गाय के गोबर से ऐसे मनाएं Eco फ्रेंडली होली, बीमारियों से भी बचाएगा
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गाय के गोबर से ऐसे मनाएं Eco फ्रेंडली होली, बीमारियों से भी बचाएगा

आयुर्वेद में भी बताया गया है कि गोबर के उपलों से यज्ञ होता था, इससे वातावरण शुद्ध होता है और हवा में स्थित बैक्टीरिया और वायरस नष्ट हो जाते हैं.

गाय के गोबर से ऐसे मनाएं Eco फ्रेंडली होली, बीमारियों से भी बचाएगा

नई दिल्ली: भारतीय संस्कृति ने दुनियाभर को बता दिया है कि हमारी सभ्यता वैज्ञानिक मूल्यों पर ही आधारित हैं. कोरोना वायरस (Corona virus) से बचने के लिए लोग अब हाथ मिलाने की बजाय हाथ जोड़कर नमस्ते कर रहे हैं जो हमारे यहां सालों से होता आ रहा है. 

होली से एक दिन पहले भारत में होलिका जलाने की परंपरा है. जिसमें गाय के गोबर के उपलों का इस्तेमाल किया जाता है. आयुर्वेद में भी बताया गया है कि गोबर के उपलों से यज्ञ करने से वातावरण शुद्ध होता है और हवा में स्थित बैक्टीरिया और वायरस नष्ट हो जाते हैं. धीर्मिक विषयों की जानकारी रखने वाले विजय शंकर शर्मा का कहना है कि गोबर को सबसे बड़ा एयर प्यूरीफयर माना गया है. गांव में आज भी लोग गोबर के उपलों से होलिका जलाते हैं. हिंदू धर्म में गाय के गोबर को पवित्र माना गया है. 

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गाए के गोबर के फायदों पर कई बड़े शोध सामने आए हैं. होलिका दहन में पर्यावण को शुद्ध करने और इसे ईको फ्रेंडली बनाने के लिए IIT दिल्ली के छात्रों ने एक नई पहल की है. IIT दिल्ली के Enactus ग्रुप ने होलिका दहन में इस्तेमाल होने वाली लकड़ियों की जगह गोबर के लॉग्स इस्तेमाल करने का तरीका खोज लिया है. Enactus के छात्रों ने लकड़ी जैसे दिखने वाले गोबर के लॉग्स बनाए हैं. जिन्हें होलिका दहन में लकड़ियों की जगह इस्तेमाल किया जा सकता है. ये लॉग्स लकड़ियों से दोगुनी देर तक जलते हैं. पर्यावरण बचाने की इस पहल को लोग अपना रहे हैं.

वसंत कुंज में रहने वाली अमीना तलवार का कहना है कि हम अपनी सोसाइटी में इस बार लकडियों की जगह गोबर के लॉग्स लगा रहे हैं. दिल्ली जैसे शहर में जहां वायु प्रदूषण ज्यादा है और पेड़ कम. ऐसे में अगर हम किसी भी तरह से पर्यावरण को बचा सकते हैं तो क्यों न करें. ज्यादा से ज्यादा लोगों को ये अपनाना चहिए. 

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IIT दिल्ली में इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे Enactus ग्रुप के अमन ने बताया कि इस प्रोजेक्ट का नाम 'अर्थ' है. गोबर से बने इन लॉग्स को 'अर्थ लॉग्स' कहते हैं. अमन ने कहा कि हम पिछले 3 साल से इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं. गोबर को लकड़ी का रूप देने के लिए पहले गाय के गोबर को मशीन से आकार दिया जाता है. फिर इसमें कुछ केमिकल डालकर इसे सुखया जाता है. देखने में ये बिल्कुल लकड़ियों की तरह दिखता है लेकिन ये लकड़ी जलाने के मुकाबले कम कार्बन उत्सर्जन करता है.

हर साल देशभर में हजारों किलो लकड़ियां जलाई जाती हैं. एक होलिका दहन के लिए लगभग 3 पेड़ काटे जाते हैं. दूसरी तरफ इतना गोबर हर दिन इकट्ठा होता है और उसे फेक दिया जाता है. लकड़ियों की जगह गोबर के इन लॉग्स को जलाने से न सिर्फ बड़ी मात्रा में पेड़ों को कटने से बचाया जा सकता है बल्कि हवा में कार्बन उत्सर्जन को भी कम किया जा सकता है. साथ ही इससे वातावरण में फैले वायरस और बैक्टीरिया भी नष्ट होते हैं.

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