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World Stammering Day: फोन उठाने से डरते हैं हकलाने वाले लोग

दुनिया भर में 36 करोड़ लोगों को बोलने में तकलीफ यानी स्टैमरिंग की समस्या है. एक अनुमान के मुताबिक साल 2040 तक दुनिया भर में हकलाने वालों की संख्या बढ़कर 45 करोड़ हो जाएगी. 

World Stammering Day: फोन उठाने से डरते हैं हकलाने वाले लोग

नई दिल्ली: आज (22 अक्टूबर) वर्ल्ड स्टटरिंग एंड स्टैमरिंग (Stammering) डे है. स्टैमरिंग (Stammering) का अर्थ है हकलाना. ये एक तरह का स्पीच डिसऑर्डर है जिसमें लोगों को पता होता है कि उन्हें क्या बोलना है लेकिन वो पूरा शब्द या वाक्य एक बार में बोल नहीं पाते. दि इंडियन स्टैमरिंग एसोशिएशन (TISA) के मुताबिक भारत में करीब 1 करोड़ से ज्यादा लोगों को बोलने में तकलीफ होती है या वो हकला कर बोलते हैं. लेकिन उस से भी बड़ी समस्या ये है कि लोग इसे एक जीवनशैली मान कर पूरी जिंदगी इसी में बिता देते हैं . लेकिन हमारे लिए ये जानना बहुत ज़रूरी है की हकलाना कोई बीमारी नही है ये एक तरह की हैबिट है जो की ठीक की जा सकती है.

दुनिया भर में 36 करोड़ लोगों को बोलने में तकलीफ यानी स्टैमरिंग की समस्या है. एक अनुमान के मुताबिक साल 2040 तक दुनिया भर में हकलाने वालों की संख्या बढ़कर 45 करोड़ हो जाएगी. 

इसका बड़ा कारण ये है कि या तो लोग इसका सही तरह से इलाज नहीं कराते या फिर से ठीक करने के लिए कई टोट्के अपनाए जाते हैं. कहीं दिमाग़ की कमी के  चलते बादाम खिलाए जाते हैं तो कहीं बच्चों की जीभ काट कर ठीक करने की कोशिश करते हैं यहां तक की कौवे का झूठा पानी पिलाते हैं. 

स्पीच थेरपिस्ट, डा. सजीव अदलखा बताते हैं कि एक धरना ये भी है की जो लोग हकलाते हैं वो दिमाग़ी रूप से कमज़ोर हैं लेकिन सच्चाई बिलकुल अलग है ...जो लोग हकलाते हैं उनका दिमाग़ दूसरों के मुक़ाबले ज़्यादा तेज़ चलता है इसीलिए उनके स्पीच ऑर्गन उनके दिमाग़ से मैच नही कर पाते.

हकलाने के कारण

  • परिवार में अगर किसी को स्टैमरिंग होती है तो जाने अनजाने में बच्चे सीख जाते हैं
  • साइकोलॉजिकल शॉक या डर
  • सर पर चोट लगने से भी लोग हकलाने लगते हैं.
  • जेनेटिक करणो से भी हो सकती है स्टैमरिंग

स्टैमरिंग एक एसी समस्या है जो हमें भले ही इतनी गंभीर न लगती हो, लेकिन जो इस समस्या से झूझ रहे हैं उन्हे पढ़ाई से लेकर नोैकरी पाने तक. यहां तक की लोगों की पर्सनल लाइफ भी इस से प्रभावित होती है. वर्ल्ड स्टटरिंग एंड स्टैमरिंग डे (world Stammering and stuttering day) पर हमने उन लोगों से बात की जो हंकलाते हैं. लेकिन इस से उभरने का  प्रयास कर रहे हैं.  

हरसिमरन 2 साल से स्पीच थेरपी ले रही हैं. हरसिमरन बताती है की हकलाने की वजह से उसके कभी ज़्यादा दोस्त नही बन पाए,स्कूल में वो किसी से बात नही करती थी बस रोती रहती थी. 2 साल से स्पीच थेरेपी लेने के बाद अब वो काफ़ी इम्प्रूव कर चुकी हैं

शिखा एक CA हैं.. शिखा बताती हैं की बचपन में टाइफ़ॉड होने की वजह से वो हकलाने लगीं....स्कूल में अटेंडेंस के वक़्त उनके मुंह से येस मैडम नहीं निकलता था. पढ़ाई के वक़्त क्लास बंक कर लेती थी की मज़ाक़ बनेगा. कॉलेज में रैगिंग ना हो इसके लिए पत्राचार किया.

 

नितेश (ये ज़्यादा हकलाते हैं)....नितेश हकलाने की वजह से कभी फ़ोन नही उठाते थे....रिश्तेदारों से तक बात नही करते थे.....इंटर्व्यू के वक़्त जवाब आते हुए भी सही से जवाब नही दे पाते थे जिसके चलते बहुत बार इंटर्व्यू में रेजेक्ट हुए.....जब मैं बोलता हु तो लोग इंतज़ार करते हैं की कब ख़त्म होगा....लेकिन अब मैं स्पीच थेरेपी ले रहा हूं.

स्पीच थेरेपी के बारे में जानकारी देते हुए स्पीच थेरेपिस्ट सीमा अदलखा ने बताया कि लोग थेरपी से डरते हैं उन्हे लगता है कि वो किसी बिमारी का इलाज कराने आए हैं. जब्कि  ये कोई सर्जरी नही है ये एक तरह की एक्सरसाइज है जिसकी प्रैक्टिस  कराई जाती है. छोटे बच्चों को थेरेपी भी नहीं दी जाती इसके लिए बच्चों के मां-बाप को ट्रेनिंग दी जाती है कि वो बच्चों को एक्सरसाइज कराएं और उनसे कैसे बात करें.