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ZEE जानकारी: 'अभिव्यक्ति की आज़ादी' के नाम पर बहस और राजनीतिक खेमेबाजी

किसी सूचना या विचार को बोलकर, लिखकर या किसी अन्य रूप में बिना किसी रोक-टोक के अभिव्यक्त करने की आज़ादी ही, अभिव्यक्ति की आज़ादी कहलाती है.

ZEE जानकारी: 'अभिव्यक्ति की आज़ादी' के नाम पर बहस और राजनीतिक खेमेबाजी

अब हम देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में 'अभिव्यक्ति की आज़ादी' के नाम पर हुई बहस का विश्लेषण करेंगे. और आपको ये बताएंगे की देश की सबसे बड़ी अदालत में Hollywood की मशहूर फिल्म Spider-Man के एक Dialouge का ज़िक्र क्यों हुआ ? ये ख़बर एक पत्रकार के विवादित Tweets और उसकी गिरफ्तारी के बारे में है. 

इस पत्रकार ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ एक विवादित Tweet किया था. जिसके बाद UP पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया और आज सुप्रीम कोर्ट ने इस पत्रकार को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है. लेकिन देश की सबसे बड़ी अदालत ने ये भी साफ कर दिया कि इस पत्रकार के खिलाफ पुलिस की क़ानूनी कार्रवाई जारी रहेगी. इस पत्रकार की Social Media Posts ने देश में एक बार फिर इस बात पर बहस छेड़ दी है, कि क्या अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर लोगों को कुछ भी बोलने या लिखने की आज़ादी दी जा सकती है ? क्या अभिव्यक्ति की आज़ादी का अधिकाऱ असीमित है. इस ख़बर की गहराई में जाने से पहले, आपको ये पता होना चाहिए, कि अभिव्यक्ति की आज़ादी की परिभाषा क्या है ?

किसी सूचना या विचार को बोलकर, लिखकर या किसी अन्य रूप में बिना किसी रोक-टोक के अभिव्यक्त करने की आज़ादी ही, अभिव्यक्ति की आज़ादी कहलाती है. भारत का संविधान एक धर्मनिरपेक्ष, सहिष्णु और उदार समाज की गारंटी देता है. हमारे संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है. लेकिन कई बार इसका ग़लत इस्तेमाल किया जाता है. 

प्रशांत कनौजिया, नाम के पत्रकार ने ऐसी ही ग़लती की थी. इस पत्रकार ने Twitter पर एक Video Upload किया था. जिसमें एक महिला ने ख़ुद को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रेमिका बताया था. 

इस Video के साथ उन्होंने योगी आदित्यनाथ का ज़िक्र करते हुए आपत्तिजनक टिप्पणी की थी.

जिसके बाद लखनऊ के हज़रतगंज थाने में FIR दर्ज की गई. और प्रशांत कनौजिया पर IPC की धारा 505 और IT Act की धारा 67 और मानहानि की धारा लगाई गई.

IPC की धारा 505 ऐसी स्थिति में लगाई जाती है, जब किसी कथन के माध्यम से दो समुदायों के बीच नफरत पैदा करने की कोशिश की जाती है. 

शिकायत करने वाले का आरोप था, कि इस पत्रकार ने योगी आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ 'आपत्तिजनक टिप्पणी' करके उनकी छवि धूमिल करने की कोशिश की थी.

इसके बाद आरोपी पत्रकार की पत्नी ने Supreme Court में अपील करके गिरफ्तारी को गैर कानूनी बताया और इंसाफ की मांग की.

जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस अजय रस्तोगी की बेंच ने आज इस मामले की सुनवाई की. कोर्ट ने इस पत्रकार को ज़मानत पर रिहा करने का आदेश दे दिया. सुप्रीम कोर्ट ने UP पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा, कि पत्रकार को किन धाराओं के तहत गिरफ्तार किया गया ? अदालत ने UP सरकार को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के बारे में भी याद दिलाया. और कहा कि किसी नागरिक की आज़ादी के साथ समझौता नहीं हो सकता. ये आज़ादी उसे संविधान से मिली है और इसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता. 

फैसला आने के कुछ ही मिनटों में ये पत्रकार Social Media पर Trend करने लगा. उसकी हिम्मत की तारीफ होने लगी. और देश के बुद्धिजीवियों ने जश्न मनाना शुरू कर दिया...तालियां बजने लगीं और अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर एजेंडा चलना शुरु हो गया. लेकिन, किसी ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियों को देश को बताने के बारे में नहीं सोचा. इसलिए आज ये ज़िम्मेदारी हम निभा रहे हैं.

सुनवाई के दौरान जस्टिस इंदिरा बनर्जी ने उस पत्रकार के Tweets के संदर्भ में कहा, कि ऐसे Tweets नहीं किए जाने चाहिए थे.
और उसने जिस तरह के Tweets किए, कोई उसकी प्रशंसा नहीं कर सकता. अदालत ने आदेश दिया, कि कानून के मुताबिक इस पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई जारी रहे. लेकिन उसे जेल में डालने का कोई औचित्य नहीं है. इसके बाद अदालत में उत्तर प्रदेश सरकार के Additional Soliciter General ने अपनी बात रखी. और कहा, कि इस पत्रकार की रिहाई का मतलब ये निकाला जाएगा, कि अदालत, उसके Tweets का समर्थन करती है. इस पर जस्टिस इंदिरा बनर्जी ने कहा, कि ऐसा क्यों होगा ?

इसे केवल Right To Personal Liberty का समर्थन करना माना जाएगा. इस बीच UP सरकार की तरफ से दलील दी गई, कि ये मामला Personal Vendetta यानी निजी प्रतिशोध का नहीं है. ये इस पत्रकार के एक Tweet तक सीमित नहीं है. बल्कि बहुत से विवादित Tweets पर आधारित है. इसी के बाद Additional Solicitor General ने Spider-Man फिल्म के मशहूर Dialouge का ज़िक्र किया. और कहा, With Great Liberty...Comes Great Responsibility....

देश की सबसे बड़ी अदालत ने आपत्तिजनक Tweets करने वाले पत्रकार को भले ही रिहा करने के आदेश दे दिए हों. लेकिन, इस ख़बर ने एक बार फिर उसी बहस को जीवित कर दिया है, कि क्या...Freedom Of Expresson के नाम पर किसी को कुछ भी लिखने या बोलने की आज़ादी दी जा सकती है?

जिन लोगों को आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले पत्रकार की गिरफ़्तारी अच्छी नहीं लगी. उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम में अपनी डिज़ाइनर पत्रकारिता वाली दुकानदारी चमकानी शुरु कर दी. इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला बताया. लेकिन, इनका विरोध और इनका गुस्सा बहुत ही Selective है. इसे समझने के लिए आपको गिरफ्तार किए गए पत्रकार की मानसिकता को समझना होगा. और इसके लिए आपको ज़्यादा कुछ करने की ज़रुरत नहीं है. आपको सिर्फ इस पत्रकार की Twitter Timeline पर जाना होगा. जहां सिवाय नफरत के आपको कुछ नहीं मिलेगा.

6 मई 2019 को इस पत्रकार ने Tweet किया और कहा, कि भारत पर हिन्दू आतंकवाद का हमला हुआ है. मुस्लिमों, दलितों और आदिवासियों की हत्या की जा रही है.

एक और ट्वीट में इसने लिखा कि हिन्दुओं को शर्म आती नहीं है. धर्म है कि गोबर का पुलिंदा.

एक और Tweet में इसने लिखा कि संतों की हत्या करके, मानवता की रक्षा करो.

हिन्दू धर्म के बारे में इसने लिखा कि ये धर्म दुनिया का सबसे घटिया धर्म है. 

इस पत्रकार के मुताबिक ऐसे दलित जो खुद को हिन्दू कहते हैं, वो ऐसे जानवर हैं, जिनके पास अपना दिमाग नहीं है.

इस तथाकथित पत्रकार के मुताबिक, भारत को अपनी सभ्यता और संस्कृति पर शर्म आनी चाहिए. भारत की सभ्यता, दुनिया में सबसे घटिया है. अपने देश को गाली देने के मामले में ये व्यक्ति यहीं नहीं रुका. इसके मुताबिक, भारत एक मैला देश है. जहां पैदा होने का उसे अफसोस है.

इसने महाराणा प्रताप जैसे योद्धा के लिए आपत्तिजनक टिप्पणी भी की है. और Tweet किया कि मैदान छोड़कर भागने वाले को क्या महान कहा जा सकता है ? गज़ब भारतीय संस्कृति है. बुज़दिल को भी महान बनाती है.

भगवान राम के बारे में ये लिखता है, कि राम ने ऐसा किया क्या है, जो उनके आगे जय और श्री लगाया जाए ?

देश के गृहमंत्री के बारे में ये पत्रकार सार्वजनिक मंच से अभद्र टिप्पणी करता है. और उनकी तस्वीर के साथ लिखता है कि मैं अमित शाह ईश्वर की सुपारी लेता हूं.

ये तथाकथित पत्रकार देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल करता है. इस पत्रकार के Twitter Timeline पर ऐसे एक नहीं. सैकड़ों Tweets हैं. 

ये पूरा मामला सीधे-सीधे अफवाह फैलाने और आपत्तिजनक टिप्पणी करके किसी की गरिमा को ठेस पहुंचाने से जुड़ा हुआ था. और इसी के तहत कानूनी कार्रवाई की गई. लेकिन, इस पत्रकार की गिरफ्तारी के बाद मामले को एक दूसरा Angle दे दिया गया. और इस Angle का नाम था, अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला.

पत्रकारों के हितों की बात करने वाली संस्था Editors Guild of India ने इस कार्रवाई की कड़े शब्दों में निन्दा की थी. और कहा था कि ऐसी कार्रवाई करके पत्रकारों को डराया-धमकाया जा रहा है. अभिव्यक्ति की आज़ादी का गला घोंटा जा रहा है. 

राजनीतिक पार्टियों ने भी इसे अपने एजेंडे में शामिल कर लिया है. समाजवादी पार्टी ने पत्रकार प्रशांत कनौजिया की गिरफ्तारी की आलोचना की है.

बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने भी इस कार्रवाई की निन्दा की.

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने तो कहा है कि लोकतंत्र और अभिव्यक्ति पर आए इस संकट को नज़रअंदाज करना देश को भारी पड़ सकता है.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने योगी आदित्यनाथ के व्यवहार पर सवाल उठाए हैं. और पत्रकार की गिरफ्तारी को मूर्खतापूर्ण रवैया बताया. 

हमारा सवाल ये है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर ये नेता इतने Selective क्यों हो जाते हैं. क्या इस देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी उन्हीं लोगों को हासिल है, जिन्हें ये दल और ये नेता Certificate दें. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी उस वक्त Tweet क्यों नहीं करते, जब कर्नाटक पुलिस आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोप में दो लोगों को गिरफ्तार कर लेती है. 23 मई को लोकसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद दो लोगों ने फेसबुक Live के दौरान, एचडी कुमारस्वामी और उनके परिवार के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया था. और 8 जून को दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया. कर्नाटक में राहुल गांधी की पार्टी कांग्रेस, JD S के साथ गठबंधन सरकार चला रही है. फिर भी, राहुल गांधी ने इस कार्रवाई को अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला नहीं माना. 

ठीक इसी तरह बैंगलुरु की पुलिस ने पिछले महीने एक वरिष्ठ संपादक के खिलाफ FIR दर्ज की थी. आरोप था, कि इस संपादक ने अपने अखबार में कर्नाटक के मुख्यमंत्री H.D. Kumraswamy के बेटे के खिलाफ एक लेख लिखा था. आपने नोट किया होगा कि हमारे देश में जब कोई गलत काम करते हुए पकड़ा जाता है तो उसका फॉर्मूला यही होता है कि.. 

कानून पर सवाल उठाओ
जांच एजेंसी पर सवाल उठाओ
अदालत पर सवाल उठाओ
जज पर सवाल उठाओ

ऐसे ही, अगर मीडिया में रिपोर्ट आ जाए, तो भी सच को झूठ बताने का एजेंडा चलाया जाता है.
अगर वीडियो है, तो वीडियो को Doctored बताया जाता है.
पत्रकार को बिका हुआ बताया जाता है.
पूरे चैनल की विश्वसनीयता पर प्रहार किया जाता है.

और दुर्भाग्य की बात ये है, कि पूर्वाग्रह से पीड़ित Editors Guild of India जैसी संस्थाएं, ऐसे ही लोगों का पक्ष लेती हैं. 

आपको याद होगा कि पिछले वर्ष राजस्थान में नवजोत सिंह सिद्धू की रैली में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगे थे. और ये सच Zee News ने ही पूरे देश को दिखाया था. अपनी ही रैली का ये वीडियो देखकर कांग्रेस पार्टी परेशान हो गई और फिर नवजोत सिंह सिद्धू ने Zee News को नानी याद दिलाने की धमकी दी थी.
 

सिद्धू के बयान के मुद्दे पर हमने Editors Guild of India को चिट्ठी लिखी. लेकिन Guild ने हमारी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की.

वर्ष 1978 में Editors Guild Of India की स्थापना देश में स्वतंत्र पत्रकारिता को बरकरार रखने के लिए हुई थी . वर्ष 1975 में जब देश में आपातकाल लगा तब बहुत सारे अखबारों के संपादकों ने इंदिरा गांधी की सरकार के सामने घुटने टेक दिए और वो आपातकाल का समर्थन करने लगे थे. इन अखबारों में तब आपातकाल लगाने की तारीफ की जाती थी. और इंदिरा गांधी की प्रशंसा में बड़े-बड़े लेख लिखे जाते थे .

वर्ष 1977 में आपातकाल के बाद चुनाव हुए और जनता पार्टी की सरकार बनी. तब जनता पार्टी की सरकार ने पत्रकारों को स्वतंत्र बनाए रखने के लिए Editors Guild की मदद की थी. इसके पीछे मंशा ये थी कि पत्रकार किसी भी सरकार के सामने घुटने न टेकें. लेकिन अब ज़माना बदल गया है. कांग्रेस जैसी पार्टी अब एजेंडा चलाने वाले पत्रकारों के साथ खड़ी दिखाई देती है. Social Media पर विवादित Tweets, Post करने वालों का साथ देती है. और इसी को सच्ची पत्रकारिता मान लिया जाता है.

आपको याद होगा, लोकसभा चुनाव के आखिरी दौर का प्रचार खत्म होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने एक Press Conference की थी. ठीक उसी वक्त राहुल गांधी ने भी अपनी Press Conference शुरु कर दी. राहुल से पहला सवाल पूछा गया, कि PM Modi Press Conference कर रहे हैं. और इसके जवाब में उनका कहना था, कि वहां कुछ अपने पत्रकार भेज दो, ताकि वो हमारी तरफ से कुछ सवाल पूछ लें. 

आज हमें ममता बनर्जी की मीम वाली असहनशीलता की भी याद आ रही है.

पिछले महीने पश्चिम बंगाल में बीजेपी युवा मोर्चा की एक नेता प्रियंका शर्मा ने ममता बनर्जी की Morph की हुई एक तस्वीर को Social Media पर Share किया था . मूल रूप से ये प्रियंका चोपड़ा की तस्वीर थी जो दुनिया भर में मशहूर Met Gala Event में ली गई थी. किसी ने इस तस्वीर का चेहरा बदलकर ममता बनर्जी का चेहरा लगा दिया. और फिर ये तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई. प्रियंका शर्मा ने इस तस्वीर को शेयर किया था. ये बात ममता बनर्जी बर्दाश्त नहीं कर पाईं. पश्चिम बंगाल की पुलिस ने 10 मई को प्रियंका शर्मा को गिरफ्तार कर लिया. और अदालत ने उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया. ये मामला भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.

उस वक्त सुप्रीम कोर्ट में उनकी ज़मानत पर सुनवाई के दौरान जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा था कि - अगर कोई आहत हुआ है तो माफ़ी मांगनी चाहिये, माफ़ी मांगने से कोई छोटा नहीं हो जाएगा. इस पर प्रियंका शर्मा के वकील ने कहा था, कि Meme के लिये माफ़ी मांगने से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असर पड़ेगा. इस पर जस्टिस इंदिरा बनर्जी ने कहा था, कि अभिव्यक्ति की आज़ादी से समझौता नहीं किया जा सकता. लेकिन इससे किसी और के अधिकार को चोट नहीं पहुंचाई जा सकती. 

ठीक इसी तरह, खुद को पत्रकार और बुद्धिजीवी कहने वाले एक व्यक्ति अभिजीत अय्यर मित्रा ने ओडिशा के कोणार्क सूर्य मंदिर की वास्तुकला पर बहुत आपत्तिजनक टिप्पणियां की थी. ये मामला भी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया. 

अभिजीत अय्यर मित्रा ने सुप्रीम कोर्ट से जमानत देने की मांग की थी. जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने बहुत सख्त टिप्पणी की और कहा कि 'आप देश के लोगों की भावनाओं को आहत कर रहे हैं. इसलिए आप किसी भी तरह की राहत पाने के हकदार नहीं हैं.' 

अभिजीत मित्रा ने ये दलील भी दी थी कि उनकी जान को खतरा है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि "अगर आप कहते हैं कि आपकी जान को खतरा है, तो आपके लिए सबसे सुरक्षित जगह जेल में होगी . "

यानी इस मामले में की गई टिप्पणियों ने धार्मिक भावनाओं को आहत किया. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी व्यक्ति से कहा कि आप ज़मानत के हकदार कैसे हो सकते हैं?' 

अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार के साथ संविधान आप को Right to Equality भी देता है. यानी संविधान देश के हर नागरिक को समानता का अधिकार भी देता है.

सवाल ये है कि क्या Creative Freedom और Freedom of Expression के नाम पर देश के सामाजिक सौहार्द को चोट पहुंचाने की इजाज़त दी जा सकती है? ये सारे लोग शायद ये भूल गये हैं, कि अभिव्यक्ति की आज़ादी असीमित नहीं होती. अभिव्यक्ति की आज़ादी का एक दायरा होता है और इसकी अपनी कुछ सीमाएं होती हैं. ये आज़ादी अपने साथ बहुत सारी ज़िम्मेदारियां लेकर आती है. आज आप के लिए ये जानना ज़रूरी है कि संविधान में अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर क्या लिखा है.

हमारे संविधान के अनुच्छेद -19 (1) (A) के तहत सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की आज़ादी का अधिकार दिया गया है.

ये अधिकार मूल अधिकार के दायरे में है. लेकिन ये अधिकार पूर्ण अधिकार नहीं है. इस अधिकार पर न्याय संगत रोक लगाई जा सकती है. क्योंकि इस अधिकार के साथ जिम्मेदारियां भी हैं. जिनकी व्याख्या संविधान के अनुच्छेद-19 (2) के तहत प्रतिबंधों के रूप में की गई है.

अनुच्छेद-19 (2) के तहत सरकार... देश की संप्रभुता की रक्षा, देश की निष्ठा की रक्षा, देशहित को बनाए रखने के लिए, विदेशी संबंधों की रक्षा करने के लिए और शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए कानून का इस्तेमाल करके अभिव्यक्ति की आजादी को सीमित कर सकती है.

यानी अभिव्यक्ति का अधिकार, पूर्ण अधिकार नहीं है. बल्कि इसके लिए उचित प्रतिबंध यानी Reasonable Restrictions की भी बात कही गई है. आप ये भी कह सकते हैं कि अभिव्यक्ति की आज़ादी, मोबाइल कंपनियों के Data की तरह Unlimited नहीं होती. 

अब इसी ख़बर को दुनिया की नज़र से देखिए. अमेरिका के अखबार The New York Times ने 25 अप्रैल 2019 को अपने International Edition में इज़राएल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का एक विवादित कार्टून छापा था. जिसमें बेंजामिन नेतन्याहू को जानवर के तौर पर दिखाया गया था. और Donald Trump को एक यहूदी टोपी पहने दिखाया गया था. जो आंख पर काला चश्मा लगाकर, बेंजामिन नेतन्याहू के साथ चल रहे थे. लेकिन इस कार्टून पर बहुत विवाद हुआ. इसके लिए The New York Times को माफ़ी भी मांगनी पड़ी थी. और अब इस अखबार ने ये फैसला लिया है, कि वो अपने International Edition के Daily Political Cartoons वाले सेक्शन को हमेशा के लिए बंद करेगा.

जबकि भारत के डिज़ाइनर पत्रकार और मीडिया संस्थान ग़लती मानने की जगह, एजेंडा चलाते हैं. और Editors Guild of India जैसी संस्थाएं, ग़लत को सही और सही को ग़लत साबित करने पर तुले रहते हैं. इसीलिए हम कह रहे हैं, कि पवित्र पत्रकारिता का दावा करने वाले ऐसे लोगों का दोहरा चरित्र और पाखंड पूरे देश के सामने आना चाहिए. आपके सामने आना चाहिए. ताकि आपको हमेशा पता रहे, कौन सही है और कौन ग़लत.