देश की अर्थव्यवस्था की रफ्तार सुस्त थी तब हिंदुओं को इससे क्यों जोड़ दिया गया था. अब पीएम मोदी ने एक कार्यक्रम में उस बात का जिक्र किया तो इतिहास के पन्ने पलटे जाने लगे. किसने ऐसा कहा था? तब किसकी सरकार थी? कांग्रेस भी बोल रही है. भाजपा से जुड़े लोग वामपंथ को कोसते हैं. पूरा माजरा समझिए.
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भाजपा और संघ से जुड़े विचारक बलबीर पुंज अपनी किताब 'नैरेटिव का मायाजाल' में कम्युनिस्टों को कोसते हुए कहते हैं कि अंग्रेजों के राज में भारतीय अर्थव्यवस्था का जमकर दोहन हुआ. परिणाम यह हुआ कि जो भारत दुनिया की दूसरी बड़ी और समृद्ध व्यापारिक और उत्पादक शक्ति था, वह ब्रिटिश राज की समाप्ति तक सबसे गरीब देशों की बिरादरी का सदस्य बन गया. पुंज के शब्दों में, रही-सही कसर पंडित नेहरू की समाजवादी नीतियों ने पूरी कर दी. उन्होंने लिखा है, 'मुझे याद है कि 1970-80 के दशक में नेहरूवाद जनित समाजवादी व्यवस्था के तहत भारत गरीबी और निम्न विकास दर से जूझ रहा था, जिसमें लोगों को दूध, चीनी, सीमेंट और टेलीफोन जैसी दैनिक उपयोग की वस्तुओं के लिए भी लंबी-लंबी लाइनों में लगना पड़ रहा था. उस समय इन सब चीजों की सार्वजनिक रूप से कालाबाजारी होती थी. तब साल 1978 में वामपंथी अर्थशास्त्री प्रोफेसर राजकृष्ण ने इसके लिए देश की हिंदू सनातन संस्कृति को जिम्मेदार ठहराते हुए 'हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ' शब्दावली का उपयोग किया था.'
पुंज ने अपनी किताब में लिखा है कि वामपंथ के गर्भ से निकला 'हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ'. अब पीएम नरेंद्र मोदी ने एक कार्यक्रम में भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा कि क्या आज कोई इसे हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ कहता है क्या? कुछ समय पहले पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने आगाह करते हुए कहा था कि भारत खतरनाक रूप से हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ के करीब पहुंच चुका है. इसके लिए उन्होंने कहा था कि निवेश के लिए प्राइवेट सेक्टर के पास पैसा नहीं है, इंट्रेस्ट रेट बहुत ज्यादा है जैसा 1950 से 1980 के दशक के बीच होते थे. ग्लोबल ग्रोथ भी कम है.
पीएम ने क्या कहा
पीएम ने उसी दौर की बात करते हुए कहा कि जब भारत 2-3 प्रतिशत ग्रोथ रेट के लिए तरस गया था तब इसे हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ कहा गया. उन्होंने कहा कि किसी देश की अर्थव्यवस्था को वहां रहने वाले लोगों की आस्था और पहचान से जोड़ना गुलामी मानसिकता का प्रतीक था. एक पूरे समाज को गरीबी का पर्याय बना दिया गया. ये साबित करने का प्रयास किया गया कि भारत की धीमी विकास दर का कारण हमारी हिंदू सभ्यता और हिंदू संस्कृति है. मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में भारत की विकास दर 8.2 फीसदी है.
ग्रोथ रेट और हिंदू में क्या कनेक्शन?
हां, पहले समझिए कि ग्रोथ रेट से पता चलता है कि देश की अर्थव्यवस्था किस रफ्तार से बढ़ रही है. अंग्रेजों की गुलामी में रहने के कारण भारत की विकास दर एक प्रतिशत से भी कम थी. आजादी के बाद बढ़ी तो कई कारणों से विकास दर तेज नहीं हो सकी. एक्सपर्ट इसके लिए 1965-66 के पूर्वी भारत में आए अकाल, 1965 और 71 की लड़ाई और इमर्जेंसी जैसे कारण गिनाते हैं. पश्चिम एशिया में युद्ध के चलते तेल के दाम भी बढ़ गए थे. इसी दौरान दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के अर्थशास्त्री प्रो. राजकृष्णा ने भारत की कमजोर विकास दर को हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ का नाम दे दिया था. 1975 की इमर्जेंसी के बाद अर्थव्यवस्था में सुधार देखा गया. 1990 के बाद उदारीकरण के चलते तरक्की तेजी से हुई. आज वैश्विक विकास दर 3 प्रतिशत है लेकिन भारत 8 प्रतिशत के ऊपर.
बलबीर पुंज ने लिखा है कि हिंदू सनातन संस्कृति को जिम्मेदार ठहराते हुए हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ शब्दावली का उपयोग किया था. उन्होंने यह भी कहा है कि मार्क्स और मैकाले के विषाक्त चिंतन को भारत का डिफाल्ट नैरेटिव बना दिया गया. इसी त्रासदी की कोख से वामपंथियों ने हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ के विचार की उत्पत्ति करके यह भी स्थापित करने का प्रयास किया कि सोवियत संघ प्रेरित वाम- समाजवाद के कारण ध्वस्त हुई भारतीय आर्थिकी असल में बहुसंख्यक हिंदुओं के कारण है.
इतिहासकारों ने वामपंथी भ्रम तोड़ा
बलबीर पुंज इसी किताब में आगे लिखते हैं कि प्रसिद्ध आर्थिक इतिहासकारों ने वामपंथी भ्रम को तोड़ा. भारतीय संस्कृति की संपन्नता पर गढ़े गए वामपंथी झूठ और भ्रम को बेल्जियम के बड़े अर्थशास्त्री और इतिहासकार पॉल बैरॉच ने तोड़ा. उन्होंने 1983 में अपने एक शोध के माध्यम से प्रमाणित किया कि 1750 में भारत 24.5 प्रतिशत के साथ विश्व व्यापार में दूसरे स्थान पर तो चीन 33 प्रतिशत के साथ पहले पायदान पर था. यानी 57.5 प्रतिशत वैश्विक हिस्सेदारी अकेले भारत और चीन की थी जबकि अमेरिका (0.1 प्रतिशत) और इंग्लैंड (1.8 प्रतिशत)- दोनों का कुल योग 2 प्रतिशत भी नहीं था.
राजनीति शुरू तो कांग्रेस बोली
हां, इस मुद्दे पर राजनीति भी पर्याप्त हुई. कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा कि हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ के बारे में एक अर्थशास्त्री राज कृष्णा ने कहा था जिन्हें जनता पार्टी की सरकार ने प्लानिंग कमीशन में सदस्य बनाया. जनता पार्टी की सरकार में अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी थे और मोरार जी देसाई पीएम थे. उन्होंने कहा कि पीएम को पता होता तो वह शायद ऐसा न बोलते.
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