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DNA: कश्मीर में डरने लगे 'मजहब के ठेकेदार', मौलाना-उलेमा-इमाम, रडार पर सारे नाम...घाटी की मस्जिदों में बड़ा 'ऑपरेशन'

Kashmir News: पुलिस ने घाटी की सभी मस्जिदों के बारे में विस्तृत जानकारी इकट्ठा करने के लिए एक बड़ा निगरानी अभियान शुरू किया है. हर एक मस्जिद और उससे जुड़े लोगों की जानकारी मांगी जा रही है. मस्जिद के इमाम, मुअज्जिन यानी अजान करने वाले व्यक्ति, खतीब यानी नमाज पढ़ने वाले व्यक्ति और मैनेजमेंट कमिटी के सदस्यों की पर्सनल जानकारी शामिल है. 

DNA: कश्मीर में डरने लगे 'मजहब के ठेकेदार', मौलाना-उलेमा-इमाम, रडार पर सारे नाम...घाटी की मस्जिदों में बड़ा 'ऑपरेशन'

Jammu-Kashmir Mosque Profiling: एक तरफ सरहद पर ऑपरेशन सिंदूर जारी है. वहीं जम्मू कश्मीर में भी एक बड़ा ऑपरेशन शुरु हुआ है. अब जम्मू कश्मीर के मस्जिदों की प्रोफाइलिंग की जा रही है. यानी जम्मू कश्मीर पुलिस ने मस्जिदों के बारे में विस्तृत जानकारी जुटाने का अभियान शुरू किया है.

जम्मू कश्मीर में मस्जिदों की जांच के इस ऑपरेशन का असली मकसद क्या है. मस्जिदों की प्रोफाइलिंग की जरूरत क्यों हैं, चलिए आपको बताते हैं.आपको ये भी पता चलेगा कि कश्मीर की मस्जिदों का वो काला इतिहास क्या है, जिसकी वजह से वो बार बार सवालों के घेरे में आती हैं.

क्यों हो रही प्रोफाइलिंग?

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सबसे पहले आपको ये जानना चाहिए कि जम्मू कश्मीर पुलिस का ये ऑपरेशन है क्या? पुलिस ने घाटी की सभी मस्जिदों के बारे में विस्तृत जानकारी इकट्ठा करने के लिए एक बड़ा निगरानी अभियान शुरू किया है. हर एक मस्जिद और उससे जुड़े लोगों की जानकारी मांगी जा रही है. मस्जिद के इमाम, मुअज्जिन यानी अजान करने वाले व्यक्ति, खतीब यानी नमाज पढ़ने वाले व्यक्ति और मैनेजमेंट कमिटी के सदस्यों की पर्सनल जानकारी शामिल है. पुलिस ने मस्जिद कमेटियों को चार पन्ने का एक फॉर्म भरने को कहा है जिसमें मस्जिदों और मदरसों की डिटेल्स मांगी गई है.

इस फॉर्म में क्या क्या सवाल पूछे गए हैं ये भी आपको जानना चाहिए.

  • मस्जिद का पंथ क्या है- बरेलवी, हनफी, देवबंदी या अहले-हदीस इसके बारे में पूछा गया है.

  • मस्जिद की क्षमता कितनी है, कितने फ्लोर हैं.

  • मस्जिद को बनाने में लागत कितनी आई थी.

  • मस्जिद को फंड कहां से मिलता है.

  • हर महीने का खर्च क्या है.

  • मस्जिद कमेटी से जुड़े लोगों की बैंक अकाउंट डिटेल्स

  • मस्जिद से जुड़े लोगों के आधार कार्ड, वोटर आईडी, PAN कार्ड, पासपोर्ट

  • मस्जिद से जुड़े लोगों की ट्रैवल हिस्ट्री, बैंक अकाउंट डीटेल, ATM/क्रेडिट कार्ड

  • मोबाइल IMEI, सोशल मीडिया हैंडल्स, फैमिली डिटेल्स और फाइनेंशियल स्टेटस के बारे में भी पूछा गया है.

  • फॉर्म में ये भी पूछा गया है कि क्या परिवार में किसी व्यक्ति का टेरर एक्टिविटी लिंक तो नहीं है.

ये सवाल क्यों पूछे जा रहे हैं, अब वह समझ लीजिए. 10 नवंबर को दिल्ली के लाल किला के सामने जो बम धमाका हुआ, उसके तार जम्मू कश्मीर के नौगाम की एक मस्जिद से जुड़े. इसी मस्जिद के इमाम को व्हाइट कॉलर टेरर मॉड्यूल का मास्टरमाइंड बताया गया. इस खुलासे के बाद एक बार फिर घाटी की मस्जिदें सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर आईं. इसी खुलासे के बाद मस्जिदों की प्रोफाइलिंग की जा रही है, ताकि ये इबादत की इस पाक जगह को कट्टरपंथियों और आतंकियों से दूर रखा जा सके. आप ये भी कह सकते हैं, इस समय कश्मीर की उन मस्जिदों को पवित्र करने का ऑपरेशन चल रहा है, जहां आतंकवाद का साया है। और देश विरोधी कट्टरपंथ की घुसपैठ.

राजनीतिक और धार्मिक विवाद में बदला मुद्दा

ये मुद्दा देश की सुरक्षा से जुड़ा है. संवेदनशील है. लेकिन इसे भी धार्मिक चश्मे से देखा जाने लगा. मस्जिदों की प्रोफाइलिंग का मुद्दा राजनीतिक और धार्मिक विवाद में बदल गया. विरोधी कह रहे हैं कि ये मुसलमानों को टारगेट करने का तरीका है. ये गोपनीयता और धार्मिक आजादी का उल्लंघन है. सुरक्षा से जुड़े इस मुद्दे के जरिये कैसे घाटी में डर और अविश्वास पैदा करने की कोशिश की जा रही है, आपको वो जानना चाहिए.

जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ये सवाल कर रही हैं कि मंदिरों और गुरुद्वारा की प्रोफाइलिंग क्यों नहीं की जा रही है. मस्जिदों में ही फॉर्म क्यों बांटे जा रहे हैं. एक सवाल महबूबा मुफ्ती से भी हम करना चाहते हैं.. कि क्या आपने कभी भी घाटी के किसी भी मंदिर या गुरुद्वारे का कोई आतंकी कनेक्शन देखा है. घाटी के मंदिर और गुरुद्वारे आतंक के शिकार रहे हैं. आतंक के पनाहगाह कभी नहीं रहे हैं.

जो लोग घाटी के मस्जिदों की प्रोफाइलिंग का विरोध कर रहे हैं, आज उन्हें कश्मीर के मस्जिदों का वो काला इतिहास एक बार फिर हम याद दिला देते हैं.

  • 1990 के दशक में कश्मीर घाटी में इस्लामिक मिलिटेंट्स मस्जिदों से ही कश्मीरी पंडितों को धमकियां दिया करते थे. मस्जिदों के लाउडस्पीकर से नारे लगाए जाते थे- रलाइव, सलाइव या गलाइव.. यानी इस्लाम कबूल करो, छोड़ो या मर जाओ.

  • प्रोफाइलिंग का विरोध करने वाले लोगों को बडगाम का चरार-ए-शरीफ याद होना चाहिए जहां मई 1995 में मस्त गुल समेत हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकियों ने शरण ली थी, बचकर भागने के लिए आतंकियों ने चरार ए शरीफ को ही आग लगा दी थी.

  • जून 2020 में पंपोर में आतंकवादियों ने मस्जिद की आड़ लेकर सुरक्षाबलों पर हमला किया था, तत्कालीन IGP विजय कुमार ने इसकी पुष्टि की थी.

  • इतिहास के पन्ने पलटने पर ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जब कश्मीर की मस्जिदें कट्टरपंथ और आतंकवाद का गढ़ बन गई थीं. एक वक्त ऐसा भी था जब कश्मीर में पत्थरबाजी की घटनाएं चरम पर थीं.

  • अलगाववादी जमकर एक्टिव थे और उसी दौरान कश्मीर में अचानक 5 हजार आलशान मस्जिदें बनकर तैयार हो गईं.

  • कश्मीर में इन मस्जिदों को कट्टरपंथियों और अलगाववादियों का गढ़ माना जाने लगा. सवाल उठने लगे कि अचानक इतनी मस्जिदें बनवाने की फंडिंग कहां से आ रही हैं.

  • NIA की जांच में ये सामने आया था कि इन मस्जिदों को बनाने के लिए फंडिंग विदेश से हो रही थी.

  • दिल्ली बम धमाके के बाद कश्मीर की मस्जिदें एक बार फिर सवालों के घेरे में खड़ी हो गई हैं. यही वजह है कि घाटी की मस्जिदों की प्रोफाइलिंग हो रही है. यही वजह है कि इन मस्जिदों को चलाने वाले लोगों की एक एक डिटेल खंगाली जा रही है. 

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Rachit Kumar

रचित कुमार जी न्यूज डिजिटल में असिस्टेंट एडिटर हैं. देश, दुनिया और डिफेंस की खबरों को आसान भाषा में बताने में महारत हासिल है. जी न्यूज से मई 2022 में जुड़े और शिफ्ट देखने का 12 साल से ज्यादा का अनु...और पढ़ें

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