Rahul Gandhi Bihar Defeat: राहुल जी, अच्छा नहीं लगता लोग आपका मजाक बनाते हैं. शायद कांग्रेस का प्रदर्शन किसी को भी अच्छा नहीं लगता. इस तरह ग्रैंड ओल्ड पार्टी का शर्मनाक तरीके से जनता के दिल से निकल जाना गंभीर सवाल खड़े करता है. यह हर उस कांग्रेसी के लिए दुखद है जो भले ही गिने चुने हों लेकिन काडर के तौर पर खड़े हैं. मेरा बस एक सवाल है.
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आपने मछली पकड़ी, मखाना फोड़ा, जलेबी बनाई, दौड़े, पुशअप्स किए, ठंड में टीशर्ट पहनकर चले, लालू के घर भोज भी खा आए लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. राहुल गांधी जी, आपने कभी सोचा है कि आप बार-बार फेल क्यों हो जाते हैं. माफ कीजिएगा 'फेल' लिखना मजबूरी हो गई है... मुझे ये देखकर भी अच्छा नहीं लगा कि भाजपा वाले आपके लिए नया करियर पाथ बता रहे हैं. (नीचे फोटो देख लीजिएगा) खैर ये सब राजनीति का हिस्सा है. आपके यहां भी काफी एआई वीडियो बनाए गए थे. मैं आज यह खुला खत आपसे कुछ पूछने के लिए लिख रहा हूं. आपने कभी सोचा है कि आपको वोट कौन देगा? कौन आपके साथ है? मेरा मतलब वोटरों से है. और हां, मान लीजिए कि जाति ही सच है. चुनाव जीतने के लिए सच्चाई की चादर पकड़ लेनी चाहिए. जरा दिनेश शर्मा के भीतर की उथल-पुथल को महसूस कीजिए जो अकेले पार्टी दफ्तर के बाहर झंडा लहराते हुए हौसला बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे.
कल राहुल गांधी के समर्थक दिनेश शर्मा बिहार चुनाव में हार के बाद नेता विपक्ष के आवास पर नंगे पांव तिरंगा लेकर पहुंचे थे, ताकि उनका हौसला बढ़ा सकें।
हार-जीत राजनीति का एक पहलू है इसलिए कभी भी कॉन्फिडेंस कम नही होना चाहिए.. और विकट परिस्थिति में अपने नेता के साथ खड़ा रहना चाहिए। pic.twitter.com/gpH1XvCQGF
— Dinesh Purohit (@Imdineshpurohit) November 17, 2025
बिहार चुनाव के नतीजे आए फिर वीकेंड आ गया. आपकी पार्टी 61 में से केवल 6 सीटें जीत पाई. वोट शेयर 8.71 प्रतिशत रहा. शायद कांग्रेस ने अघोषित तौर पर बिहार की बड़ी हार पर मंथन कर लिया होगा इसीलिए यह खत अब लिख रहा हूं. सवाल यह नहीं है कि भाजपा जीत रही है और उसे प्रचंड जनादेश मिल रहा है. अच्छी बात है... लेकिन जिस तरह से मुख्य विपक्षी दल या ग्रैंड ओल्ड पार्टी कही जाने वाली कांग्रेस की हालत खस्ता होती दिख रही है, उसे कम से कम स्वस्थ लोकतंत्र की सेहत के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता.
कांग्रेस के लोग शायद अपनी पार्टी के प्रदर्शन पर इतना गंभीर नहीं होंगे, जितना मुझ जैसे आम लोग 'धक्का' महसूस करते हैं. ऐसा ही रहा तो देश क्या एक पार्टी या गठबंधन की तरफ नहीं बढ़ रहा है? राहुल जी, ऐसे रहा तो विपक्ष कहीं खत्म न हो जाए. यकीन मानिए जो लोग भाजपा को वोट दे रहे हैं या आपकी पार्टी छोड़कर भाजपा में गए हैं उन्हें भी कांग्रेस की स्थिति देखकर दुख होता होगा. सवाल यह है कि ऐसी स्थिति बनी ही क्यों? 90 के दशक से पहले जो लोग कांग्रेस की टेंपो हाई है... का नारा लगाते थे धीरे-धीरे कमल का फूल क्यों खिलाने लगे? आपने शायद सोचा नहीं होगा.
Here’s a list of career paths Rahul Gandhi might actually ace…
Because clearly, the current one isn’t working! pic.twitter.com/Ys6xoqwYmM
— BJP (@BJP4India) November 17, 2025
आपके पास बचा कौन?
राहुल जी, आप तो खुद कई चुनाव जीत चुके हैं. जनबई करते हैं कि पार्टी काडर पर चलती है. कार्यकर्ताओं का पसीना चुनाव जिताता है. क्या आपका काडर बेस बचा है? यूपी का ही उदाहरण ले लीजिए. पहले ब्राह्मण, मुस्लिम और आदिवासी जैसे समूह आपके पक्के वोटबैंक माने जाते थे. सपा आई तो यादवों को साधा और मुस्लिमों को खींचा. बसपा ने अपना अलग बेस खड़ा किया. भाजपा ने अपर कास्ट को अपने साथ मिला लिया. आगे चलकर आदिवासियों को भी साध लिया फिर आपके पास बचा कौन?
थोड़ी गुटबाजी चली, थोड़ा जाति का तड़का
लोग भले ही खुलकर न बोलें पर सच तो यही है न कि हमारे दादा की पीढ़ी तो कांग्रेसी ही थी. कांग्रेस को सर्व-समावेशी माना जाता था मतलब वो पार्टी जो सबको साथ लेकर चलती है. आज वो तमगा बीजेपी दिखाती है. कांग्रेस की शुरुआती सरकारों ने योजनाएं लाईं, गरीबी कम होने लगी, खाने का संकट घटने लगा तो ग्रामीण वर्ग और निम्न मध्यम लोग कांग्रेसी हो गए. विकल्प नहीं था तो शहरी मध्यम वर्ग भी आ गया लेकिन जब विकल्प बनने लगा तो कांग्रेस ने खुद को एकजुट रखने की कोशिश नहीं की. थोड़ी गुटबाजी चली, मंडल राजनीति और सामाजिक न्याय आंदोलन के साथ राम मंदिर आंदोलन हुआ. ध्रुवीकरण के चलते भाजपा ने पैर पसारना शुरू कर दिया.
उसी समय कांग्रेस को सतर्क होना चाहिए था लेकिन यूपी के 30 सालों का इतिहास बताता है कि कांग्रेस ने एक के बाद एक हार मिलने के बाद भी अपने जनाधार को मजबूत करने की कोशिश नहीं की. नेता और कार्यकर्ता दोनों टूटकर दूसरी पार्टियों की नींव बनने लगे पर आपके नेता अपने गुरूर में रहे.
भाजपा ने आपका ही फार्मूला तो लिया
राहुल जी, भाजपा का पन्ना प्रमुख वाला फार्मूला तो कांग्रेस के संगठन का ही आधुनिक रूप है न. आपकी पार्टी में मोबाइल और व्हाट्सएप ग्रुप वाले दौर से पहले ही ब्लॉक और ग्राम पंचायत लेवल पर मजबूत संगठन खड़ा किया गया था जिसे बिखरने दिया गया.
आप यह भी देख रहे हैं कि 20 साल में कांग्रेस में विस्फोटक रूप से नेतृत्व संकट दिखा, बड़े नेता छिटकते गए, पार्टी को बचाने की न कहीं रणनीति दिखी, न राज्यों में लीडरशिप तैयार की गई. उधर भाजपा ने धीरे-धीरे नेताओं की पहली, दूसरी और तीसरी लाइन खड़ी कर ली. आपके यहां तो किसी राज्य में बुजुर्ग बनाम जवान नेता का झगड़ा चला तो कहीं अपने बेटे-बहू को टिकट दिलाने की आपके नेताओं की छोटी सोच लेकिन आपने कुछ नहीं किया.
हिमंता बिस्वा सरमा का एक बड़ा उदाहरण है जो दिखाता है कि कांग्रेस कैसे चूकी. आपकी पार्टी उभरते नेताओं को जगह नहीं दे पाई, उन्हें पहचानना भूल गई. जो कुछ बुजुर्ग कुर्सी पकड़ कर बैठे थे, वही आज भी पार्टी को 'ढो' रहे हैं. हां, आपको बुरा लगेगा लेकिन पार्टी इस समय चल नहीं फिसल रही है, नई पीढ़ी शायद दौड़कर चलती लेकिन आपने उन्हें तवज्जो ही नहीं दी. सिंधिया हो या पायलट. आपने कभी कुछ नहीं बोला.
अब आप बिहार हारे हैं. भाजपा के नेता आपकी 95 हार गिना रहे हैं. उनके हिसाब से कांग्रेस की हारने की सेंचुरी पूरी होने वाली है. मैं आपसे पूछ रहा हूं कि आप खुद सोचिए कि आप किससे वोट की उम्मीद कर रहे हैं? आपको वोट देगा कौन, जरा विश्लेषण कीजिए. किसी से कराइएगा नहीं क्योंकि शायद वही आपको गलत राय दे रहे हों.
He said he’s not worried about it… https://t.co/KrDOuWWCd8 pic.twitter.com/aV6y5ahDVZ
— Amit Malviya (@amitmalviya) November 16, 2025
बिहार का उदाहरण लीजिए
- बिहार में EBC यानी अति पिछड़ा वर्ग जेडीयू के साथ जुड़ा, नीतीश कुमार के सपोर्ट में कुर्मी और कुशवाहा डटे रहे.
- ब्राह्मण, ठाकुर, भूमिहार जैसी जातियां (अपर कास्ट) भाजपा के साथ हो चली. इस बार भाजपा और जेडीयू ने अपनी योजनाओं और फायदे के जरिए महिलाओं और यूथ को जोड़ा. भाजपा ने जनहित और हिंदुत्व के एजेंडे पर वोटरों को अपने साथ जोड़े रखा.
- चिराग पासवान की पार्टी ने दलित, महादलित के अपने वोटबैंक को पकड़ा, उपेंद्र कुशवाहा और मांझी ने अपना-अपना काम संभाला और देखिए बिहार चुनाव के नतीजों की 'स्पेशल चुनावी थाली' एनडीए ने तैयार करके जीत ली. आप क्या कर रहे थे?
राहुल जी चुनाव में गड़बड़ी, ईवीएम, वोट काटना जैसी बातें आप कीजिए लेकिन जरा सोचिए तो आपका अपना कौन है? मैं वोट बैंक की बात कर रहा हूं. मुस्लिम वोट छिटककर यूपी में सपा तो बिहार में आरजेडी के साथ चला गया. जो बचा थोड़ा जेडीयू और थोड़ा ओवैसी के साथ जा चुका है. क्योंकि उसे भी पता चल चुका है कि अभी आपकी पार्टी के अच्छे दिन नहीं आने वाले. उच्च जाति के लोग भी समझ रहे हैं कि आपको वोट देकर उसे बेकार क्यों किया जाए.
आप भी भाजपा वाला दांव चलिए
अब भाजपा को चुनाव मशीन क्यों कहते हैं यह तो आप 11 साल में समझ ही चुके हैं. हैरानी यह है कि आप कुछ करते क्यों नहीं. यह भी मान लेना चाहिए कि सूझ नहीं रहा तो दूसरों को आगे बढ़ाइए. आप भी भाजपा से नेताओं को तोड़िए उन्हें पद और पहचान दीजिए. देखिए अब से कुछ अच्छा तो जरूर होगा.
भाजपा की स्टाइल
काउंटिंग की शाम को जश्न मनाने के बाद ही भाजपा अगले चुनाव में जुट जाती है. कांग्रेस में महीनों की खामोशी ओढ़ ली जाती है फिर सोशल मीडिया पर आपके नेता जागते हैं. एक दो दौरे होते हैं. आरोप लगाए जाते हैं, आंदोलन कम ही दिखता है. विदेश में आप अंग्रेजी में अच्छा लेक्चर देते हैं लेकिन देश में आप हिंदी में कम कह पाते हैं. फिर कहते कुछ हैं, प्रचारित कुछ और कर दिया जाता है लेकिन आपके नेता उस फेक न्यूज की मजम्मत भी नहीं करते. क्यों?
सच मानिए कांग्रेस के नेता भले ही चिंतित न हों लेकिन हर लोकतंत्र समर्थक आपके प्रदर्शन से बेहद चिंतित है. उम्मीद है कि आप इस पर गंभीर होंगे और न सिर्फ परिवारवाद, जनाधार, पॉजिटिव सोच, हिंदी भाषा के साथ-साथ कुछ नया करने की भी सोचेंगे. बिल्कुल अलग. बाकी तो सब बेकार की बातें हैं. आखिर में इतना ही कहूंगा कि बुरा मत मानिए लेकिन ऐसा लगता है कि आपका वोट बैंक बचा ही नहीं है. आप भी मान लीजिए. आपको फिर से जीरो से इस बैंक को बढ़ाना होगा. और आप कर सकते हैं. थोड़ा टीम बनाइए और कार्यकर्ता भी. भाजपा की रैली में खड़ा कांग्रेस का काडर भी ये चाह रहा होगा.
(यह लेखक के निजी विचार हैं)