ZEE जानकारी: 1984 के सिख विरोधी दंगा मामले में एक दोषी को फांसी की सजा

इंसाफ की लड़ाई जब 34 साल तक चलती रहती है..तो लोग बहुत सारे तथ्यों को भूल जाते हैं, इसलिए आज सिख दंगों का चैपटर खोलना ज़रूरी है.

ZEE जानकारी: 1984 के सिख विरोधी दंगा मामले में एक दोषी को फांसी की सजा

34 वर्ष का समय.. एक बहुत लंबा समय होता है. 34 वर्षों में समाज बदल जाता है, एक गरीब देश अमीर बन जाता है. 34 वर्ष पहले जो बच्चा पैदा हुआ होगा, वो आज खुद एक पिता बना गया होगा. लेकिन 1984 के सिख दंगों का इंसाफ पिछले 34 वर्षों में भी नहीं हो पाया. आज इंसाफ की इस लंबी लड़ाई में एक दोषी को फांसी की सज़ा सुनाई गई है. ये फैसला जितना बड़ा था, उतना ही नाटकीय भी था. सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए जज ने कोर्ट रूम के बजाय ये फैसला तिहाड़ जेल में सुनाया. 

इंसाफ की लड़ाई जब 34 साल तक चलती रहती है..तो लोग बहुत सारे तथ्यों को भूल जाते हैं, इसलिए आज सिख दंगों का चैपटर खोलना ज़रूरी है. आज के दौर में आप बार बार लिंचिंग के बारे में सुनते होंगे, लेकिन भारत की सबसे बड़ी लिंचिंग 1984 में हुई थी. कांग्रेस के दामन पर भी 84 के सिख दंगों के ज़िद्दी दाग लगे हुए हैं और उसने बार बार इन दागों से पीछा छुड़ाने की कोशिश की है. लेकिन इन दागों में इतना ख़ून है कि ये आसानी से साफ़ नहीं हो सकता. इसलिए आज हम इस मामले में पिछले 34 वर्षों में हुई राजनीति की बात भी करेंगे, लेकिन सबसे पहले आपको आज के ऐतिहासिक फैसले के बारे में जानना चाहिए. 

दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने ये बड़ा फैसला सुनाया है. 

अदालत ने दो सिख युवकों की हत्या के अपराध में आरोपी यशपाल सिंह को फांसी की सज़ा सुनाई है, जबकि दूसरे आरोपी नरेश सहरावत को उम्रकैद की सज़ा सुनाई है. 

84 के सिख दंगों के मामले में 2015 में SIT बनाई गई थी और SIT बनने के बाद पहली बार किसी को फांसी की सज़ा सुनाई गई है. 

इन दोनों दोषियों पर 35-35 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है. 

ये मामला दक्षिण दिल्ली के महिपालपुर का था, जहां हरदेव सिंह और अवतार सिंह नामक दो युवकों का घर जला दिया गया था और उनकी हत्या कर दी गई थी. 

1 नवंबर, 1984 को दिल्ली के महिपाल पुर में भीड़ ने दो लोगों की हत्या की थी और 3 लोगों को मरा हुआ समझ कर छोड़ दिया था. 

इस मामले में पुलिस ने नरेश सहरावत और यशपाल सिंह को आरोपी बनाया था. 

लेकिन सबूतों के अभाव में 1994 में ये मामला बंद कर दिया गया था. इसके बाद दंगों की जांच के लिए बनाई गई SIT ने इस मामले को दोबारा खोला. 

आपको बता दें कि ये SIT 2015 में बनी थी. इस SIT ने अब तक 293 मामलों में से 60 मामलों को फिर से खोला है.

अब आपको ये बताते हैं कि सिख दंगों के मामले में न्याय की रफ्तार कितनी धीमी है? 

1984 में हुए सिख विरोधी दंगों के बाद दिल्ली में कुल 650 मामले दर्ज हुए थे. 
जिनमें 267 मामले दिल्ली पुलिस ने बंद कर दिए. 
हालांकि इन 267 मामलों में से 5 मामलों की जांच बाद में CBI ने की. 
बाद में 2015 में जब SIT बनी तो 60 मामलों को जांच के लिए उपयुक्त पाया गया. 
लेकिन पिछले तीन वर्षों में SIT ने भी 52 मामलों में Untraced Report लगाई है. यानी इन मामलों में जांच बंद कर दी गई है. 
जिन 8 मामलों की SIT जांच कर रही है, उनमें 5 में चार्जशीट दायर कर दी गई है. और इनमें से 3 मामलों में कांग्रेस के नेता सज्जन कुमार आरोपी हैं. 
वैसे 1984 से अब तक सिख विरोधी दंगों के आरोप में 442 लोग दोषी ठहराए गए हैं
 
वैसे ये कोई पहली बार नहीं है कि 1984 के सिख विरोधी दंगों में फांसी की सज़ा हुई हो. 

इससे पहले भी किशोरी लाल नामक एक व्यक्ति को दंगों के 7 अलग-अलग मामलों में फांसी की सज़ा हुई थी. 

लेकिन 1999 में सुप्रीम कोर्ट ने किशोरीलाल की फांसी की सज़ा को उम्रकैद में बदल दिया था.

1984 के सिख दंगों के सबसे ज़्यादा पीड़ित दिल्ली में हैं...तब दिल्ली के 2 हज़ार 733 लोग मारे गए थे...

सरकारी Records के अनुसार पूरे देश में कुल 3 हज़ार 325 लोग मारे गए थे.

1984 के दंगों की जांच के लिए करीब 10 जांच आयोग बनाए जा चुके हैं.

रंगनाथ मिश्र आयोग से लेकर नानावती आयोग तक, कई आयोग बने.. लेकिन फैसला नहीं हुआ.

आपको जानकर हैरानी होगी कि दिल्ली के Trial Courts में इन दंगों से जुड़े 10 मामले Pending हैं.

इसी तरह दिल्ली हाईकोर्ट में 22 और सुप्रीम कोर्ट में कुल 3 केस Pending हैं.

1984 के दंगों को भड़काने का आरोप कांग्रेस के कई बड़े नेताओं पर लगा था.

जिनमें सबसे बड़ा नाम है जगदीश टाइटलर का. जगदीश टाइटलर 3 बार कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा के सांसद रह चुके हैं. और दो बार कांग्रेस की ही सरकार में केन्द्रीय मंत्री भी रहे हैं. 

इसके अलावा राजीव गांधी की सरकार में सूचना और प्रसारण मंत्री रहे, HKL भगत पर सिख विरोधी दंगों में शामिल होने का आरोप था. 

कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार भी सिख विरोधी दंगों के बड़े आरोपी हैं. सज्जन कुमार कांग्रेस पार्टी के टिकट पर 3 बार लोकसभा के सांसद रहे हैं. सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर के खिलाफ आज भी केस चल रहा है. 

इनके अलावा कांग्रेस के पूर्व विधायक महेन्द्र यादव, और पूर्व पार्षद बलवंत खोकर भी दंगों के आरोपी हैं. दिल्ली में कांग्रेस के 40 स्थानीय नेताओं पर भी दंगों में शामिल होने का आरोप है. 

इसी वजह से 1984 के दंगों के दाग कांग्रेस का पीछा नहीं छोड़ते हैं. वैसे इसकी एक बहुत बड़ी वजह है - पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का एक बयान. राजीव गांधी ने ये बयान अपनी मां और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिया था. 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके सिख अंगरक्षकों ने कर दी थी. इसके बाद देशभर में सिख विरोधी दंगे हुए थे. दिल्ली सहित देश के कई इलाकों में हुए इन दंगों में हजारों सिखों की हत्या कर दी गई थी. इसके बाद इंदिरा गांधी के जन्मदिवस यानी 19 नवंबर 1984 को दिल्ली के बोट क्लब में उनकी याद में एक सभा रखी गई . और इसी सभा में राजीव गांधी ने ये बयान दिया था. उनके इस बयान को दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण कहा जाता है. क्योंकि इसमें सिखों के खिलाफ हुए दंगों को जायज़ ठहराने की कोशिश की गई थी. 

कांग्रेस इन दंगों पर पिछले 34 वर्षों में कई बार आधिकारिक तौर पर माफी मांग चुकी है. 

12 अगस्त 2005 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने संसद में माफी मांगी थी. 

उन्होंने कहा था कि मुझे सिख समुदाय से माफी मांगने में कोई हिचकिचाहट नहीं है. उन्होंने कहा था कि वो पूरे देश से 1984 के दंगों के लिए माफी मांगते हैं. 

इसके बाद वर्ष 2010 में Canada के दौरे पर भी डॉक्टर मनमोहन सिंह ने माफी मांगी थी. 

लेकिन इस माफी के बावजूद कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व को ये लगता है कि इन दंगों में उनकी कोई भूमिका नहीं थी. इसी वर्ष अगस्त में कांग्रेस के मौजूदा अध्यक्ष राहुल गांधी ने London में कहा था कि दंगों में उनकी पार्टी की भूमिका नहीं थी.