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ZEE जानकारी: अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट पहुंची केंद्र सरकार

 केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक नई अर्ज़ी दायर की है.

ZEE जानकारी: अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट पहुंची केंद्र सरकार

आज हम सबसे पहले केन्द्र सरकार की उस अर्ज़ी का विश्लेषण करेंगे, जिसकी वजह से देश के 107 करोड़ हिंदुओं को उम्मीद की एक नई किरण दिखी है. हम अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की बात कर रहे हैं. जो पिछले कई दशकों से अदालत की धीमी प्रक्रियाओं में अटका हुआ है.

अयोध्या में रामलला को एक टेंट में देखकर, इस देश के करोड़ों हिंदुओं का हृदय पिछले कई वर्षों से, बार बार छलनी होता रहा है. राम जन्मभूमि के मालिकाना हक़ को लेकर अभी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू नहीं हुई है. लेकिन आज केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक नई अर्ज़ी दायर की है. इस अर्ज़ी के बारे में आप सुबह से सुन रहे होंगे. लेकिन क्या आपको ये समझ में आया कि इस अर्ज़ी में क्या है? 

ज़ाहिर है, किसी ने भी सरल भाषा में आपको इसके बारे में नहीं बताया होगा.. लेकिन चिंता की बात नहीं है. क्योंकि हम इस पूरे मामले का गहरा DNA टेस्ट करेंगे. 
सबसे पहले आपको इस मामले की पृष्ठभूमि को समझना पड़ेगा. इसके बाद ही आपको आज की ये अर्ज़ी समझ में आएगी. 

6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा गिराया गया. 
इस विवादित ज़मीन पर बाबरी मस्जिद बनी हुई थी. 
हिंदू पक्ष का दावा है कि ये मस्जिद.. मुगल बादशाह बाबर ने राम मंदिर तोड़कर बनवाई थी. 

अब यहां ये समझने की ज़रूरत है कि विवाद सिर्फ 0.313 एकड़ ज़मीन पर था. जिसे विवादित माना गया और इसी ज़मीन पर विवादित ढांचा बना हुआ था. आसान भाषा में कहें तो 0.313 एकड़ ज़मीन, करीब 1515 गज के बराबर होती है.

लेकिन 1993 में केन्द्र सरकार ने इस विवादित ज़मीन के साथ साथ, इसके आस पास की 67.703 एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण कर लिया. 

इस अधिग्रहण के लिए एक कानून बनाया गया, जिसे अयोध्या एक्ट 1993 का नाम दिया गया. 

लेकिन सरकार के इस फैसले को इस्माइल फारुख़ी नामक एक व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी. 

हालांकि अक्टूबर 1994 में.. जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया, तो अदालत ने इस अधिग्रहण को सही ठहराया. 

इसके बाद ये मामला 2003 में एक बार फिर उठा, जब विश्व हिंदू परिषद ने इस जगह पर शिलापूजन करने का फैसला किया. 

ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. और इस मामले में याचिका दायर करने वाले व्यक्ति का नाम था... असलम भूरे. अदालत ने असलम भूरे की याचिका पर फैसला सुनाया और पूरी 67.703 एकड़ जमीन पर यथास्थिति रखने का आदेश दिया . 

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विवादित और गैर विवादित ज़मीन को अलग करके नहीं देखा जा सकता. 

ये तो इस मामले की पृष्ठभूमि थी, जिसमें हमने आपको ये बताया कि विवादित ज़मीन कितनी थी, और बाकी की गैर विवादित ज़मीन कितनी थी? अब ये समझिए कि आज सरकार ने, सुप्रीम कोर्ट में क्या अर्ज़ी लगाई है? 

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अर्ज़ी दायर करके, इन अतिरिक्त ज़मीनों को उनके मालिकों को सौंपने की इजाज़त मांगी है. 

अपनी याचिका में केन्द्र सरकार ने कहा है कि अयोध्या में सिर्फ 0.313 एकड़ ज़मीन ही विवादित है, इसके अलावा बाकी की ज़मीन पर कोई विवाद नहीं है. 

बाकी की करीब 67 एकड़ ज़मीन में से 42 एकड़ ज़मीन राम जन्मभूमि न्यास की है. 

इस याचिका में लिखा गया है कि राम जन्मभूमि न्यास और बाकी के मालिकों को ज़मीन लौटाने में केन्द्र सरकार को कोई आपत्ति नहीं है. 

सुप्रीम कोर्ट ने 31 मार्च 2003 को ये आदेश दिया था कि यथास्थिति बरकरार रखी जाए. 
इस पर सरकार का ये तर्क है कि यथास्थिति तब तक ही बरकरार रहनी थी, जब तक कि इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला नहीं आ जाता. हाईकोर्ट का फैसला, सितंबर 2010 में आ चुका है. लिहाज़ा अब यथास्थिति हटाने में कोई भी कानूनी अड़चन नहीं है. 

हम आपको बता चुके हैं कि अयोध्या एक्ट 1993 के तहत 7 जनवरी 1993 को केन्द्र सरकार ने कुल 67.703 एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण किया था, जिसमें 0.313 एकड़ की विवादित ज़मीन और उसके आसपास की ज़मीन भी शामिल थी, जिस पर कोई विवाद नहीं था. 

सरकार ये कह रही है कि विवादित ज़मीन 0.313 एकड़ है, जिस पर विवादित ढांचा बना हुआ था. 

सरकार का कहना है कि मुसलमानों ने सिर्फ 0.313 एकड़ की विवादित ज़मीन पर ही अपना दावा किया था, जहां विवादित ढांचा था. 

इसके अलावा ज़मीन का और कोई भी दूसरा हिस्सा ऐसा नहीं जिस पर मुस्लिम पक्ष ने अपना दावा जताया हो. 

पूरी 67.7 एकड़ ज़मीन के किसी भी दूसरे हिस्से पर कोई विवाद नहीं है. 

उस वक्त आस पास के इलाके की पूरी 67.7 एकड़ जमीन इसलिए अधिग्रहित की गई थी, ताकि जिसके भी पक्ष में फैसला आए, उसके लिए वहां पहुंचने के लिए रास्ता बनाया जा सके. 

ऐसा नहीं है कि इस ज़मीन को वापस लेने की कोशिश नहीं की गई. 1994 में जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया था, उसके बाद एक मुख्य पक्ष - राम जन्मभूमि न्यास अपनी ज़मीन वापस लेने के लिए केन्द्र सरकार के पास गया था. 

राम जन्मभूमि न्यास ने 6 जून 1996 को केन्द्र सरकार के पास गया और ये मांग उठाई... कि 1993 में उनकी जो ज़मीन अधिग्रहित की गई थी, उसे वापस कर दिया जाए. 

लेकिन 14 अगस्त 1996 को केन्द्र सरकार ने राम जन्मभूमि न्यास को जवाब दिया कि उन्हें ज़मीन वापस नहीं दी जा सकती. 

उस वक्त केन्द्र सरकार ने ये तर्क दिया था कि राम जन्मभूमि न्यास की मांग पर तभी विचार किया जा सकता है, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट में विवादित ज़मीन के मालिकाना हक का फैसला आ जाए. क्योंकि उस वक्त इस मामले की सुनवाई इलाहाबाद हाईकोर्ट में चल रही थी. 

इसके बाद 1997 में राम जन्मभूमि न्यास... केन्द्र सरकार के फैसले के खिलाफ, सुप्रीम कोर्ट में भी गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि न्यास की याचिका खारिज कर दी थी

अब आपको एक नक्शे के माध्यम से ये समझाते हैं कि ये विवादित ज़मीन कहां पर है और उसके अगल-बगल क्या है? 

इस नक्शे में जहां आपको रामलला विराजमान दिख रहे हैं, वही विवादित ज़मीन है. और ये ज़मीन 0.313 एकड़ की है. दिसंबर 1992 से पहले यहां पर विवादित ढांचा था. 

इसके अलावा बाकी की विवादित ज़मीन पर कोई भी विवाद नहीं है. और ना ही इस ज़मीन पर मुस्लिम पक्ष ने अपना दावा जताया है. 

अयोध्या विवाद पर अदालत में तीन पक्ष हैं . पहला पक्ष है- निर्मोही अखाड़ा, दूसरा पक्ष है - रामलला विराजमान...और तीसरा पक्ष है- सुन्नी वक्फ बोर्ड . 

इससे पहले इस मामले में ज़मीन के मालिकाना हक को लेकर 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया था. 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा था कि 2.77 एकड़ की विवादित ज़मीन को 3 बराबर हिस्सों में बांट दिया जाए . जिस जगह पर रामलला की मूर्ति है, उसे रामलला विराजमान को दे दिया जाए . राम चबूतरा और सीता रसोई वाली जगह निर्मोही अखाड़े को दे दी जाए . और बचा हुआ एक-तिहाई हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दे दिया जाए . 

लेकिन इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई . और इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के 8 वर्षों के बाद भी सुप्रीम कोर्ट इस पर सुनवाई शुरू नहीं कर पाया है. 

इससे पहले ये पूरा मामला 1995 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल हुआ था. और हाईकोर्ट का फैसला आते आते 15 वर्ष बीत गये. 

अब मैं इस अर्ज़ी के कुछ महत्वपूर्ण हिस्से आपके लिए पढ़ना चाहता हूं. पहला हिस्सा है इस्माइल फारुखी केस का. जो 1994 में आया था. 

और दूसरा फैसला है असलम भूरे केस का, जो 2003 में आया था. जब विश्व हिंदू परिषद ने शिला पूजन की घोषणा की थी और इसके खिलाफ असलम भूरे सुप्रीम कोर्ट चले गए थे. तब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला देकर यथास्थिति बरकरार 
रखने को कहा था. 

अब आपको ये बताते हैं कि इसे केन्द्र सरकार का Smart Move क्यों कहा जा रहा है? और इस अर्ज़ी का असर क्या होगा? 
अब या तो सुप्रीम कोर्ट इस अर्ज़ी को खारिज कर देगा. और ये कहेगा कि जब मामला 2003 का है, तो फिर आप 16 साल के बाद सुप्रीम कोर्ट क्यों आ रहे हैं. यही आरोप कांग्रेस भी लगा रही है. 

अगर ऐसा हुआ तो सरकार के पास राम मंदिर बनाने के लिए अध्यादेश लाने का रास्ता खुल जाएगा. अगर अभी सरकार अध्यादेश लेकर आती है, तो ये कहा जाएगा कि जब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है, तो सरकार ऑर्डिनेंस क्यों ला रही है? और इसे सरकार से सीधा टकराव समझा जाएगा. 

लेकिन अगर सुप्रीम कोर्ट सरकार की इस अर्ज़ी को खारिज करता है, तो सरकार के सामने ये कहने का विकल्प होगा कि हमारी अर्ज़ी को खारिज किया गया, इसलिए हम ऑर्डिनेंस लेकर आ रहे हैं. 

और अगर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की अर्ज़ी मंज़ूर कर ली और ये कह दिया कि गैर विवादित क्षेत्र की ज़मीनें उनके मालिकों को लौटाई जा सकती हैं, तो फिर राम मंदिर के निर्माण का रास्ता, आंशिक रूप से साफ हो जाएगा. 

सरकार इस बाकी के हिस्से में राम मंदिर का निर्माण करवा पाएगी. जो विवादित जगह है, उस जगह पर कोई निर्माण नहीं होगा. और उसके आस पास के पूरे इलाके में राम मंदिर का निर्माण शुरू हो जाएगा. 

अभी तक राम मंदिर पर सरकार के रुख से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और पार्टी का काडर काफी नाराज़ था. इस फैसले से इन तीनों की नाराजगी दूर होगी.

साथ ही इससे विपक्ष को भी जवाब मिलेगा. विपक्ष ये आरोप लगाता है कि बीजेपी राम मंदिर का निर्माण नहीं करना चाहती. बल्कि चुनाव के समय सिर्फ इसका राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश करती है. 

इसके अलावा उत्तर प्रदेश में बीजेपी के लिए ये फैसला रामबाण साबित हो सकता है. क्योंकि उत्तर प्रदेश में बीएसपी और समाजवादी पार्टी का गठबंधन हो चुका है और कांग्रेस भी प्रियंका वाड्रा को मैदान में उतार चुकी है. ऐसे में बीजेपी ये चाहती है कि राम मंदिर के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो जाए और इसका श्रेय उसे मिले.

अब आपको ये समझाते हैं कि बीजेपी राम मंदिर बनाने के लिए अध्यादेश कैसे ला सकती है? 

अध्यादेश केंद्र सरकार का एक विशेषाधिकार है. संविधान के अनुच्छेद-123 के तहत सरकार किसी भी मामले में अध्यादेश ला सकती है. इसकी ज़रूरत तब पड़ती है, जब सरकार किसी विषय पर कानून बनाने के लिए बिल लाना चाहे, लेकिन संसद का सत्र न चल रहा हो. 

अब अगर सुप्रीम कोर्ट से राम मंदिर के फैसले में देरी होती है, तो सरकार अध्यादेश ला सकती है, लेकिन इसके फायदे भी हैं और नुकसान भी. 

इसका फायदा ये है कि राम मंदिर आंदोलन के जो समर्थक हैं वो खुश हो जाएंगे और इससे बीजेपी को बड़ी संख्या में हिंदुओं के वोट मिल सकते हैं. देश में 107 करोड़ हिंदू हैं. और इस बार के चुनावों में 70 करोड़ से ज्यादा हिंदू वोट करेंगे. 

हालांकि अगर सरकार अध्यादेश लेकर आई, तो 2019 के चुनावों में उसे मुस्लिम वोटों का नुकसान उठाना पड़ेगा. 

2014 के चुनावों में बीजेपी को 8.5% अल्पसंख्यक वोट मिले थे. 2019 में करीब 12 करोड़ अल्पसंख्यक वोट होंगे, यानी इस हिसाब से बीजेपी के करीब 1 करोड़ अल्पसंख्यक वोट हैं. हालांकि ट्रिपल तलाक पर अध्यादेश के बाद ऐसा माना जा रहा है कि बीजेपी के इस वोट प्रतिशत में इज़ाफा हो सकता है. लेकिन अध्यादेश लाने से बीजेपी की ये बढ़त बर्बाद हो जाएगी.

इस अध्यादेश के खिलाफ अदालतों में बड़ी संख्या में याचिकाएं दाखिल होंगी. इससे ये मामला नए मुकदमों के बोझ से दब सकता है. 

अध्यादेश एक अस्थायी कानून होता है और संसद का सत्र शुरू होने के 6 महीने के अंदर उसे पास करवाना ज़रूरी होता है. वर्ना ये अध्यादेश मान्य नहीं रहता. हालांकि सरकार दोबारा भी अध्यादेश ला सकती है. लेकिन इसे सरकार चलाने का सही तरीका नहीं माना जाता. 

राम मंदिर मुद्दे का अगर इस देश में किसी राजनीतिक दल ने सबसे ज्यादा फायदा उठाया है, तो वो है बीजेपी. 1984 में बीजेपी के लोकसभा में सिर्फ 2 सांसद थे. लेकिन इसके बाद बीजेपी ने राम मंदिर आंदोलन किया और धीरे धीरे उसकी सीटें बढ़ती चली गईं और 2014 में उसने अपने दम पर बहुमत हासिल करके सरकार बनाई.

25 सितंबर 1990 से 30 अक्टूबर 1990 तक पूरे देश में लालकृष्ण आडवाणी ने राम रथयात्रा निकाली थी. 
इस यात्रा की शुरुआत सोमनाथ से हुई थी. और ये यात्रा अयोध्या में खत्म होनी थी. 
लेकिन उस समय बिहार के मुख्यमंत्री लालू यादव के निर्देश पर लालकृष्ण आडवाणी को बिहार के समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया था.

इसके बाद बीजेपी ने राम मंदिर आंदोलन को और तेज़ कर दिया और उत्तर प्रदेश में अपने दम पर सरकार बना ली. तब कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने थे. 

और फिर जब 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा गिराया गया, तब भी कल्याण सिंह की ही सरकार थी. 

इसके बाद भी हर चुनाव में बीजेपी ने राम मंदिर का मुद्दा उठाया.
राम मंदिर का मुद्दा बीजेपी के चुनावी घोषणापत्र का अहम हिस्सा रहा है. 
और अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण बीजेपी का एक प्रमुख चुनावी वादा है. 
इसलिए बीजेपी पर राम मंदिर के निर्माण का बहुत दबाव है.