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सफेद बर्फ से ढकी कश्मीर घाटी का उठाएं लुत्फ, उत्तर रेलवे का आमंत्रण

भारत की इस खूबसूरत घाटी को देश के शेष भागों से जोड़ने के लिए स्वप्निल परियोजना के रूप में इसकी शुरूआत हुई. 

सफेद बर्फ से ढकी कश्मीर घाटी का उठाएं लुत्फ, उत्तर रेलवे का आमंत्रण
हिमालय पर्वत के कठिन हिस्सों से होकर गुजरने वाली यह रेल लाइन विश्व की सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण रेल लाइन है.

श्रीनगर: साल के एक बड़े हिस्से में बर्फ से ढकी रहने वाली कश्मीर घाटी को देश का स्विट्जरलैंड कहना सर्वथा उचित है. सर्दियों में पर्यटकों के लिए इस खूबसूरत घाटी में पहुंचना एक सपने के समान है क्योंकि सर्दियों में भारी हिमपात के कारण जवाहर सुरंग से गुजरने वाला सड़क संपर्क पूरी तरह से बंद हो जाता है. अब भारतीय रेलवे ने विशेष खूबियों वाली डीईएमयू रेलगाड़ियों के जरिए सुगम और निर्बाध रेल संपर्क उपलब्ध कराया है. 

भारतीय रेलवे नेटवर्क के जरिए एक युग की सुबह
भारत की इस खूबसूरत घाटी को देश के शेष भागों से जोड़ने के लिए स्वप्निल परियोजना के रूप में इसकी शुरूआत हुई. भारतीय रेलवे चरणबद्ध रूप में पूरा करने का अपना वादा निभा रही है. उत्तर रेलवे के उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक परियोजना दल दृढ़ निश्चय और चरणबद्ध रूप से इस पर निरंतर कार्य कर रहा है और देश के उस हिस्से तक अपनी पहुंच बना रहा है जो अलग-थलग पड़ जाता था. इसे राष्ट्रीय महत्व की परियोजना घोषित किया गया है. हिमालय पर्वत के कठिन हिस्सों से होकर गुजरने वाली यह रेल लाइन विश्व की सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण रेल लाइन है.

कश्मीर घाटी में रेल नेटवर्क
चरणबद्ध रूप से कार्य करते हुए रेलवे ने पहले अनंतनाग से मझोम तक 68 किलोमीटर उसके बाद मझोम से बारामूला 32 किलोमीटर के बाद काज़ीगुण्ड से अनंतनाग 18 किलोमीटर लंबे रेल सेक्शन का कार्य पूरा करके कश्मीर घाटी में रेल सम्पर्क उपलब्ध कराया. इस लाइन पर सबसे लंबी रेल सुरंग, पीर पंजाल रेल सुरंग जम्मू एवं कश्मीर रेलवे के इतिहास की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही है। श्री माता वैष्णो देवी कटरा तथा बनिहाल सेक्शन को रेल रेटवर्क से जोड़ने का कार्य भी तेजी से किया जा रहा है. 

पीर पंजाल सुरंग
11 किलोमीटर लंबी टी-80 सुरंग सबसे लंबी यातायात सुरंग है. यह पीर पंजाल पर्वत क्षेत्रों से गुजरते हुए कश्मीर घाटी को जोड़ती है. यह जम्मू के लोगों को हर मौसम में उपलब्ध रहने वाला वैकल्पिक यातायात माध्यम उपलब्ध कराती है. 7 वर्ष 5 महीने में तैयार की गई इस सुरंग को 150 इंजीनियरों और 1300 फील्ड कर्मियों ने दिन-रात के अथक श्रम से पूरा किया है. इस लाइन के निर्माण में तीन लाख क्यूबिक मीटर कंक्रीट और 7500 मीट्रिक टन इस्पात का उपयोग किया गया है.