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Uttarkashi Disaster Risk: उत्तरकाशी का उच्च हिमालयी क्षेत्र गंगोत्री और गोमुख अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ गंभीर पर्यावरण संकट के मुहाने पर खड़ा है. इस क्षेत्र में लगभग 25 किलोमीटर के विशाल दायरे में गंगोत्री ग्लेशियर फैला हुआ है. लेकिन हाल के वर्षों में वैश्विक तापमान यानी ग्लोबल वार्मिंग के लगातार बढ़ने के कारण यह विशाल ग्लेशियर तेजी से पिघल रहा है. ग्लेशियर के पिघलने से बर्फ का दायरा सिमट रहा है और इसके आसपास कई छोटी-छोटी झीलें और ताल बन रहे हैं. नेपाल में हाल ही में ग्लेशियर टूटने और उससे हुए भीषण नुकसान की घटना के बाद से उत्तरकाशी के स्थानीय निवासियों और पर्यावरण प्रेमियों के बीच चिंता बेहद बढ़ गई है.
झीलों का निर्माण और बढ़ता खतरा
गोमुख, तपोवन और सुंदरवन जैसे उच्च हिमालयी इलाकों में ग्लेशियरों के पिघलने से पानी का जमाव हो रहा है, जिससे नई झीलों का निर्माण हो रहा है. वैज्ञानिकों और स्थानीय लोगों के अनुसार ग्लेशियर के आसपास ऐसी अस्थाई झीलों का बनना और टूटना कोई नई बात नहीं है, लेकिन वर्तमान में इनकी बढ़ती संख्या खतरे की घंटी है. उत्तरकाशी जनपद भौगोलिक और आपदा की दृष्टि से पहले से ही बेहद संवेदनशील माना जाता है. यदि इनमें से कोई बड़ी ग्लेशियर झील अचानक टूटती है या उसका बांध फटता है, तो निचले इलाकों में भारी तबाही मच सकती है और जान-माल का बड़ा नुकसान हो सकता है.
वैज्ञानिक परीक्षण की उठती मांग
नेपाल जैसी अनहोनी से सबक लेते हुए स्थानीय लोगों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरण विशेषज्ञों ने राज्य सरकार से एक सुर में सुरक्षात्मक कदम उठाने की अपील की है. उनकी मांग है कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में स्थित इन सभी तालों, झीलों और ग्लेशियरों का तुरंत व्यापक वैज्ञानिक परीक्षण और सर्वेक्षण कराया जाए. इस परीक्षण से झीलों की गहराई, पानी की क्षमता और उनके टूटने के जोखिम का सही अनुमान लगाया जा सकेगा.अगर समय रहते इन झीलों के व्यवहार और स्थिति की सही जानकारी मिल जाए, तो भविष्य में आने वाले किसी भी बड़े खतरे को टाला जा सकता है और निचले इलाकों के लोगों को सुरक्षित रखा जा सकता है.
विशेषज्ञों की राय
पर्यावरण और भू-विज्ञान के विशेषज्ञों का मानना है कि यद्यपि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बर्फ पिघलने से झीलों का बनना और टूटना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन इसे पूरी तरह नजरअंदाज करना भारी भूल होगी. वैज्ञानिकों के अनुसार इन झीलों पर सैटेलाइट और ग्राउंड ट्रैकिंग के जरिए लगातार निगरानी रखना बेहद जरूरी है. इसके साथ ही एक शुरुआती चेतावनी प्रणाली विकसित की जानी चाहिए. यदि सरकार और प्रशासन समय पर इन संवेदनशील तालों का वैज्ञानिक अध्ययन कराकर रिपोर्ट तैयार कर लें, तो किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए पूर्व तैयारी की जा सकेगी. इससे न केवल पर्यावरण की सुरक्षा होगी, बल्कि गंगा घाटी में बसे हजारों लोगों का भविष्य भी सुरक्षित रह सकेगा.