ZEE जानकारी: यादें उस दौर की जब चिट्ठियां हमारी जिंदगी का हिस्सा हुआ करती थीं

एक वो दौर भी था. जब चिट्ठियां हमारे जीवन का ज़रूरी हिस्सा हुआ करती थीं. और खाकी वर्दी वाले डाकिये का इंतज़ार परिवार के हर सदस्य को होता था .

ZEE जानकारी: यादें उस दौर की जब चिट्ठियां हमारी जिंदगी का हिस्सा हुआ करती थीं

 World Post Day यानी विश्व डाक दिवस के अवसर हम भारतीय डाक के सुनहरे और खुशियों भरे दिनों का एक DNA टेस्ट करेंगे . लेकिन उससे पहले आपसे एक सवाल आपने पिछली बार अपने किसी दोस्त या रिश्तेदार को कोई चिट्ठी कब लिखी थी . आप में से ज़्यादातर लोग यहीं कहेंगे कि याद नहीं है. हो सकता है कुछ लोग ये तर्क भी दें कि WhatsApp के युग में चिट्ठी कौन लिखता है. आपकी ये बात कुछ हद तक ठीक भी है, लेकिन डिजिटल युग के दबाव में आप ये बात भूल रहे हैं कि अपनी भावनाओं को कागज़ पर लिखकर भेजने का सबसे असरदार माध्यम चिट्ठियां हुआ करती थीं. 

ये वो दौर था. जब चिट्ठियां हमारे जीवन का ज़रूरी हिस्सा हुआ करती थीं. और खाकी वर्दी वाले डाकिये का इंतज़ार परिवार के हर सदस्य को होता था . लेकिन सूचना क्रांति के युग में मोबाइल फोन ऐसा डिजिटल डाकिया बन गया है, जो चुटकियों में एक संदेश को दुनिया के किसी भी हिस्से में पहंचा सकता है. आज Email का ज़माना है . इस युग में आपका Inbox तो Full है, लेकिन चिट्ठियों वाले लाल रंग के Letter Box खाली पड़े हैं . डाकियों की जगह अब Courier boy ले चुके हैं. जिसकी वजह से भारतीय डाक अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा हैं . 

आप अपने जीवन में डाक विभाग के योगदान को भूल न जाएं, इसलिए हर साल 9 अक्टूबर को World Post Day मनाया जाता है . वैसे भारतीय डाक दिवस 10 अक्टूबर को मनाया जाता है .  डाक दिवस मनाने का मकसद लोगों को डाक सेवाओं और डाक विभाग के बारे में जागरूक रखना है .

आपको याद होगा कि हमारी पुरानी पाठ्य-पुस्तकों में P से Postman पढ़ाया जाता था, उस दौर में डाकिये पर निबंध लिखने को दिया जाता था, लेकिन ये पुरानी बात हो चुकी हैं. 

वर्ष 1969 में आज ही के दिन Japan की राजधानी Tokyo में Universal Postal Union में ये तय किया गया था कि पूरी दनिया में World Post Day मनाया जाए . 

Universal Postal Union उन देशों का समहू है, जो अपने देश में डाक सुविधाएं उपलब्ध करवाती हैं .

वर्ष 1876 में भारत इस संस्था का सदस्य बनने वाला पहला एशियाई देश था. लेकिन भारत मे डाक सुविधाएं वर्ष 1727 में ही शुरू हो चुकी थी. इसी वर्ष ही भारत में पहला प्रधान डाकघर...कलकत्ता में खोला गया था .

इसके बाद मद्रास और Bombay में प्रधान डाकघर खोल गये . तब इन शहरों का यही नाम था . 

वर्ष 1861 में भारत में 889 डाकघर थे, तब भारत में हर साल 4 करोड़ से ज़्यादा चिट्ठियां और करीब 45 लाख अखबार डाक के जरिये लोगों को भेजे जाते थे .

वर्ष 1947 में भारत में डाकघरों की संख्या 23 हज़ार 344 हो गयी . वर्तमान में देश में डेढ़ लाख से ज़्यादा डाकघर हैं . इनमें से करीब 90 प्रतिशत डाकघर ग्रामीण इलाकों में हैं . 

वर्ष 1879 में पहली बार पोस्टकार्ड की सुविधा शुरू की गई थी . ये भारतीय डाक की सबसे सस्ती पत्र व्यवहार सुविधा थी . जो आज भी चल रही है . वर्तमान में एक पोस्टकार्ड की कीमत 50 पैसे हैं . आप चाहें तो एक रुपये में 2 पोस्टकार्ड खरीद कर अपने मिलने वालों को पत्र लिख सकते हैं . ये आपके लिए एक यादगार अनुभव होगा . आज के दौर में चिट्ठियों की जगह Email भेजे जाते हैं . एक अनुमान के मुताबिक भारत मे करीब 20 करोड लोग Email के ज़रिए सूचनाएं एक- दूसरे को भेजते हैं . यानी आज के दौर में Email एक डिजिटल डाकिया बन चुका है . अब Letter Box की जगह Inbox का इस्तेमाल किया जाता है . 

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