ZEE जानकारी: गढ़चिरौली में नक्सली हमला, 15 पुलिस कर्मियों सहित 16 लोगों की गई जान

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में एक बड़ा नक्सली हमला हुआ है. जिसमें स्थानीय पुलिस की Quick Reaction Team के 15 जवान शहीद हो गए हैं. इस हमले में Quick Reaction Team की गाड़ी चला रहा एक Driver भी मारा गया है. 

ZEE जानकारी: गढ़चिरौली में नक्सली हमला, 15 पुलिस कर्मियों सहित 16 लोगों की गई जान

बुधवार को महाराष्ट्र दिवस है. लेकिन बुधवार का दिन महाराष्ट्र के लिए बहुत गहरी पीड़ा और आक्रोश लेकर आया है. 

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में आज घने जंगलों के बीच दोपहर साढ़े 12 बजे एक बड़ा नक्सली हमला हुआ है. जिसमें स्थानीय पुलिस की Quick Reaction Team के 15 जवान शहीद हो गए हैं. इस हमले में Quick Reaction Team की गाड़ी चला रहा एक Driver भी मारा गया है. इस हमले के लिए नक्सलियों ने Land Mine Blast किया था.

इस षडयंत्र की शुरुआत, देर रात क़रीब 2 बजे ही हो गई थी. दो बजे से पांच बजे के बीच कुरखेड़ा तहसील के दादापूरा गांव में नक्सलियों ने अचानक 27 वाहनों में आग लगा दी. नक्सलियों को पता था, कि इस आगज़नी के बाद सुरक्षा बलों का मूवमेंट जरूर होगा. और वो इसी मौके की तलाश में थे. ताकि हमला किया जा सके. सुरक्षा बलों को भी नक्सलियों द्वारा अपनी गाड़ियों को निशाना बनाए जाने की आशंका थी. इसीलिए Quick Reaction Team ने नक्सलवादियों को चकमा देने के लिए प्राइवेट गाड़ी को Hire किया गया. ताकि नक्सलियों को चकमा दिया जा सके. लेकिन इसके बाद भी नक्सली कामयाब हो गए.

इसका सीधा सा मतलब ये है, कि नक्सलियों को हमारे जवानों के Movement के बारे में पूरी जानकारी थी. Reports के मुताबिक हमारे जवानों की टीम ने दोपहर करीब 12 बजे एक पेट्रोल पंप पर गाड़ी में तेल भरवाया था. और बताया जा रहा है, कि शायद यहीं से किसी ने नक्सलियों को जवानों के Movement की खबर दे दी. और फिर नक्सलवादी अपने इरादों में कामयाब हो गए. 

गढ़चिरौली, देश का एक ऐसा इलाका है, जिसे Red Corridor में शामिल किया गया है. Red Corridor का मतलब है वो जगह जहां नक्सलवादी सबसे ज़्यादा सक्रिय हैं. इस वक़्त देश के 11 राज्य नक्सल प्रभावित हैं. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षाबलों ने नक्सलियों की रीढ़ की हड्डी तोड़ रख दी है. 2014 में देश के 161 ज़िले नक्सल प्रभावित थे. लेकिन अब ये संख्या सिर्फ 90 रह गई है. 2014 के बाद से 1 हज़ार 900 से ज़्यादा नक्सलवादियों को गिरफ्तार किया गया. जबकि 700 नक्सलियों को सरेंडर करना पड़ा. यानी नक्सलवादी हताश और निराश हैं. और इसी हताशा में अब वो इस तरह के हमले कर रहे हैं. 

हमारे देश के बहुत सारे लोगों ने नक्सलवादियों के बारे में अखबारों में और किताबों में पढ़ा होगा, और उन्हें फिल्मों में देखा होगा. आपको लगता होगा कि नक्सलवादी आपसे बहुत दूर हैं और वो आप तक कभी नहीं पहुंचेंगे. लेकिन सच ये है कि नक्सलवादियों और उनकी सोच का समर्थन करने वाले आपके आसपास ही मौजूद हैं. ऐसे लोगों को ही Urban Naxals की संज्ञा दी गई है. दूसरी भाषा में कहें, तो Urban Naxals और आज़ादी गैंग एक ही है. 

जब भी देश के टुकड़े करने की बात होती है तो शहरों में रहने वाले नक्सली, आज़ादी गैंग में शामिल हो जाते हैं और देश को तोड़ने वाले नारे लगाने लगते हैं. उनका समर्थन करते हैं. JNU में ऐसा ही हुआ था. 2016 में JNU में जब भारत के टुकड़े करने वाले नारे लगे थे और पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगे थे. तब भी कुछ लोग, आज़ादी गैंग का समर्थन कर रहे थे. और आज भी यही लोग उनके समर्थन में लाल सलाम के नारे लगाते हैं. इसलिए आज ऐसे लोगों को भी Expose करने का दिन है. 

JNU वाले कन्हैया कुमार का नाम तो आप जानते होंगे. उन्होंने इस बार के लोकसभा चुनाव में CPI के टिकट पर चुनाव लड़ा है. तीन साल पहले JNU में कन्हैया कुमार, टुकड़े-टुकड़े गैंग के कप्तान हुआ करते थे. और इस बार लोकसभा चुनाव के प्रचार में कन्हैया कुमार ने अपनी उसी टीम को मैदान में उतारा था, जो उनके विचारों का समर्थन करती है. 

इस लिस्ट में गीतकार जावेद अख़्तर, अभिनेत्री शबाना आज़मी, अभिनेत्री स्वरा भास्कर, अभिनेता प्रकाश राज, दलित नेता जिग्नेश मेवानी, JNU की छात्र नेता शेहला राशिद, और सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ जैसे नाम शामिल हैं. इसके अलावा Social Media पर भी लाल सलाम वाली सोच को बढ़ावा देने वालों ने कन्हैया कुमार के लिए चुनाव प्रचार किया. इसलिए आज ये समझने का भी दिन है, कि इन लोगों ने गढ़चिरौली में हुए नक्सलवादी हमले और उसमें शहीद हुए 15 जवानों की शहादत के बाद, क्या प्रतिक्रिया दी है. 

शुरुआत कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी से करते हैं क्योंकि उन्होंने 2016 में JNU में देशविरोधी नारेबाज़ी करने वाले छात्रों का समर्थन किया था. राहुल गांधी को आज गढ़चिरौली में हुए हमले से गहरा धक्का लगा है. उन्होंने पीड़ित परिवारों के प्रति अपनी संवेदना जताई है. 

लेकिन तीन साल पहले जब JNU में भारत की बर्बादी के नारे लग रहे थे. लाल सलाम के समर्थक भारत के सुरक्षाबलों पर हल्ला बोल रहे थे. देश को तोड़ने की बात कर रहे थे. उस वक्त यही राहुल गांधी थे, जिन्होंने JNU जाकर ना सिर्फ इन लोगों का समर्थन किया था. बल्कि एक लम्बा चौड़ा भाषण भी दिया था. आज राहुल गांधी की तीन साल पुरानी वो बात याद करनी ज़रुरी है.

गीतकार जावेद अख्तर ने भी आज हुए नक्सली हमले को आतंकवाद की श्रेणी में रखा है. और कहा है, कि इसे बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए.

लेकिन, उनका दोहरा मापदंड देखिए. आज हुए नक्सली हमले को उन्होंने आतंकवाद तो बता दिया. लेकिन, कुछ दिन पहले ही उन्होंने कन्हैया कुमार के समर्थन में बेगुसराय जाकर लम्बा-चौड़ा भाषण दिया था.और भारत के हित की बात करने वालों को टुकड़े-टुकड़े गैंग की श्रेणी में डाल दिया था.

आज भी उसे वही कहेंगे, टुकड़े-टुकड़े गैंग. अरे टुकड़े-टुकड़े गैंग तो तुम हो. तुम कर क्या रहे हो, सुबह से शाम. तुम इस देश की आबादी के टुकड़े ही तो करने की कोशिश कर रहे हो, और क्या कर रहे हो ? टुकड़े-टुकड़े गैंग तुम हो. अब फिल्म अभिनेत्री स्वरा भास्कर का दोहरा रवैया देखिए. 

गढ़चिरौली में नक्सली हमला आज दोपहर साढ़े 12 बजे हुआ. इसके चार घंटे बाद स्वरा भास्कर ने नक्सली हमले की निन्दा की. और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की.

लेकिन, इस Tweet को देखकर हमें बेगुसराय की उन तस्वीरों की याद आई, जब इन्होंने कन्हैया कुमार के समर्थन में भाषण दिया था. और बड़े फक्र से, लाल सलाम के नारे लगाए थे. ये वही लाल सलाम है, जो ना सिर्फ नक्सलवादियों का पसंदीदा शब्द है, बल्कि उनका नारा है. वैसे तो लाल रंग को क्रांति का प्रतीक माना जाता है. लेकिन नक्सलियों ने इसे भारतीय लोकतंत्र का रक्त बहाने का प्रतीक बना दिया है. 

कन्हैया पर झूठा आरोप लगाकर, उसे देशद्रोही बताकर, उसे दिल्ली के तिहाड़ जेल में बंद किया. बेगुसराय की मिट्टी देशद्रोही पैदा नहीं करती. बेगुसराय की मिट्टी क्रांतिकारी पैदा करती है. कन्हैया प्रतीक है उन आदर्शों की, जिनके दम पर इस देश की नींव रखी गई थी, इस गणतंत्र की नींव रखी गई थी. कन्हैया कुमार, कन्हैया कुमार, कन्हैया कुमार. और कन्हैया आपको मैं बस इतना कहना चाहूंगी, कि जिया हो बिहार के लाला. जय हिन्द, जय भीम, लाल सलाम. आप सभी को मेरी तरफ से जिया हो बिहार के लाला.

इसी लिस्ट में JNU की छात्र नेता शेहला राशिद का भी नाम है. इन्होंने अभी तक नक्सली हमले में शहीद हुए जवानों के सम्मान में कोई Tweet नहीं किया है.

लेकिन, जब लाल सलाम करने वालों को समर्थन देने की बात आती है, तो ये लोग बिहार के बेगुसराय पहुंच जाते हैं. और वहां जाकर, कन्हैया कुमार के पक्ष में लाल सलाम के नारे लगाते हैं.

जब हम लोग JNU में छात्र यूनियन में थे, वहां पर हम अलग-अलग पार्टी से थे. लेकिन हमें साथ में चलना सिखाया कन्हैया भाई ने.साथ में काम करना सिखिया कन्हैया भाई ने. हर एक आदमी के लिए काम करना आता है कन्हैया कुमार को और यही कन्हैया कुमार की खासियत है. इसीलिए पूरे देश के युवा आज इनके साथ हैं. आपसे इसी गुज़ारिश के साथ विदा लेती हूं, कि आप हमारे भाई को संसद में पहुंचाएंगे, नहीं तो बहुत नाइंसाफी होगी, बहुत से मज़लूमों की आवाज़ संसद से बाहर रह जाएगी. शुक्रिया, इंकलाब ज़िन्दाबाद, जय भीम, लाल सलाम. 

अभी हमने कुछ लोगों के दोहरे चरित्र को एक्सपोज़ किया. लेकिन ये विचारधारा सिर्फ इन लोगों तक सीमित नहीं है.. ये बड़े बड़े शहरों में फैल चुकी है. इस विचारधारा के लोगों का मकसद होता है.. शहरी इलाकों में रहकर नक्सलवादियों के पक्ष में माहौल बनाना. ऐसे लोग लेखक हो सकते हैं, शिक्षक हो सकते हैं, प्रोफेसर हो सकते हैं, पत्रकार हो सकते हैं, फिल्मों के निर्देशक हो सकते हैं, गीतकार हो सकते हैं. अभिनेता या अभिनेत्री हो सकते हैं. और सामाजिक कार्यकर्ता भी हो सकते हैं. ऐसे लोग देश के बड़े-बड़े शहरों में खुलेआम घूमते हैं और नक्सलवाद का एजेंडा चलाते हैं. ऐसे लोग खुद को बुद्धिजीवी बताते हैं...और बड़े बड़े Literature Festivals में कॉफी पीते हुए नक्सलवादी एजेंडे को Push करते हैं. हैरानी इस बात की है कि हमारे देश के Mainstream Media में इन सफेदपोश लोगों को बेनक़ाब नहीं किया जाता. 

अब इसी पहलू को श्रीलंका की नज़रों से देखने की कोशिश कीजिए. वहां आत्मघाती हमला हुआ, बम धमाके हुए, तो श्रीलंका ने क्या किया ? श्रीलंका में बुर्का या चेहरा ढकने वाले परिधान पहनने पर पाबंदी लगा दी गई. इस धमाके में शामिल हमलावरों के परिवार वालों को गिरफ्तार किया गया. उनपर शिकंजा कसा गया. लेकिन वहां के लोगों ने इस कार्रवाई के खिलाफ कोई एजेंडा नहीं चलाया गया. श्रीलंका में हर वर्ग के लोगों ने सरकार के फैसले का समर्थन किया. इस वक्त भारत में भी ऐसी ही प्रतिक्रिया की ज़रुरत है. ताकि नक्सलवाद और आतंकवाद, दोनों को जड़ से ख़त्म किया जा सके.

सोचने वाली बात ये है कि कश्मीर में जो आतंकवादी हैं, उन्हें हम ये कहकर मार कर देते हैं कि वो बाहर से आए हैं जबकि नक्सलियों को इस बात का डिस्काउंट मिल जाता है कि ये अपने ही लोग है, इसलिए इनके साथ नरमी बरतनी चाहिए. इन पर कड़ी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए. आज इस सोच को बदलने का दिन है. क्योंकि इसका फायदा उठाकर नक्सलवादी हमारा खून बहाते हैं.

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