सबरीमाला: देवता का चरित्र ब्रह्मचारी, आस्‍था के कारण महिलाओं के प्रवेश का हुआ विरोध

पहले केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 साल से लेकर 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर रोक थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के 28 सितंबर] 2018 के फैसले के बाद सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश की इजाजत दे दी गई.

सबरीमाला: देवता का चरित्र ब्रह्मचारी, आस्‍था के कारण महिलाओं के प्रवेश का हुआ विरोध

नई दिल्‍ली: सबरीमाला मंदिर (Sabrimala Temple) मामले में पुनर्विचार याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को फैसला सुनाने जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विचार याचिका पर खुले कोर्ट में सुनवाई के बाद 6 फरवरी 2019 को फैसला सुरक्षित रख लिया था. सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर 2018 को दिए अपने आदेश में हर उम्र की लड़कियों और महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की इजाजत दे दी थी. इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की गई थी.

1. इस मामले में कुल 65 याचिकाएं दायर की गई थीं. इनमें 56 रिव्यू पिटिशन हैं. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस रोहिंटन नरीमन, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदू मल्होत्रा की बेंच में रिव्यू पिटिशन पर सुनवाई हुई.

2. पहले केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 साल से लेकर 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर रोक थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के 28 सितंबर के फैसले के बाद सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश की इजाजत दे दी गई. केरल में कई संगठनों ने फैसले के खिलाफ प्रदर्शन किए और फिर दर्जनों पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं.

3. सुप्रीम कोर्ट के पुराने फ़ैसले के ख़िलाफ़ दलीलें दी गईं कि संविधान का अनुच्छेद-15 नागरिकों को तमाम सार्वजनिक संस्थानों में प्रवेश का अधिकार देता है लेकिन इस अनुच्छेद में धार्मिक संस्थानों को शामिल नहीं किया गया है. अनुच्छेद-15 (2) सार्वजनिक प्रतिष्‍ठानों में प्रवेश में भेदभाव को रोकता है. ये संस्थान सेक्युलर कैटेगरी में आते हैं. धार्मिक संस्थान इसमें शामिल नहीं हैं.

4. सांविधानिक बेंच के फैसले में दोबारा विचार की जरूरत है. संविधान का अनुच्छेद समाज में छुआछूत को खत्म करने की बात करता है और उस प्रावधान का इस मामले में गलत इस्तेमाल हुआ है क्योंकि किसी विशेष आयु की महिला के प्रवेश पर बैन जातिगत अवधारणा पर आधारित नहीं है. अनुच्छेद-17 छुआछूत के उन्मूलन की बात करता है.

5. सबरीमाला मंदिर में जो मूर्ति हैं उसके चरित्र को देखना होगा और इस पहलू पर विचार करना होगा. सभी देवताओं का अपना चरित्र है. सबरीमाला में देवता का चरित्र नैस्टिक ब्रह्मचारी का है. हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है कि वह मंदिर में पूजा करे लेकिन पूजा का तरीका जो तय है उसी हिसाब से पूजा अर्चना करनी होती है.

6. मासिक धर्म की उम्र वाली महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से वर्चित करना अनैतिक नहीं है बल्कि ये धार्मिक परंपरा है. याचिकाकर्ता त्रावणकोर देवस्वओम बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष की ओर से सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि यहां देवता के चरित्र को देखना होगा. वह ब्रह्मचारी हैं. हिंदुओं में प्रत्येक देवताओं के पूजा और अर्चना के अपने तरीके हैं.

7. आस्था के मामले में अदालत किसी समुदाय विशेष को एक विशेष तरीके से धर्म का पालन करने का निर्देश नहीं दे सकता. ये धार्मिक समुदाय का मामला है जो उनका आंतरिक मसला है. किसी विशेष समुदाय को अदालत ये आदेश नहीं दे सकती कि वह धार्मिक परंपराओं का विशेष तरीके से पालन करे.

8. पुनर्विचार याचिका के विरोध में दलील दी गई कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के रिव्यू का कोई आधार नहीं है. इसमें कोई कानूनी पहलू नहीं उठाया गया है. वहीं विजय हंसारिया ने कहा कि रिव्यू अर्जी के जरिये दोबारा मामले को खोलने की कोशिश की जा रही

है. एक तय उम्र की महिलाओं का प्रवेश वर्जित करना हिंदू धर्म का अभिन्न अंग नहीं है. रिव्यू पिटिशन का वह विरोध करते हैं.

9. त्रावण कोर देवासम बोर्ड की ओर से कहा गया कि कोई भी प्रैक्टिस समानता के अधिकार से वंचित नहीं कर सकता. मंदिर में प्रवेश करने वाली दोनों महिलाओं बिंदु और कनकदुर्गा की ओर से कहा गया कि उन्हें इन्हें सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है. जब ये मंदिर में दाखिल हुई थीं तो उसके बाद मंदिर का शुद्धिकरण किया गया था. इससे ये लगता है कि मासिक धर्म वाली महिलाएं अशुद्ध और प्रदूषित हैं ये दुखद है.

10. बिंदु की मां को जान से मारने की धमकी दी गई है. ये दोनों सामाजिक बहिष्कार की शिकार हुई हैं. इन दोनों महिलाओं को छुआछूत का शिकार होना पड़ा है क्योंकि इनके प्रवेश के बाद मंदिर में शुद्धिकरण किया गया. भगवान अयप्पा महिला और पुरुष में भेद नहीं करते.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला
अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर 2018 को कहा था कि केरल के सबरीमाला मंदिर में हर उम्र की महिलाओं के प्रवेश की इजाजत दी जाती है. सुप्रीम कोर्ट ने 4 बनाम एक से दिए बहुमत के फैसले में कहा था कि 10 साल से लेकर 50 साल की उम्र की महिलाओं का मंदिर में प्रवेश पर बैन लिंग के आधार पर भेदभाव वाली प्रथा है और ये हिंदू महिलाओं के मौलिक अधिकार का हनन करता है.