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ZEE जानकारी: आपातकाल की पूरी कहानी

आज की युवा पीढ़ी कभी भी आपातकाल के संकट को महसूस नहीं कर सकती. क्योंकि आज भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी All Time High है .

ZEE जानकारी: आपातकाल की पूरी कहानी

आज 25 जून है. 44 साल पहले आज ही के दिन भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगा दिया था . 25 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने भारत के 60 करोड़ लोगों की आज़ादी का खून कर दिया था . तब भारत की आबादी 60 करोड़ थी .लेकिन आज की युवा पीढ़ी कभी भी आपातकाल के संकट को महसूस नहीं कर सकती. क्योंकि आज भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी All Time High है .

आज Smart Phone के युग में लोग Facebook, Twitter और Social Media पर सरकार की बड़ी से बड़ी और कड़ी से कड़ी आलोचना कर सकते हैं. आज पुलिस आपके घर पर ये पूछने नहीं आती है कि आपने सरकार के खिलाफ क्या लिखा है ? लेकिन आपातकाल के दौर में सरकार के खिलाफ कुछ बोलने का मतलब था... उम्र भर की जेल और पुलिस का Third Degree Torture. 

यहां उम्र भर की जेल का मतलब ये है... कि आपातकाल के दौर में जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया था, उन्हें ये नहीं पता था कि आपातकाल कब हटेगा और वो कब रिहा होंगे ? इन लोगों ने ये मान लिया था कि अब वो कभी जेल से आज़ाद नहीं हो पाएंगे . 

भारतीय लोकतंत्र के सुरक्षित भविष्य के लिए आज की युवा पीढ़ी को आपातकाल के बारे में पता होना बहुत ज़रूरी है. 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रायबरेली से लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी के निर्वाचन को रद्द कर दिया था. अगर इंदिरा गांधी चाहतीं, तो न्यायपालिका के इस फ़ैसले का सम्मान करतीं. वो इस्तीफ़ा देकर किसी और को प्रधानमंत्री बना सकती थीं.

न्यायिक प्रक्रिया का पालन कर के इंदिरा गांधी अदालत से राहत हासिल करने की कोशिश करतीं. और ऐसा होने पर वो दोबारा देश की प्रधानमंत्री बन सकती थीं. लेकिन, इंदिरा गांधी न्यायपालिका का सम्मान नहीं करती थीं. वो केवल अपनी कुर्सी का सम्मान करती थीं. इसीलिए उन्होंने अदालत के फ़ैसले का सम्मान करने के बजाय देश में इमरजेंसी लगाकर अपनी तानाशाही चलाने का फ़ैसला किया.

इस तरह इंदिरा गांधी ने अपनी प्रधानमंत्री की कुर्सी बचाने के लिए भारत के लोकतंत्र का खून कर दिया था . आज हम आपको ये बताएंगे कि भारत में इंदिरा गांधी के अलावा कौन कौन से बड़े नेता, आपातकाल के गुनाह में शामिल थे ?

आज हम उन लोगों को भी याद करेंगे जो भारत में लोकतंत्र को वापस लाने के लिए अपनी जान पर खेल गए थे. हम आपको समाजवादी नेता George Fernandes के संघर्ष का इतिहास बताएंगे. ये George Fernandes की वो प्रसिद्ध तस्वीर है, जो आपातकाल में इंदिरा गांधी के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बन गई थी. इस तस्वीर की कहानी बहुत दिलचस्प है. ये एक ऐसी तस्वीर है जिसके बारे में कहा जाता है कि इसने अपने दम पर एक चुनाव जीत लिया था.

इसके साथ ही, हम आपको उन साहित्यकारों के बारे में बताएंगे जिनको इंदिरा गांधी के खिलाफ लिखने की वजह से गिरफ्तार कर लिया गया था. शायद आपको पश्चिम बंगाल के मशहूर साहित्यकार आनंद शंकर Ray ((Annada Shankar Ray)) के बारे में कोई जानकारी नहीं होगी. जिन्होने इंदिरा गांधी को खुली चुनौती देते हुए... आपातकाल जारी रहने तक अपनी कलम छूने से इनकार कर दिया था . 

आज के दिन... भारत के सभी राजनेताओँ को लोकतंत्र को सुरक्षित रखने की शपथ लेनी चाहिए . आज उन लोगों को याद करने का दिन है... जिन्होंने देश में लोकतंत्र बचाने के लिए बलिदान दिया . लेकिन आज के ऐतिहासिक मौके पर भी हमारे देश के राजनेता एकजुट नहीं है .

ममता बनर्जी ने आज एक Tweet करके लिखा है कि पिछले 5 वर्षों से भारत Super Emergency के दौर से गुज़र रहा है. ममता बनर्जी को आज Super Emergency नज़र आ रही है. जब वो देश के प्रधानमंत्री को अपना प्रधानमंत्री मानने से इनकार करने के लिए स्वतंत्र हैं. 

कई केंद्रीय मंत्रियों और बड़े नेताओं ने भी आज Tweet करके 44 साल पहले भारत के लोकतंत्र पर आए संकट को याद किया है . 

लेकिन कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी ने आज लोकतंत्र की रक्षा के लिए कोई Tweet नहीं किया . राहुल गांधी अपनी दादी इंदिरा गांधी की आलोचना आखिर कैसे कर सकते हैं ? और कांग्रेस पार्टी के नेताओं में भी इतनी हिम्मत नहीं है कि वो कांग्रेस की First Family के खिलाफ कुछ बोल सकें . 

आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई चर्चा का जवाब देना था. प्रधानमंत्री ने आज आपातकाल के काले दिवस को याद किया और देश के लोकतंत्र की सुरक्षा का संकल्प भी दोहराया . 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज एक Tweet करके भी आपातकाल में संघर्ष करने वाले लोगों को याद किया . प्रधानमंत्री ने अपनी आवाज़ में एक Video भी Post किया जिसमें आपातकाल के खिलाफ संघर्ष करने वालों को Salute किया गया .

आज सुपर इमरजेंसी की बात करने वाली ममता बनर्जी इमरजेंसी के वक़्त कोलकाता में कांग्रेस की स्थानीय नेता थीं. उन्होंने कोलकाता में जय प्रकाश नारायण की कार पर चढ़कर उनका विरोध किया था. इसका इनाम उन्हें 1984 में मिला था. जब उन्हें लोकसभा का चुनाव लड़ाया गया था और उन्होंने सोमनाथ चटर्जी को हराया था
अब हम आपको Emergency के उन किरदारों के बारे में बताते हैं . जो उस दौरान बहुत ताकतवर बन गए . ये वो लोग थे जिनके हाथों में देश की सत्ता... एक कठपुतली की तरह नाच रही थी...इसके अलावा हम आपको इंदिरा गांधी के उन शुभचिंतकों के बारे में भी बताएंगे...जिन्होंने इमरजेंसी को देश के लिए अच्छा बताया था...

इस लिस्ट में पहला नाम है- इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी का 

ऐसा माना जाता है कि इमरजेंसी के वक्त असली सत्ता इंदिरा गांधी के पास नहीं, बल्कि संजय गांधी के पास थी.

संजय गांधी उस वक्त सरकार में ना तो किसी official और ना elected post पर थे, फिर भी वो ही सरकार चला रहे थे.

संजय गांधी और उनकी मित्र मंडली ने इमरजेंसी के दौरान देश को अप्रत्यक्ष रूप से चलाया था.

संजय गांधी केंद्रीय मंत्रियों को घर पर बुलाते थे... उन्हें आदेश देते थे...और अपने हिसाब से नियुक्तियां करते थे.
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दूसरा नाम है- विद्याचरण शुक्ल का

संजय गांधी ने इंदर कुमार गुजराल को हटाकर विद्याचरण शुक्ल को सूचना प्रसारण मंत्री बनाया था.

विद्याचरण शुक्ल को इमरजेंसी के दौरान संजय गांधी के आदेशों पर प्रेस को कुचलने के लिए जाना जाता है.

इसी दौरान एक बार गायक किशोर कुमार ने यूथ कांग्रेस के कार्यक्रम में गाने से इनकार कर दिया, तो संजय गांधी के कहने पर All India Radio पर किशोर कुमार के गाने बैन कर दिए गए थे.
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तीसरा नाम है- आरके धवन का 

आरके धवन इंदिरा गांधी के पर्सनल असिस्टेंट थे और इमरजेंसी के दौरान सबसे ताकतवर लोगों में से एक थे.

आरके धवन को इंदिरा गांधी का "door keeper" कहा जाता था और इंदिरा तक कोई सूचना उनके ज़रिए ही पहुंचती थीं.

बाद में आर के धवन ने इमरजेंसी के लिए सिद्धार्थ शंकर रे को ज़िम्मेदार ठहरा दिया था.
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चौथा नाम है- जगमोहन का

जगमोहन संजय गांधी के करीबी थे और उस वक्त Delhi Development Authority के उपाध्यक्ष थे

इमरजेंसी के दौरान संजय गांधी जगमोहन के साथ पुरानी दिल्ली को देखने के लिए निकले.

संजय गांधी को तुर्कमान गेट के पास झुग्गियां देखकर अच्छा नहीं लगा और उन्होंने जगमोहन को झुग्गियां तोड़ने के लिए कह दिया.

झुग्गियां तोड़ने का विरोध करने पर पुलिस ने फायरिंग की जिसमें 150 लोग मारे गए थे...इस घटना ने 70 हज़ार लोगों को विस्थापित कर दिया था.

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पांचवां नाम है- हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री बंसीलाल का

बंसीलाल को संजय गांधी के बेहद करीबी लोगों में माना जाता था.

वो कांग्रेस के उन गिने चुने मुख्यमंत्रियों में थे जिन्हें इमरजेंसी के लगाए जाने के बारे में पहले से पता था.
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छठा नाम है- रुख़साना सुल्ताना का

रुख़साना सुल्ताना संजय गांधी द्वारा शुरू किए गए परिवार नियोजन कार्यक्रम की संचालक थीं. 

खासतौर पर दिल्ली में मुस्लिम बहुल इलाकों में परिवार नियोजन के कार्यक्रम को लागू कराने में उनकी भूमिका रही थी. वो आज की युवा अभिनेत्री सारा अली ख़ान की नानी थीं. 
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इसके अलावा धीरेंद्र ब्रह्मचारी जो इंदिरा गांधी के योग गुरू थे.

नंदिनी सत्पथी जो उस वक्त ओडिशा की मुख्यमंत्री थी और इंदिरा गांधी के बहुत करीब थीं.

नवीन चावला जो संजय गांधी के बेहद करीबी थे और 2009 में भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त बने.

कमलनाथ और जगदीश टाइटलर जिनके बारे में नारा मशहूर था कि संजय गांधी के दो हाथ...टाइटलर और कमलनाथ.

ऐसे कई नाम हैं जो इमरजेंसी के दौरान सबसे ताकतवर चेहरों में गिने जाते थे...और जो संजय गांधी और इंदिरा गांधी के इशारों पर देश के पूरे सिस्टम को चला रहे थे...

आज आपातकाल के खिलाफ संघर्ष करने वाले नायकों को भी याद करने का दिन है . भारत में जब भी आपातकाल का काला अध्याय याद किया जाएगा, George Fernandes का ज़िक्र ज़रूर होगा. और इमरजेंसी के दौर में George Fernandes की एक तस्वीर की कहानी बताए बिना आपातकाल का इतिहास अधूरा है . 

आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी की सरकार ने समाजवादी नेता George Fernandes पर सरकारी संस्थानों और रेलवे को धमाकों से उड़ाने के लिए डायनामाइट की तस्करी का आरोप लगाया था. जब देश में इमरजेंसी लगी तब George Fernandes ओडिशा के गोपालपुर में थे . इंदिरा गांधी के खिलाफ भूमिगत आंदोलन चलाने के लिए George Fernandes वहां से गायब हो गए. 

कई हफ्तों तक George Fernandes का कुछ पता नहीं चला. और जब उनकी दाढ़ी उग आई तब वो एक सिख के रूप में सामने आए. उन्होंने गुप्त रूप से पूरे देश का दौरा करके अपने साथियों को इकट्ठा किया . 

इंदिरा गांधी इस बात से बहुत ज़्यादा नाराज़ थीं कि George Fernandes को अब तक गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया ?

उनके भाई ((लॉरेंस)) Lawrence Fernandes को बैंगलुरू में उनके घर से गिरफ़्तार कर लिया गया था और बर्बरता से पीटा गया था. 

George Fernandes की सहयोगी और कन्नड़ फिल्मों की अभिनेत्री ((Snehlata)) स्नेहलता रेड्डी को पुलिस ने जेल में बंद कर दिया . 

स्नेहलता रेड्डी Asthma की मरीज़ थीं . जेल में यातनाओं की वजह से उनकी बीमारी बढ़ गई . सरकार ने बदनामी के डर से उऩ्हें Parole पर छोड़ दिया . लेकिन कुछ ही दिनों में उनकी मौत हो गई . 

George Fernandes की पत्नी और बच्चे डर से विदेश भाग गए . आखिरकार 10 जून, 1976 को George Fernandes को कलकत्ता से गिरफ्तार कर लिया गया. तब कोलकाता को कलकत्ता कहा जाता था . 

George Fernandes की ये तस्वीर, उस वक्त ली गई थी जब वो अदालत में पेशी पर गए थे . उनके हाथों में जंजीरें थीं . उनको ये नहीं पता था कि आपातकाल खत्म होगा या नहीं ? वो कभी आज़ाद हो पाएंगे या नहीं ? लेकिन उनका हौसला बुलंद था . इसीलिए उन्होंने जंजीरों में जकड़े हुए अपने हाथों को उठाकर लोकतंत्र के प्रति अपना संकल्प दिखाया था .  लाल कृष्ण आडवाणी ने अपनी किताब मेरा देश मेरा जीवन में लिखा है... 

आपातकाल के खिलाफ संघर्ष ने George Fernandes को नायक बना दिया . उन्होंने जेल में कैद रहते हुए बिहार के मुजफ्फरपुर से 1977 में लोकसभा का चुनाव लड़ा था और भारी मतों से विजय प्राप्त की थी . उन्होंने मुजफ्फरपुर में 78 प्रतिशत वोट हासिल किए थे . George Fernandes के समर्थकों ने उनका प्रचार उनकी उस Photo से किया, जिसमें उनके हाथों में बेड़ियां लगी थीं. 

ज़रा कल्पना कीजिए... वो दौर... George Fernandes जेल में बंद थे . उन्होंने कोई भाषण नहीं दिया था . उस वक्त Social Media नहीं था . ना उन्होंने Tweet किया और ना ही Facebook पर कोई Blog लिखा . लेकिन उनकी ये तस्वीर धीरे-धीरे लोगों के दिलों-दिमाग में बस गई . आज के युग की भाषा में कहें तो Viral हो गई . इसीलिए ये कहा जाता है कि 1977 का वो चुनाव George Fernandes ने नहीं बल्कि उनकी इस तस्वीर ने लड़ा और जीता था . 

आपातकाल के दौर में देवकांत बरुआ कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष थे. वो इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी की बेशर्मी से चाटुकारिता करते थे. उन्होंने एक नारा दिया था.

Indira Is India and India Is Indira इसका मतलब है... इंदिरा ही भारत है और भारत ही इंदिरा है . इस नारे ने लोगों की देशभक्ति की भावना को आहत किया था . लेकिन उन्होंने भारत के विपक्ष को पूरी तरह से खत्म करने की भी योजना बनाई थी . देवकांत बरुआ ने आपातकाल के दौरान एक बार घोषणा की थी कि ‘देश बिना विपक्ष के चल सकता है . भारत के इतिहास में विपक्ष अ-प्रासंगिक है .’

उस वक्त इंदिरा गांधी की सरकार ने विपक्ष ही नहीं भारत के साहित्यकारों का भी दमन किया. मराठी की एक मशहूर लेखिका दुर्गा भागवत ने आपातकाल का विरोध किया तो उनको जेल में डाल दिया गया.

बंगाली भाषा के निबंध लेखक आनंद शंकर रे ने घोषणा की थी कि वो और उनके दोस्त लिखना ही छोड़ देंगे. उन्होंने आपातकाल लागू रहने तक कलम छूने से इंकार कर दिया था . उस साहित्यकार ने अपनी कलम उठाए बिना इंदिरा गांधी को बहुत करारा जवाब दिया था. 

कार्टूनिस्ट K शंकर पिल्लई की तारीफ, इंदिरा गांधी के पिता पंडित नेहरू भी करते थे. लेकिन उन्होंने इंदिरा गांधी के विरोध में अपनी पत्रिका बंद कर दी और कहा कि ‘तानाशाही हास्य व्यंग्य बर्दाश्त नहीं’ कर सकती . आप को याद रखना चाहिए कि हिटलर के पूरे शासनकाल में जर्मनी में अच्छे हास्य नाटक, अच्छे कार्टून और अच्छे व्यंग्य लुप्त हो गए थे.’

आज बहुत से डिज़ाइनर पत्रकार और बुद्धिजीवी ये कहते हैं कि मीडिया ने सरकार के सामने सरेंडर कर दिया है. मीडिया सरकार से डरता है. सरकार लोगों की आवाज़ दबाती है. ऐसे लोगों को आज इमरजेंसी के इतिहास को ज़रूर याद करना चाहिए. और ऐसे डिज़ाइनर पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को अपने अंदर झांक कर सोचना चाहिए कि उन्होंने इमरजेंसी के दौरान अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा के लिए क्या किया था. उन्होंने किस तरह इंदिरा गांधी की तानाशाही के विरुद्ध आवाज़ उठाई थी. 

क्योंकि देश में इमरजेंसी लगाते ही इंदिरा गांधी ने सबसे पहले अभिव्यक्ति की आज़ादी का गला घोंट दिया गया. सरकार अपने खिलाफ कोई भी आवाज़ नहीं सुनना चाहती थी...अब हम आपको बताते हैं कि किस तरह से उस दौर में इमरजेंसी के रोड-रोलर से मीडिया की आज़ादी को कुचला गया...

25 जून 1975 की आधी रात को इमरजेंसी लगाने के तुरंत बाद अख़बारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गई...ताकि ज़्यादातर अख़बार अगले दिन आपातकाल का समाचार ना छाप सकें...अख़बारों के दफ्तरों में दो दिन बाद बिजली सप्लाई बहाल हुई थी.

संजय गांधी ने इमरजेंसी के दो दिन बाद ही सूचना एवं प्रसारण मंत्री इंदर कुमार गुजराल को हटाकर अपने करीबी विद्याचरण शुक्ल को मंत्री बना दिया...विद्याचरण शुक्ल के ज़रिए सरकार ने मीडिया पर पूरी तरह शिकंजा कस दिया था.

उस वक्त प्रेस की सर्वोच्च संस्था प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया एक तरह से सिस्टम का हिस्सा बनकर रह गई थी...इस संस्था ने इमरजेंसी का विरोध तक नहीं किया...यहां तक कि इमरजेंसी के विरोध में आने वाले प्रस्ताव को भी खारिज कर दिया.. 

कड़ी सेंसरशिप की वजह से कई अख़बारों का प्रकाशन बंद हो गया... पत्रकारों के लिए सरकार ने कोड ऑफ कंडक्ट बना दिया... अख़बारों के बोर्ड में सरकारी व्यक्ति बैठा दिए गए...जो हर ख़बर पर नज़र रखते थे

अख़बारों के दफ्तरों में ख़बरों को सेंसर करने वाले लोग हर ख़बर, कार्टून और तस्वीर को देखते थे...और ये सुनिश्चित करते थे कि कोई भी ख़बर सरकार की नीतियों का विरोध करने वाली ना हो

देश की चार बड़ी न्यूज़ एजेंसियों पीटीआई, यूएनआई, हिंदुस्तान समाचार और समाचार भारती का विलय करके सरकार ने एक समाचार एजेंसी बना दी...ताकि ख़बर पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण में रहे

इमरजेंसी के दौरान 3801 अख़बारों को ज़ब्त किया गया...327 पत्रकारों को मीसा कानून के तहत जेल में बंद कर दिया गया...290 अख़बारों में सरकारी विज्ञापन बंद कर दिए गए...ब्रिटेन के The Times और The Guardian जैसे कई समाचार पत्रों के 7 संवाददाताओं को भारत से निकाल दिया गया.

रॉयटर्स सहित कई विदेशी न्यूज़ एजेंसियों के टेलीफोन और दूसरी सुविधाएं काट दी गई...51 विदेशी पत्रकारों की मान्यता छीन ली गई...29 विदेशी पत्रकारों को भारत में एंट्री देने से मना कर दिया गया

उस दौर में संपादकों के एक समूह ने सरकार के आगे घुटने टेक दिए थे...दिल्ली के 47 संपादकों ने 9 जुलाई 1975 को इंदिरा गांधी द्वारा उठाए गए सभी कदमों में अपनी आस्था व्यक्त की थी...यहां तक कि इन संपादकों ने समाचार पत्रों पर लगाई गई सेंसरशिप को भी सही ठहरा दिया था. ऐसे संपादकों के बारे में बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी का वो कथन बहुत मशहूर है, जब उन्होंने कहा था कि-जब उन्हें झुकने के लिए कहा गया था, तो वो रेंगने लगे थे.

इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी और संजय गांधी के सामने रेंगने वाले जिन पत्रकारों का हमने ज़िक्र किया. उन्हें इंदिरा गांधी ने सत्ता में दोबारा आने पर पुरस्कार दिए और पद दिए. ये सारे आज बड़े लोग हैं, जिन्होंने ख़ूब पैसा और नाम कमाया था. आगे चलकर यही पत्रकार देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी की बातें करने लगे. मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर फ़िक्र जताने लगे. इनमें से कुछ को आप आज के डिज़ाइनर पत्रकारों के रूप में भी देखते हैं.

वैसे, आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने अवैध तरीके से भारत के संविधान की प्रस्तावना को भी बदल दिया था. 

हमारे देश के संविधान की मूल प्रस्तावना में धर्म-निरपेक्ष शब्द नहीं था. ये शब्द संविधान की प्रस्तावना में बाद में जोड़ा गया है . 

देश में इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी की सरकार ने 1976 में संविधान में 42 वां संशोधन किया था... और संविधान की प्रस्तावना में दो शब्द जोड़े गये... ‘Secular’ यानी पंथ-निरपेक्ष और ‘Socialist’ यानी समाजवादी... 

संविधान में तो Secular शब्द का अनुवाद पंथ-निरपेक्ष किया गया है... लेकिन इसे बाद में धर्मनिरपेक्ष कहा जाने लगा . और फिर देश की तमाम पार्टियों, डिज़ाइनर पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने इस शब्द का खूब गलत इस्तेमाल किया और आज भी अपने राजनीतिक हित साधने के लिए करते हैं.
इंदिरा गांधी ने संविधान की प्रस्तावना में Socialist शब्द गरीबों को लुभाने के लिए जोड़ा और धर्मनिरपेक्षता शब्द मुसलमानों को ख़ुश करने के लिए जोड़ा. 

जय प्रकाश नारायण ने गरीबों के लिए ही समग्र क्रांति की बात की थी. जय प्रकाश नारायण के प्रभाव को कम करने के लिए ही इंदिरा गांधी ने संविधान की प्रस्तावना में Socialist शब्द जोड़ा था.

आपातकाल के दौरान बहुत सारे मुसलमानों की जबरदस्ती नसबंदी की गई थी . इस वजह से मुस्लिम समुदाय के लोग, कांग्रेस के सबसे बड़े विरोधी बन गए थे. 1977 के लोकसभा चुनाव से पहले इंदिरा गांधी ने मुसलमानों को ख़ुश करने के लिए संविधान की प्रस्तावना में Secular शब्द जोड़ा था. 

आज आपको इंदिरा गांधी का वो इंटरव्यू सुनना चाहिये...जिसमें उन्होंने इमरजेंसी लगाने के फ़ैसले को सही ठहराया था. वर्ष 1978 में एक विदेशी चैनल ने इंदिरा गांधी का इंटरव्यू किया था.

और अब हम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उस राजनीतिक हमले का विश्लेषण करेंगे, जिसकी वजह से कांग्रेस पार्टी आज बहुत घायल हो गई . लेकिन उससे पहले आपको प्रधानमंत्री की एक तस्वीर देखनी चाहिए. नरेंद्र मोदी...संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर दिये गये धन्यवाद प्रस्ताव पर बोल रहे थे. जैसे ही उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत की, सदन में मोदी-मोदी की नारेबाज़ी शुरु हो गई. लेकिन नरेंद्र मोदी ने सदन में मौजूद सांसदों को ऐसा करने से रोक दिया.

इस तस्वीर को आप सामान्य शिष्टाचार भी कह सकते हैं. लेकिन, राजनीति की नज़रों से देखा जाए, तो एक प्रकार से प्रधानमंत्री मोदी खुद को तैयार कर रहे थे. क्योंकि उनके भाषण में धन्यवाद की मात्रा कम थी और विपक्ष पर कटाक्ष की तादाद ज़्यादा थी. ताकि विपक्षी दलों को ये राजनीतिक चोट ज़ोर से महसूस हो. आज प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में अपनी सरकार के काम गिनाए और भविष्य के भारत की बात कही. लेकिन, 64 मिनट के अपने भाषण में ज़्यादातर मौकों पर प्रधानमंत्री का निशाना कांग्रेस पर ही था.

उन्होंने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी को घेरा. उस वक्त सोनिया गांधी और राहुल गांधी, दोनों सदन में मौजूद थे. Uniform Civil Code से लेकर शाह बानो केस तक...हर मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसे ज़ुबानी शॉट्स मारे...जो Boudary पार करके सीधे राहुल गांधी और सोनिया गांधी को चुभ रहे थे. हमने उनके भाषण की एक Zip File बनाई है. जिसमें आपको नरेंद्र मोदी के आक्रोश के साथ-साथ उनका चुटीला अंदाज़ भी दिखाई देगा.