. ट्रंप चाहेंगे कि वे भारत यात्रा से कुछ ऐसा वापस ले जाएं जो उन्हें अपने लोगों की निगाहों में बहुत ऊंची जगह पर स्थापित कर दे. वो अपने हक में ‘बिजनेस डील’ करना चाहेंगे ताकि कह सकें कि उन्होंने विदेश में ‘अमेरिका फर्स्ट' के अपने नारे को आगे रखा और डील न हुई तो कह सकें कि उन्होंने अमेरिकी हितो से कोई समझौता नहीं किया.  

भारत का हित इसमें है कि वो ट्रंप को उतना ही दे जितने में नुकसान न हो लेकिन अमेरिका को चीन-पाकिस्तान धुरी के खिलाफ भी खड़ा कर ले. हालांकि ये मुश्किल और कष्टसाध्य लक्ष्य है लेकिन नामुमकिन नहीं. ध्यान बस इतना रखना है कि ट्रंप ने भारत आने से पहले आयुष्मान खुराना की ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’ को ‘ग्रेट’ बताया है, गे लव पर आधारित ये फिल्म परंपरागत भारतीय सोच के लिए कुछ ज्यादा ही आधुनिक और परदेसी विचार वाली है. इसमें जड़ों को हिलाने की क्षमता है. ट्रंप से मुलाकात में बड़े नतीजों का दिन शायद मंगलवार ही होगा तो जरूरत ट्रंप से शुभ मंगल लेकिन ज्यादा सावधानी की है.