सावरकर के सम्मान पर कांग्रेस क्यों परेशान? 'राजनीतिक रुदाली' कब तक

क्या कांग्रेस के नेता, वीर सावरकर का अपमान इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वो कांग्रेस पार्टी के मुख्य विरोधी दल बीजेपी के आदर्श पुरुष हैं?

सावरकर के सम्मान पर कांग्रेस क्यों परेशान?  'राजनीतिक रुदाली' कब तक
वीर सावरकर की वीर गाथा और समाज सुधार के बारे में बताने के लिए इतना कुछ है कि इस पर कई किताबें लिखी जा सकती हैं.

नई दिल्ली: वीर सावरकर को भारत रत्न देने की मांग की जा रही है. इस पर कांग्रेस ने सियासत शुरू कर दी है. आप सोच रहे होंगे कि भारत पर शासन करने वाले अंग्रेज और कांग्रेस की सोच में इतनी समानता क्यों है? क्या कांग्रेस के नेता, वीर सावरकर का अपमान इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वो कांग्रेस पार्टी के मुख्य विरोधी दल बीजेपी के आदर्श पुरुष हैं?  

वीर सावरकर की वीर गाथा और समाज सुधार के बारे में बताने के लिए इतना कुछ है कि इस पर कई किताबें लिखी जा सकती हैं. लेकिन कांग्रेस और उसके दरबारी इतिहासकारों ने हमेशा सावरकर जैसे महानायकों का सच छिपाया है. देश की आज़ादी में उनके योगदान को कम करके दिखाने की कोशिश की है. आज आपको वीर सावरकर के बारे मे पूरी सच्चाई देखकर ये विचार करना चाहिए कि उन्हें भारत रत्न क्यों नहीं मिलना चाहिए.

सबसे पहले ये समझिए कि भारत के राष्ट्रवादी इतिहास में सावरकर का क्या योगदान है. वर्ष 1906 से 1910 के बीच ही सावरकर ने The Indian War of Independence, 1857 नामक एक किताब लिखी थी. इसमें उन्होंने 1857 के विद्रोह को अंग्रेज़ों के खिलाफ पहला स्वतंत्रता संग्राम कहा था. अंग्रेजों ने इस किताब पर प्रतिबंध लगा दिया था.

मार्च 1910 में वीर सावरकर को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ हिंसा और युद्ध भड़काने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. वीर सावरकर पर मुकदमा चलाया गया और वर्ष 1911 में अंडमान द्वीप में 10 वर्षों तक कालापानी की सज़ा दी गई. यहां उन्हें अंग्रेजों के अत्याचार झेलने पड़े और ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वो भारत का असली इतिहास देश के लोगों को बताना चाहते थ.

लेकिन आज़ादी से पहले अंग्रेज सरकार. और स्वतंत्रता मिलने के बाद कांग्रेस सरकार ने कुछ महापुरुषों के योगदान को कम करके दिखाया . सावरकर का ये योगदान देश के लिए कितना महत्वपूर्ण है ये आपको बताएंगे. लेकिन पहले आप पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की एक ऐतिहासिक कविता सुनिए. 

सावरकर ने आगे बताया, "ऐसे में जब नारायण जी ने दरवाजा खोला तब अचानक से किसी ने उनके सर पर ईंट फेंक कर मारा. इस घटना के बाद हमारे परिवार वालों को कहीं भी सिर छिपाने की जगह नहीं मिल रही थी. कोई भी रिश्तेदार डर के मारे उन्हें पनाह देने को तैयार नहीं था. दादाजी इन सब से बेखबर केईएम हॉस्पिटल में भर्ती थे. बिल्कुल यह कांग्रेस के इशारे पर हुआ था उन्होंने यहां के अखबारों में इस खबर को दबा दिया, सिर्फ न्यूयॉर्क टाइम्स और दूसरे विदेशी अखबारों में यह खबर छपी थी."