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भारत की जमीन पर सड़क बना रहा चीन, तब 5 साल बाद क्यों पता चला? अब शक्सगाम घाटी चर्चा में क्यों है

Aksai Chin Shaksham Valley: जमीन भारत की लेकिन पाकिस्तान ने अवैध कब्जा कर चीन को गिफ्ट कर दिया. अब वहां सड़क और दूसरे निर्माण कार्य की जानकारी मिलने पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई है. यह इलाका पीओके कहा जाता है. कुछ ऐसा ही चीन ने नेहरू के समय में किया था. चीनी पीएम चाऊ एन लाई भारत से मीठी-मीठी बातें करते रहे, बाद में धोखे का पता चला. ये सब कैसे हुआ था?

भारत की जमीन पर सड़क बना रहा चीन, तब 5 साल बाद क्यों पता चला? अब शक्सगाम घाटी चर्चा में क्यों है

पाकिस्तान ने गैरकानूनी कब्जे वाले पीओके की शक्सगाम वैली को 1963 में ही चीन को गिफ्ट कर दिया था. उसी जगह पर चीन अब अपना इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर रहा है. सीपीईसी यानी चीन पाक आर्थिक गलियारे के जरिए वह पाकिस्तान तक सड़क बना रहा है. यह सड़क जिस रास्ते से होकर गुजर रही है वह भारत का हिस्सा है. चीन ने यह भी कह दिया है कि इस पर कोई सवाल नहीं उठा सकता क्योंकि यह चीन का है. भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है कि शक्सगाम घाटी में चीन का कंट्रोल वास्तव में अवैध कब्जा है. (नीचे तस्वीर देखिए) आज की पीढ़ी को नहीं पता होगा कि नेहरू के समय में वो एक गंभीर चूक थी जब चीन की तरफ से सीमा विवाद की शुरुआत हुई थी. चीन के पीएम बार-बार भारत आते रहे और चुपचाप अक्साई चिन इलाके में सड़क बना ली. भारत को पूरे पांच साल बाद इसकी भनक लगी. 

1950 तक भारत और चीन के संबंधों में सब ठीक-ठाक चल रहा था. इसी साल तिब्बत हड़पने के बाद चीजें बदलने लगीं. विद्रोहियों से लड़ाई शुरू हो गई. चीनी आर्मी बौद्ध मठों पर बमबारी करने लगी. 1956 में बुद्ध के निर्वाण प्राप्त करने की 2500वीं वर्षगांठ का मौका आया. भारत सरकार समारोह के लिए दलाई लामा को न्योता भेजती है. जवाब चीनी सरकार ने दिया कि दलाई लामा नहीं जा पाएंगे क्योंकि वह पहले से तय कार्यक्रमों में व्यस्त हैं. भारतीय अधिकारी ने दलाई लामा से पूछा तो पता चला कि उन्हें निमंत्रण मिला ही नहीं. काफी झिझक के बाद चीन ने दलाई लामा को भारत आने की परमिशन दी. वास्तव में चीन, भारत से जंग की पटकथा पहले ही लिखना शुरू कर चुका था. उसने अक्साई चिन में चुपचाप सड़क बना ली. चौंकाने वाली बात यह है कि भारत को इसकी जानकारी करीब पांच साल तक नहीं हुई थी. ऐसा दावा चीनी पीएम ने किया था.  

भारत-चीन विवाद की पटकथा

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रनजीत सिंह कल्हा अपनी किताब 'भारत-चीन सीमा मुद्दे' में लिखते हैं कि दलाई लामा और पंचेन लामा 24 नवंबर 1956 को अलग-अलग विमानों से दिल्ली पहुंचे. नेहरू ने हवाई अड्डे पर उनका स्वागत किया. चीनी काफी परेशान हो गए. चाऊ एनलाई तत्काल भारत आए. उन्होंने दो महीने के भीतर यानी नवंबर 1956 से जनवरी 1957 के बीच तीन बार भारत की यात्रा की. चीनी जानना चाहते थे कि दलाई लामा का इतना शानदार स्वागत क्यों किया गया, जैसा किसी पीएम या राष्ट्रपति का होता है. उसी समय राजनीतिक शरण की बातें भी होने लगी थीं. हालांकि चाऊ ने तिब्बती स्वायत्तता की बात कही तो नेहरू ने दलाई लामा को ल्हासा लौटने के लिए मना लिया. 

नेहरू से चीन की खुन्नस

नेहरू का हस्तक्षेप चीन को अच्छा नहीं लगा था. चाऊ ने इसे व्यक्तिगत रूप से लिया क्योंकि यह साफ दिख रहा था कि चाऊ की तुलना में नेहरू का तिब्बत पर ज्यादा प्रभाव था... 1956-57 तक चीनी भारत के बारे में काफी संदेह करने लगे थे और उन्होंने महसूस किया कि नेहरू 'अनावश्यक हस्तक्षेप' कर रहे हैं. यह स्पष्ट था कि तिब्बत की नियति भारत और चीन के बीच एक मुख्य मुद्दा बनने की थी क्योंकि तिब्बत में स्थिति बहुत खराब हो गई थी. 

चीन के लिए सड़क की अहमियत 

चीन की मुख्य भूमि से पूर्वी तिब्बत की ओर जानेवाली संचार की अधिकतर लाइनें अशांत और विद्रोही भू-भाग से होकर गुजरती थी. ऐसे में यह जरूरी हो गया था कि सिनकियांग को तिब्बत के साथ जोड़नेवाली पश्चिमी लाइनों को सुरक्षित रखा जाए. पूर्व में चीनियों ने 1950 में आक्रमण के दौरान तिब्बत में प्रवेश करने के लिए अक्साई चिन को पार करने के लिए सिनकियांग में खोतान से इसी पश्चिमी रास्ते का प्रयोग किया था. हालांकि यह मार्ग भारत के भू-भाग से गुजरता था. ऐसे में इस क्षेत्र में एक बड़ी कलह और भारत के साथ बड़ा विवाद का कारण बनने की पूरी संभावनाएं थीं. चीनी इस बात से पूरी तरह से अवगत थे. वे इस सड़क पर कब्जा जमाने के लिए भारत पर आक्रमण करने का जोखिम उठाने के लिए भी तैयार थे क्योंकि यह उनके लिए रणनीतिक जरूरत थी. 

1951 में ही अक्साई चिन में घुस गया था चीन?

चीनियों ने ही अक्साई चिन सड़क के प्रश्न को पहली बार सार्वजनिक तौर पर उठाया था...चीन ने शांतिपूर्वक और धीरे-धीरे अक्साई चिन तक सड़क का निर्माण कर लिया. चाऊ एनलाई ने बाद में बताया कि उन्होंने 1951 में ही सड़क निर्माण का कार्य शुरू कर दिया था. यह भारतीय भू-भाग में करीब 219 किमी लंबी है. इस प्रकार के निर्माण की पहली खबर 1955 में भारत के पश्चिमी तिब्बत के लिए व्यापार एजेंट लक्ष्मण सिंह जंगपंगी की ओर से पहली बार आई थी. उन्होंने दिल्ली को सूचना दी कि इस तरह की सड़क का निर्माण हो रहा है. हालांकि इस रिपोर्ट को नजरअंदाज कर दिया गया. 

नक्शे का खेल

जनवरी 1955 में दिल्ली में चीनी दूतावास ने भी एक पत्रिका निकाली जिसमें चीन का मानचित्र दिखाया गया. इसमें पूर्वोत्तर सीमा को उसके दावे के रूप में दर्शाया गया था...मई 1956 तक भारत सरकार के पास रिपोर्ट थी कि चीन अक्साई चिन सड़क का निर्माण कर रहा है. बाद में नेहरू ने 23 फरवरी 1960 को लोकसभा में बताया कि 1955 तक चीनियों के अक्साई चिन सड़क पर कार्य करने के बारे में रिपोर्ट भारत आई थी लेकिन हमें स्पष्ट नहीं था कि क्या इस मोटर सड़क ने हमारे भू-भाग को पार किया है? चूंकि इस बारे में कोई प्रमाण नहीं था इसलिए उस समय चीन के पास कोई विरोध दर्ज नहीं किया गया. 

2 सितंबर 1957 को 'पीपल्स डेली' ने एक बहुत छोटा मानचित्र प्रकाशित किया. इसमें एक सड़क के माध्यम से जिनजियांग (सिनकियांग) को तिब्बत से जोड़ता दिखाया गया. उसी दिन बीजिंग में भारतीय दूतावास ने रिपोर्ट दी कि चीनियों ने आज घोषित किया कि एक मोटर सड़क का निर्माण किया गया है और इसे अक्तूबर में ट्रैफिक के लिए खोला जाएगा. यह सड़क अक्साई चिन से होते हुए गुजरती है जो कश्मीर भू-भाग में है. हालांकि यह इतना छोटा मानचित्र था जिसमें यह दर्शाया जाना कठिन था कि क्या वह सड़क लद्दाख के भारतीय भू-भाग (अक्साई चिन) से गुजर रही है या नहीं. 

दिल्ली से 7 सितंबर 1957 को बीजिंग दूतावास से पूछा गया कि वे दो रास्ते कौन से हैं जिनका जिक्र चीनी कर रहे हैं. वहां दो मार्ग ऐसे थे जिनका प्रयोग जिनजियांग (सिनकियांग) से पश्चिमी तिब्बत पहुंचने के लिए किया जा सकता था. दूतावास कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाया. अब प्रश्न था कि क्या किया जाना चाहिए? इधर, चीन ने कुछ और प्रकाशन में मैप छपवा दिए. नेहरू ने सोवियत प्रकाशनों की अनदेखी की और लोकसभा में 22 अप्रैल 1959 को कहा कि जहां तक रूसी मानचित्रों का संबंध है, मैं समझता हूं कि उन्होंने शायद गंभीरता से विचार किए बिना चीनी मानचित्रों की नकल कर दी.

नेहरू की वो चूक

जिनजियांग (सिनकियांग) को तिब्बत के साथ जोड़ने और अक्साई चिन को पार करने वाली सड़क को मानचित्र पर दर्शाने के चीनी फैसले ने साफ कर दिया था कि भारत का उसके द्वारा दावा किए गए भू-भाग पर नियंत्रण नहीं है. असल में 1954 में नेहरू द्वारा निश्चित रेखाओं द्वारा पश्चिमी क्षेत्र में भारत की सीमा को दर्शाने के लिए लिए निर्णय को मानने और भारत की सीमा को सुरक्षित रखने के लिए जमीनी स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं की गई थी. यह पूर्वी क्षेत्र से पूरी तरह से भिन्न था जहां भारतीय प्रशासन ने अत्यंत उत्साह के साथ मैकमोहन रेखा तक सक्रिय कार्रवाई की थी. ऐसे में पश्चिमी सेक्टर में दावा की गई सीमा रेखा केवल कागजों पर ही रह गई और उसे चीन ने हर उस समय आसानी से खारिज कर दिया जब-जब उसने ऐसा करना उचित समझा. 

भारत ने दो टीमें भेजीं लेकिन...

चीनियों ने यह निर्णय लिया था कि अब समय 'आ गया' है और उन्होंने अपनी बात को सिद्ध करने के लिए पश्चिमी सेक्टर में लद्दाख में अक्साई चिन का चुनाव किया. पश्चिमी सेक्टर की पहली बार सार्वजनिक रूप से विवाद में आने की पुष्टि हुई थी. भीषण सर्द मौसम के कारण भारत 'पीपल्स डेली' की रिपोर्ट की सत्यता की जांच करने के लिए दो गश्ती दल भेजने का निर्णय जून 1958 से पहले नहीं कर पाया. लेह से रवाना हुए दो गश्ती दलों में से एक दल का नेतृत्व लेफ्टिनेंट अयंगर कर रहे थे, जो उत्तर की ओर गए. डीएसपी करम सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस दल उस सड़क के सुदूर दक्षिण तक गया. एक लंबी और थका देनेवाली यात्रा के बाद दक्षिण गया दल सड़क के सुदूरवर्ती दक्षिणी भाग तक पहुंचा और सूचना दी कि सड़क ने भारतीय सीमा क्षेत्र को पार किया है. 

चीन ने अरेस्ट कर लिया था

चूंकि उत्तरी दल के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. ऐसे में 18 अक्तूबर, 1958 को चीन से औपचारिक रूप से पूछा गया. चीन ने 3 नवंबर 1958 को उत्तर दिया कि भारतीय दल को जिनजियांग-तिब्बत राजमार्ग पर 8 और 12 सितंबर को गिरफ्तार कर लिया गया और बंदी बनाए गए भारतीय कर्मचारियों को 22 अक्तूबर, 1958 को काराकोरम के माध्यम से 'निर्वासित' किया जाएगा. यह अत्यंत दुखद था कि उन्हें भटकता हुआ पाया गया था. चीनियों ने उन्हें उतार दिया था और उनसे खुद वापस जाने के लिए कहा था. 

इससे पूर्व 21 अगस्त 1958 को भारत ने जुलाई 1958 की 'चाइना पिक्चोरियल' संख्या 95 की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए भारतीय सीमा क्षेत्र के माध्यम से सड़क का निर्माण करने के लिए चीन से विरोध जताया. विरोध टिप्पणी में 1956 में जारी किए गए 'भारत के राजनीतिक मानचित्र' के तीसरे संस्करण की प्रति उपलब्ध कराने का प्रस्ताव भी किया गया. यह पहली बार था कि भारत ने आधिकारिक रूप से चीन को भारत-चीन सीमा के भारत द्वारा दर्शाए गए मानचित्र देने का प्रस्ताव दिया.

नेहरू को आलस्य में लाने की आशा से चीनियों ने 3 नवंबर 1958 को यह कहते हुए अपना उत्तर भेजा कि चीन सरकार ने अभी तक 'चीन की सीमा का सर्वेक्षण नहीं किया है और न संबंधित देशों से परामर्श किया है और चीन की सीमा के नए स्वरूप पर निर्णय परामर्श और सर्वेक्षण के परिणामों के अनुसार ही किया जाएगा. वह अपने आप सीमा में कोई परिवर्तन नहीं करेगा.' इस बयान की असल बात इसके अंतिम वाक्य में थी. चीन-भारतीय सीमा विवाद और विशेष रूप से अक्साई चिन पर विवाद अब खुले में सामने आ गया था.

अक्साई चिन कितना बड़ा है?

- अक्साई चिन एक रूखा, सख्त उच्च पर्वतीय रेगिस्तान है. 
- यह लगभग 17000-18000 फीट की ऊंचाई पर है. 
- वहां तब आबादी नहीं थी और इस बात का कोई संकेत भी नहीं है कि वहां कभी लोग रहे भी होंगे. 
- यहां पेड़-पौधे भी बिल्कुल कम है. यहां-वहां कुछ झाड़ियां जरूर हैं. यह सदियों से अलग-थलग और घोर निर्जन स्थान के रूप में है. 
- यहां की झीलों का पानी खारा है. ऐसे में पानी में मछलियां नहीं हैं. वहां कहीं भी कोई पक्षी दिखाई नहीं देता. 

बाद में नेहरू की उस बात पर काफी आलोचना हुई थी जिसमें उन्होंने कहा था, 'यह एक ऐसा भू-भाग है, जहां घास का एक तिनका भी नहीं उगता है. भारत के लिए यह केवल एक उच्च पर्वतीय मरुस्थल था और किसी भी विशेष महत्व का नहीं था लेकिन चीन के लिए यह एक महत्वपूर्ण मार्ग था. यह एक रणनीतिक आवश्यकता थी.' किताब में लेखक लिखते हैं कि चीन ने 1957 में मानचित्र प्रकाशित क्यों किए और उनके जरिए सोए हुए भारत को क्यों जगाया, यह विवाद का एक विषय है. यह स्पष्ट है कि यह समाचार उच्चतम स्तर तक स्वीकृति प्राप्त किए बगैर तो 'पीपल्स डेली' में प्रकाशित नहीं हुआ होगा क्योंकि आखिरकार 1957 तक तो चीनियों ने पूरी तरह से चुप्पी साधी हुई थी.

सड़क के निर्माण को प्रकाशित और प्रचारित करना, जान-बूझकर उस विवाद को सार्वजनिक बनाने की चाल थी जिससे नेहरू कमजोर पड़ सकें. अक्साई चिन के भारतीय भू-भाग होने का दावा करने वाले नेहरू को उस सड़क का पता क्यों नहीं चल पाया जिसका निर्माण चीनियों द्वारा किया गया था? बाद में चीनियों ने भी ठीक इसी बात को लेकर नेहरू पर व्यंग्य किया. यह बात सच है कि ऐसे भू-भाग में सड़क का निर्माण करने में ज्यादा मेहनत की जरूरत नहीं थी. जैसा कि नेहरू ने 31 अगस्त 1959 को संसद में कहा था, ऐसे बीहड़ क्षेत्र में सड़कें विशेष प्रकार की होती हैं. इसमें केवल यह करना होता है कि सड़क बनाने के लिए जमीन साफ कर दो और उसमें से झाड़ियां और पत्थर हटा दो. शायद इसी कारण से चीनी हरकतों की जानकारी भारत को देर से हुई. fallback

शक्सगाम घाटी चीन को कैसे मिली?

- शक्सगाम घाटी को ट्रांस-काराकोरम ट्रैक्ट कहते हैं. यह भारत का भू-भाग है लेकिन पाकिस्तान के कंट्रोल में चला गया. यह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर यानी पीओके का हिस्सा रहा. बाद में पाकिस्तान ने 2 मार्च 1963 को चीन से एक सीमा समझौता किया और इस इलाके का लगभग 5,180 वर्ग किमी हिस्सा चीन को गैरकानूनी तरीके से सौंप दिया. 

- भारत इस डील को लगातार अवैध बताता है. यह पूरा क्षेत्र भारत का है.

- अभी की स्थिति यह है कि शक्सगाम घाटी पर चीन का कब्जा है. यहीं पर हाल में निर्माण कार्यों की जानकारी मिलने पर भारत ने कड़ा विरोध जताया है. 

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Anurag Mishra

अनुराग मिश्र ज़ी न्यूज डिजिटल में एसोसिएट न्यूज एडिटर हैं. वह दिसंबर 2023 में ज़ी न्यूज से जुड़े. देश और दुनिया की राजनीतिक खबरों पर अच्छी पकड़ रखते हैं. इससे पहले नवभारत टाइम्स डिजिटल में शाम की श...और पढ़ें

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