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ZEE जानकारी: जानें आपातकाल का इतिहास

25 जून 1975 की आधी रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगा दिया .

ZEE जानकारी: जानें आपातकाल का इतिहास

और अब हम इमरजेंसी पर DNA की Special Series में आपातकाल के तीसरे अध्याय का विश्लेषण करेंगे . 25 जून 1975 की आधी रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगा दिया . और आज से ठीक 44 वर्ष पहले 26 जून 1975 को सुबह 6 बजे उन्होंने कैबिनेट की एक बैठक बुलाई थी . ये बैठक किसी विचार विमर्श के लिए नहीं बल्कि मंत्रियों को ये सूचना देने के लिए बुलाई गई थी कि आपातकाल लगा दिया गया है .

इस बैठक के तुरंत बाद इंदिरा गांधी, All India Radio के ऑफ़िस रवाना हो गईं, जहां उन्होंने देश को संबोधित किया. इंदिरा गांधी ने देश की जनता को बताया कि सरकार ने जनता के हित में कुछ प्रगतिशील योजनाओं की शुरुआत की थी . लेकिन इसके खिलाफ गहरी साज़िश रची गई इसीलिए उन्हें आपातकाल जैसा कठोर कदम उठाना पड़ा . संजय गांधी का नसबंदी कार्यक्रम भी इसी प्रगतिशील योजना का हिस्सा था, जिसका आज हम DNA टेस्ट करेंगे . 

इतिहासकार राम चंद्र गुहा ने लिखा है कि इंदिरा गांधी शायद 20वीं शताब्दी की पहली और एकमात्र महिला तानाशाह थीं . इंदिरा गांधी ने अपने महिला होने का खूब लाभ भी उठाया . आपातकाल लगाने के चार महीने के बाद एक संबोधन में इंदिरा ने खुद की तुलना एक मां और देश की तुलना एक बच्चे से की थी . अपने संबोधन में इंदिरा गांधी ने कहा कि...

हमने महसूस किया कि देश को एक बीमारी लग गई है और अगर इसका इलाज करना है तो इसे दवा देनी ही पड़ेगी . भले ही वो कड़वी क्यों ना हो ? कितना भी प्यारा बच्चा क्यों न हो ? अगर डॉक्टर ने उसे दवा लिखी है, तो उसे दवा तो खिलानी पड़ेगी . इसलिए हमें ये कड़वी दवा देश को खिलानी पड़ी . ये भी सच है कि जब कभी बच्चे को तकलीफ होती है, तो मां को भी होती है . हम भी ये कदम उठाकर बहुत खुश नहीं हैं . लेकिन हमने पाया कि इसने वैसा ही असर किया है जैसे डॉक्टर की दवा का असर होता है.

इंदिरा गांधी ने खुद को Mother India समझ लिया था . 1977 के चुनाव में ये साबित हो गया कि देश की जनता ने इंदिरा गांधी को Mother India नहीं माना . लेकिन उस वक्त देश के कुछ बड़े पत्रकारों ने इंदिरा गांधी को Mother India भी माना और इसी रूप में उनकी Branding भी की . आज हम आपको देश के उन प्रमुख पत्रकारों के नाम बताएंगे जिनको सरकार ने झुकने के लिए कहा था लेकिन वो रेंगने लगे थे . 

इसके अलावा हम आपको प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक खुशवंत सिंह के बारे में भी बताएंगे . खुशवंत सिंह ने आपातकाल का समर्थन किया था . जब उन पर सवाल उठे तो उन्होंने एक किताब लिखकर स्पष्टीकरण भी दिया, जिसका शीर्षक था... Why I Supported Emergency ?

उस वक्त हिंदी सिनेमा के बड़े-बड़े नायक इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी की Branding में लगे हुए थे . हम आपको कुछ ऐतिहासिक तस्वीरें भी दिखाएंगे. साथ ही ये भी बताएंगे कि कैसे संजय गांधी और उनके करीबी मंत्रियों ने फिल्मों पर भी सेंसरशिप लागू कर दी थी. 

इसके अलावा हम आपको उन लोगों से मिलवाएंगे जो इमरजेंसी के गवाह बने . ये वो लोग थे जिन्होंने Zee News के स्टूडियो आकर इमरजेंसी की गवाही दी थी . इन लोगों में भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी शामिल थे .
((आज हम आपको ये भी बताएंगे कि कौन सी पार्टियां आपातकाल के फैसले में इंदिरा गांधी के साथ थीं . और इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी हटाने का फैसला क्यों किया ? ))

अपनी किताब 'भारत-नेहरू के बाद' में इतिहासकार रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि आपातकाल के वक्त देश के 253 बड़े पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया था . 

वो लिखते हैं कि 27 अखबारों ने बड़े आराम से सरकार के सामने घुटने टेक दिए थे . इन अखबारों में The Hindu, The Times Of India और Hindustan Times का नाम प्रमुख था. Hindustan Times के प्रसिद्ध और सम्मानित संपादक B G वर्गीज को उनके पद से बर्खास्त कर दिया गया . अखबार के मालिक K K बिड़ला ने इंदिरा गांधी को खुश करने के लिए ऐसा किया था . 
सरकार ने जिन पत्रकारों को जेल में डाला उनमें Indian Express में काम कर रहे कुलदीप नैयर का नाम भी शामिल था . 

20 जून 2010 को एक वेबसाइट ने वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर का लेख प्रकाशित किया था . इस लेख में कुलदीप नैयर ने उन संपादकों का ज़िक्र किया है जिन्होंने आपातकाल के फैसले का समर्थन किया . 

कुलदीप नैयर लिखते हैं कि The Hindu के संपादक G कस्तूरी व्यवस्था का हिस्सा बन गए . वो समाचार नाम की एक एजेंसी के प्रमुख थे . PTI, UNI और हिंदुस्तान समाचार का विलय करके समाचार एजेंसी की स्थापना की गई थी . G कस्तूरी सरकार की आज्ञा का पालन करते हुए सरकार विरोधी खबरों को दबा रहे थे . 

एक स्थानीय अखबार Eenadu आपातकाल के खिलाफ था. लेकिन वो सरकार के गुस्से का शिकार नहीं होना चाहता था . Eenadu ने सरकार की Line पर चलने से इनकार कर दिया . लेकिन मुसीबत को टालने के लिए वो आपातकाल का विरोध नहीं कर सका . 

उस वक़्त The Times Of India के संपादक शाम लाल नाम के पत्रकार थे . और गिरीलाल जैन दिल्ली के Resident Editor थे . ये दोनों ही पत्रकार इंदिरा गांधी के समर्थक थे. लेकिन Press पर सेंसरशिप लगाने के फैसले के विरोधी थे . लेकिन वो अखबार के प्रबंधन के सामने मजबूर थे .

प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार खुशवंत सिंह ने अंग्रेजी की एक प्रसिद्ध पत्रिका में लिखा था कि The Times Of India के संपादक शाम लाल, आपातकाल का समर्थन करने वाले पत्रकारों के नेता थे . शाम लाल के बाद अखबार के Number Two संपादक गिरिलाल जैन थे . वो आपातकाल के दौरान देश के नए नेता के तौर पर संजय गांधी की Branding कर रहे थे . इसके अलावा नवभारत टाइम्स, महाराष्ट्र टाइम्स और धर्मयुग के संपादकों ने भी आपातकाल का विरोध करने वालों से दूरी बनाई थी . 

संजय गांधी के सबसे बड़े Fan खुशवंत सिंह थे . अपनी किताब 'भारत नेहरू के बाद' में रामचंद्र गुहा लिखते हैं... 

खुशवंत सिंह, संजय गांधी के सबसे बड़े प्रशंसक बनकर उभरे . संजय गांधी के बारे में ये कहा गया कि ये वो आदमी है, जो ‘काम करवाने का माद्दा’ रखता है . ((इलस्ट्रेटेड वीक्ली)) illustrated Weekly नाम की एक पत्रिका ने संजय गांधी और उनकी पत्नी मेनका गांधी पर विस्तार से एक फीचर प्रकाशित किया था . जिसमें बड़े ही खूबसूरत शब्दों के साथ उनकी तस्वीरें छापी गई थीं .

यानी उस वक्त पत्रकारों का बड़ा वर्ग संजय गांधी की Branding में लगा हुआ था. 
जब खुशवंत सिंह की आलोचना हुई तो उन्होंने स्पष्टीकरण देने के लिए एक किताब भी लिखी... जिसका नाम है... Why I Supported Emergency

हमें ये जानने की बहुत दिलचस्पी थी कि कोई पत्रकार और लेखक आपातकाल के समर्थन में क्या तर्क देना चाहता है ? लेकिन खुशवंत सिंह की किताब का अध्ययन करने के बाद हम बहुत निराश हुए . इसी किताब में खुशवंत सिंह लिखते हैं.. 

मैं ये मानता हूं कि विरोध भी लोकतंत्र का एक अभिन्न हिस्सा है. आप सरकार की निंदा के लिए सभा कर सकते हैं. आप हड़ताल कर सकते हैं और बंद करके भी विरोध कर सकते हैं लेकिन आप हिंसा नहीं कर सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो सरकार का ये कर्तव्य है कि ताकत का इस्तेमाल करके उसको दबाया जाए. 

किताब में खुशवंत सिंह ने सबसे महत्वपूर्ण तर्क ये दिया कि लोकतंत्र में हिंसा का दमन करना सरकार का कर्तव्य है. लेकिन ये तर्क बहुत कमज़ोर है. अगर जनता के द्वारा की गई हिंसा गलत है तो सरकार के द्वारा की गई हिंसा को सही कैसे ठहराया जा सकता है ?

आज हमने उन पत्रकारों से भी बात की है . जिन्होंने आपातकाल के दौर को बहुत करीब से देखा था . और आपातकाल के दौरान जेल की यात्रा भी की थी . इन पत्रकारों की बात आज पूरे देश को सुननी चाहिए . 

संजय गांधी ने सरकार विरोधी शक्तियों की लोकप्रियता को खत्म करने के लिए फिल्मों का भी खूब इस्तेमाल किया . 

चुनाव की घोषणा के बाद वर्ष 1977 में विपक्षी पार्टियों ने दिल्ली के रामलीला मैदान में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया था . 

जिस वक्त रैली होनी थी उसी वक्त एक हिट रोमांटिक फिल्म Bobby का प्रसारण सरकारी टेलीविजन पर किया गया . 
ऐसा इसलिए किया गया ताकी लोग विपक्षी पार्टियों की रैली में नहीं जाकर फिल्म का आनंद लें .लेकिन सरकार का ये दांव नहीं चला था. और रैली में तीन लाख से ज़्यादा लोग शामिल हुए थे.
संजय गांधी ने पत्रकारिता के साथ साथ, वर्ष 1975 से ही हिंदी सिनेमा पर भी अघोषित सेंसरशिप लगा दी थी . वो आपातकाल के दौरान अपनी योजनाओं को लागू कराने के लिए हिंदी सिनेमा के प्रमुख कलाकारों का इस्तेमाल कर रहे थे. ऐसे ही एक कार्यक्रम की कुछ ऐतिहासिक तस्वीरें हम आपको आज दिखाना चाहते हैं .

शोले फिल्म 15 अगस्त 1975 को आपातकाल के दौरान ही रिलीज़ हुई थी. और उस दौर में गिरफ्तार हुए कुछ नेता बताते हैं कि कई बार वो पुलिस से छुपने के लिए सिनेमा Hall में घुस जाते थे . और वहां लगातार बैठ-कर... एक के बाद एक शोले फिल्म के कई Show देखते थे . ताकी पुलिस उन्हें गिफ्तार नहीं कर सके . 

आपातकाल के दौरान, जिस अभिनेता या गायक ने सरकार के ख़िलाफ आवाज़ उठाई उसकी आवाज़ छीन ली गई . प्रसिद्ध गायक और अभिनेता किशोर कुमार, सरकार के दबाव में नहीं आए तो आकाशवाणी पर उनके गाने प्रतिबंधित कर दिए गए . और Income Tax को उनके पीछे लगा दिया गया . कई कलाकारों की फिल्में रिलीज़ नहीं होने दी गईं . कई फिल्मों के प्रिंट जला दिए गए . हिंदी सिनेमा पर ये अत्याचार आपातकाल का एक और अध्याय है . 

आप फ़िल्मी कलाकारों को अपना Idol मानते हैं. फ़िल्मी पर्दे पर आप को हीरो बहुत बहादुर नज़र आते हैं. लेकिन, असल ज़िंदगी में वो कैसे होते हैं, ये आपने इमरजेंसी के दौरान देखा. इसी तरह आप कुछ पत्रकारों और संपादकों को अपना आदर्श मानते हैं. उन्हें निर्भीक और सरकार का सामना करने वाला समझते हैं. लेकिन इमरजेंसी के दौरान ऐसे ही कुछ पत्रकारों के साहस के बारे में भी हमने आज आप को बताया.

आपातकाल के दौरान संजय गांधी का सबसे कुख़्यात फैसला था....परिवार नियोजन के कार्यक्रम को सख्ती से लागू करना . 

इसके आधिकारिक आंकड़े तो नहीं हैं कि इमरजेंसी के दौरान कितने लोगों की नसबंदी कराई गई...लेकिन इस मुद्दे पर ऑस्ट्रेलिया की एक प्रोफेसर मैरिका विकज़ियानी की किताब में दावा किया गया था कि 25 जून 1975 से मार्च 1977 तक भारत में करीब 1 करोड़ 10 लाख पुरुषों और करीब 10 लाख महिलाओं का Sterilization किया गया था.

संजय गांधी ने इस कार्यक्रम का प्रयोग सबसे पहले दिल्ली में किया...जहां इसकी ज़िम्मेदारी दिल्ली के तत्कालीन उप-राज्यपाल कृष्ण चंद और उनके सचिव नवीन चावला को मिली...नवीन चावला बाद में यूपीए सरकार के दौरान मुख्य निर्वाचन आयुक्त भी बने .

इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए NDMC की उस वक्त की अध्यक्ष विद्याबेन शाह के अलावा संजय गांधी की करीबी रुख़साना सुल्ताना को भी चुना गया था. 

उस वक्त 31 वर्ष की रुखसाना सुल्ताना को संजय गांधी का Right Hand कहा जाता था .

संजय गांधी ने दिल्ली में जामा मस्जिद के आसपास मुस्लिम इलाकों में परिवार नियोजन के कार्यक्रम को लागू कराने की ज़िम्मेदारी रुखसाना सुल्ताना को दी...और उन्होंने एक साल में करीब 13 हज़ार नसबंदियां कराईं...

जगह जगह Sterilization camps लगाए गए...नसबंदी कराने वाले लोगों को 75 रुपये, काम से एक दिन की छुट्टी और एक डिब्बा घी दिया जाता था...कहीं कहीं पर साइकिल भी दी जाती थी...ऐसी ख़बरें भी सामने आईं कि सफाई कर्मचारियों, रिक्शा चलाने वालों और मज़दूरों का ज़बरदस्ती Sterilization करा दिया गया

अप्रैल 1976 में दिल्ली में सभी सरकारी दफ्तरों, स्कूल, कॉलेज और प्रशासनिक दफ्तरों में एक सर्कुलर भेजा गया..और कहा गया कि जिनके दो से ज़्यादा बच्चे हैं...उन सबको नसबंदी करानी पड़ेगी...अध्यापकों और सरकारी कर्मचारियों को टारगेट दे दिए गए थे...कि एक निर्धारित संख्या के लोगों को कैंप में लेकर आना है

यहां तक कि Sterilization Certificate नहीं दिखाने पर Driving Licences का Renewal रोक दिया जाता था...इसके अलावा अस्पताल में मुफ्त इलाज से भी मना कर दिया जाता था...

24 जून 2014 को अमेरिका के एक रिसर्च ग्रुप Population Research Institute द्वारा प्रकाशित एक लेख में कहा गया कि हर राज्य में Sterilization करने की Tactics अलग होती थी...

राजस्थान में जिन सरकारी कर्मचारियों के 3 से ज़्यादा बच्चे थे...उनसे कहा गया कि जब तक वो नसबंदी नहीं कराते.. उनको नौकरी से सस्पेंड रखा जाएगा...

मध्य प्रदेश में जब तक नसबंदी का Quota पूरा नहीं होता था...उस गांव के किसानों को सिंचाई का पानी नहीं दिया जाता था

उत्तर प्रदेश में अध्यापकों से कहा गया कि वो नसबंदी कराएं...नहीं तो एक महीने का वेतन काट लिया जाएगा

बिहार में जिन परिवारों में दो से ज़्यादा बच्चे थे...उनको सरकारी राशन देने से इनकार कर दिया गया

हालत ये हो गई थी कि नसबंदी का टारगेट पूरा करने के लिए और सरकार की सख्त कार्रवाई से बचने के लिए.... बच्चों और बूढ़ों का भी Sterilization करा दिया गया था

आपातकाल के दौर को करीब से देखने वाले कुछ लोग दावा करते हैं कि बांग्लादेश में आपातकाल लगाने वाले... बांग्लादेश के पहले प्रधानमंत्री शेख मुजीबुर रहमान की वजह से.... भारत की जेलों में बंद राजनीतिक कैदियों की जान बच गई . ये घटना बहुत दिलचस्प है .

वर्ष 1974 में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री शेख मुजीबुर रहमान ने इमरजेंसी लगा दी थी . वर्ष 1975 तक शेख मुजीब ने बांग्लादेश में अपनी पार्टी की तानाशाही क़ायम कर दी थी . इससे नाराज़ होकर बांग्लादेश की सेना के कुछ अधिकारियों ने बग़ावत कर दी . 15 अगस्त 1975 को मुजीबुर रहमान और उनके पूरे परिवार की हत्या कर दी गई थी . केवल उनकी दो बेटियां ही इस हत्याकांड से बची थीं . मुजीबुर रहमान की बेटी शेख हसीना वाजेद ही आज बांग्लादेश की प्रधानमंत्री हैं .

कहा जाता है कि मुजीबुर रहमान की हत्या के बाद इंदिरा गांधी काफी डर गई थीं . और उन्होंने आपातकाल के दौरान जेलों में बंद किए गए राजनीतिक कैदियों की हत्या नहीं करवाई . 
उस दौरान भारत की जेलों में एक गाना बहुत प्रसिद्ध हो गया था... 

15 अगस्त को शेख मुजीब बंगला में जो मारा जाता ना
भारत की जेल में एक भी नेता जिंदा रह पाता ना 

यानी अगर शेख मुजीबुर रहमान मारे नहीं जाते, तो भारत की जेल में एक भी नेता ज़िंदा नहीं बच पाता .
हम आज लगातार तीसरे दिन आपको आपातकाल की हर प्रमुख घटना की जानकारी दे रहे हैं .

जब इमरजेंसी लागू हुई तब पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, कांग्रेस के नेता थे . आज से 19 वर्ष पहले सन् 2000 में प्रणब मुखर्जी Zee News के स्टूडियो में आए थे. तब उन्होंने आपातकाल लगाने के इंदिरा गांधी के फैसले का समर्थन किया था. बाद में प्रणब मुखर्जी देश के राष्ट्रपति चुने गए. इसलिए आज Zee News पर उनकी बात सुनना बहुत ज़रूरी है.