पिछले दिनों बिहार के फर्ज़ी टॉपर्स रूबी राय और सौरभ श्रेष्ठ के फर्जीवाड़े को उजागर करने वाला वीडियो आपने ज़रूर देखा होगा। 12वीं की परीक्षा में टॉप करने वाले सौरभ श्रेष्ठ और रूबी राय रिपोर्टर के सामान्य से सवालों का जवाब तक नहीं दे पाए थे। मामला बढ़ा तो इन दोनों की परीक्षा फिर से ली गई जिसमें वो फेल हो गए। दरअसल देश में अच्छे नंबरों से मिलने वाली कमयाबी का मिथक ही ऐसा है कि पूरी शिक्षा व्यवस्था इसी में लगी रहती है। सवाल ये है कि ऐसी खोखली शिक्षा व्यवस्था के बल पर देश ज्ञान के मामले में SuperPower कैसे बनेगा? आज हमारे पास देश में चल रहे नकल के बाज़ार से जुड़े कुछ डरावने आंकड़े हैं।


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- आपको ये जानकर हैरानी होगी कि अकेले उत्तर प्रदेश में ही नकल का बाज़ार 500 करोड़ रुपये का है


- एक आंकड़े के मुताबिक उत्तर प्रदेश में शिक्षा माफिया 25 हज़ार से ज्यादा फर्जी स्कूल चला रहे हैं  


- आंकड़े ये भी बताते हैं कि उत्तर प्रदेश और बिहार बोर्ड में परीक्षा पास करने के लिए 50 हज़ार रुपये से भी कम लगते हैं और यहां गारंटी के साथ परीक्षा पास करवाने का काम करता है शिक्षा माफिया।


- यहां पढ़े-लिखे बेरोजगार, कमज़ोर टीचर और भ्रष्ट सरकारी कर्मचारी मिलकर शिक्षा माफिया का निर्माण करते हैं।


- पढ़े-लिखे बेरोज़गार पैसे लेकर फर्जी छात्र बनकर परीक्षा देते हैं, जबकि टीचर पैसे लेकर नकल करवाते हैं और इस पूरे Syndicate में शामिल सरकारी कर्मचारी नंबर बढ़वाने का काम करते हैं।


- दरअसल कई जगहों पर टीचर्स पर भी रिज़ल्ट अच्छा रखने का दबाव होता है, इसलिए टीचर्स भी कई बार नकल करवाते हैं।


- जो छात्र परीक्षा में बैठ नहीं सकते उनकी जगह किसी और को बैठाए जाने की व्यवस्था की जाती है। यही नहीं, कई केंद्रों पर कॉपी भी बाद में लिखवा कर जमा कराई जाती है।


- उत्तर प्रदेश और बिहार में तो नकल एक संगठित अपराध बन चुका है, लेकिन इसकी जड़ें पूरे देशभर में फैली हुई हैं।


- 2015 में पेपर लीक की वजह से AIPMT के 6 लाख 30 हज़ार छात्रों को दोबारा परीक्षा देनी पड़ी थी। इसके लिए CBSE को करीब 80 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च करने पड़े थे।


- 1991 में जब राजनाथ सिंह यूपी के शिक्षा मंत्री बने तो उन्होंने नकल विरोधी कानून लागू किया।


- वर्ष 1991 में तो उत्तर प्रदेश में दसवीं के 58 फीसदी छात्र पास हुए, लेकिन इसके बाद 1992 में सिर्फ 14.7 फीसदी छात्र ही दसवीं में पास हो पाए। यानी नकल पर रोक लगी तो छात्रों का पास होना बंद हो गया।  


- उत्तर प्रदेश में चुनावी मुद्दा बनने के बाद समाजवादी पार्टी की सरकार ने दिसम्बर 1993 में इस अधिनियम को निरस्त कर दिया।


- उत्तर प्रदेश में अभी भी समाजवादी पार्टी की सरकार है और इस वर्ष यानी 2016 में उत्तर प्रदेश में 87 प्रतिशत से ज्यादा छात्र पास हुए हैँ।


- इसी तरह बिहार में 1993 में बोर्ड परीक्षा में 73 प्रतिशत छात्र पास हुए थे लेकिन जब 1996 में पटना कोर्ट ने सख्ती की तो ये आंकड़ा महज़ 12 फीसदी रह गया।