Yuva Diwas 2020: शिकागो में स्वामी विवेकानंद ने दिया था ऐतिहासिक भाषण, पढ़कर हर भारतीय को होगा गर्व

स्वामी विवेकानंद को युवा शक्ति का प्रतीक माना जाता है. आज यानी 12 जनवरी को विवेकानंद की जयंती है.

Yuva Diwas 2020: शिकागो में स्वामी विवेकानंद ने दिया था ऐतिहासिक भाषण, पढ़कर हर भारतीय को होगा गर्व
स्वामी विवेकानंद को युवा शक्ति का प्रतीक माना जाता है

नई दिल्ली: स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) को युवा शक्ति का प्रतीक माना जाता है. आज यानी 12 जनवरी को विवेकानंद की जयंती है. उनकी जयंती को हर साल राष्ट्रीय युवा दिवस (National Yuva Diwas) के रूप में मनाया जाता है. भारत सरकार द्वारा 1984 में सबसे पहले इसे राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की गई थी. स्वामी विवेकानंद मानते थे कि युवा होने का अर्थ शरीर से बलवान होना ही नहीं है बल्कि जो मानसिक रूप से मजबूत हो, वह भी युवा है. 

स्वामी विवेकानंद ने कहा था, 'मेरा विश्वास युवा पीढ़ी में है, नई पीढ़ी में है. भारतीय युवा शेरों की तरह सभी समस्याओं का हल निकालेंगें.' 12 जनवरी को युवा दिवस मनाने का एक प्रमुख उद्देश्य ये भी है कि भारत का युवा स्वामीजी के आदर्शों और विचारों को जानें और उनसे प्रेरणा लें. स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 में एक कुलीन परिवार में हुआ था. उनके बचपन का नाम नरेंद्र था. वह रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे.

विवेकानंद का निधन महज़ 39 साल की उम्र में 4 जुलाई 1902 को हो गया था. उन्होंने पश्चिम बंगाल में हुगली नदी के पश्चिमी तट पर स्थित बेलूर मठ में देह त्याग दी थी. स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में 11 सितंबर 1893 में आयोजित विश्व संसद में एक भाषण दिया था. इस भाषण ने विवेकानंद को दुनिया की नजरों में ला दिया था. ये रहा भाषण...

अमेरिका के बहनों और भाईयों..!!
आपके इस स्नेहपूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा हृदय अपार हर्ष से भर गया है. मैं आपको दुनिया की सबसे प्राचीन संत परंपरा की तरफ से धन्यवाद देता हूं. मैं आपको सभी धर्मों की जननी की तरफ से धन्यवाद देता हूं और सभी जाति, संप्रदाय के लाखों, करोड़ों हिन्दुओं की तरफ से आपका आभार व्यक्त करता हूं. मेरा धन्यवाद कुछ उन वक्ताओं को भी जिन्होंने इस मंच से यह कहा कि दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदूर पूरब के देशों से फैला है. मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है. हम सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते, बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं.

11 सितंबर की तारीख दो घटनाओं के कारण ऐतिहासिक है. पहला, 11 सितंबर, 1893 को स्‍वामी विवेकानंद ने अमेरिका के शिकागो में आयोजित धर्म संसद में प्रसिद्ध भाषण दिया. उसमें पूरब के चिंतन के बारे में पश्चिम को बताया. दूसरा, 11 सितंबर, 2001 को अमेरिका के वर्ल्‍ड ट्रेड सेंटर पर अलकायदा ने आतंकी हमला कर उसको जमींदोज कर दिया. इस हमले के बहुत पहले ही स्‍वामी विवेकानंद ने यह बात कही थी कि दुनिया में धर्म के नाम पर सबसे ज्‍यादा रक्‍तपात हुआ है. कट्टरता और सांप्रदायिकता मानवता के सबसे बड़े दुश्‍मन हैं.

संभवतया इन्‍हीं अर्थों के कारण 126 साल गुजरने के बावजूद स्‍वामी विवेकानंद का वह भाषण सामयिक और प्रासंगिक बना हुआ है. इसकी सार्थकता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पिछले साल इस भाषण के 125वें वार्षिक दिवस पर पीएम नरेंद्र मोदी ने जनता को संबोधित करने का फैसला किया था. इस भाषण और उसके गूढ़ अर्थों की अब भी लगातार व्‍याख्‍या हो रही है. इस संदर्भ में उस भाषण के अंश और उसके महत्‍व पर आइए डालते हैं एक नजर:

अमेरिका के बहनों और भाईयों..!!
आपके इस स्नेहपूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा हृदय अपार हर्ष से भर गया है. मैं आपको दुनिया की सबसे प्राचीन संत परंपरा की तरफ से धन्यवाद देता हूं. मैं आपको सभी धर्मों की जननी की तरफ से धन्यवाद देता हूं और सभी जाति, संप्रदाय के लाखों, करोड़ों हिन्दुओं की तरफ से आपका आभार व्यक्त करता हूं. मेरा धन्यवाद कुछ उन वक्ताओं को भी जिन्होंने इस मंच से यह कहा कि दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदूर पूरब के देशों से फैला है. मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है. हम सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते, बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं.