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ZEE जानकारी: जम्मू कश्मीर में जारी है 'हाईवे' पर राजनीति

जम्मू-कश्मीर सरकार ने फैसला लिया है कि बारामूला से उधमपुर जाने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग, 31 मई 2019 तक, हफ्ते में दो दिन के लिए आम नागरिकों के लिए बंद रहेगा.

ZEE जानकारी: जम्मू कश्मीर में जारी है 'हाईवे' पर राजनीति

अब हम जम्मू-कश्मीर में चल रही Highway वाली राजनीति का DNA टेस्ट करेंगे.
अंग्रेज़ी का एक बड़ा मशहूर वाक्य है - My Way Or The Highway...इस कथन का प्रयोग 1970 के दशक में अमेरिका में शुरु हुआ था. इस वाक्य का अर्थ ये होता है, कि इसे सुनने वाले को, बोलने वाले की बातें माननी होंगी. या फिर रास्ते से हट जाना होगा. इस वाक्य को Autocracy या निरंकुश राज्यशासन से जोड़कर देखा जाता है और इसे नकारात्मक माना जाता है. लेकिन देश की सुरक्षा से जुड़े मामलों में कड़े फैसले लेने के लिए कई बार ऐसे तेवरों की ज़रूरत होती है. 

कल जम्मू-कश्मीर सरकार ने एक ऐसा ही फैसला लिया है. जिसके तहत बारामूला से उधमपुर जाने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग, 31 मई 2019 तक, हफ्ते में दो दिन के लिए आम नागरिकों के लिए बंद रहेगा. हर हफ्ते, रविवार और बुधवार को सुबह 4 बजे से लेकर शाम 5 बजे तक आम नागरिक इस Highway का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे. 

ये फैसला आम नागरिकों को कष्ट पहुंचाने के लिए नहीं लिया गया है. बल्कि इसके पीछे दो मुख्य वजहें हैं. पहली है, लोकसभा चुनाव. और दूसरी है, सुरक्षाबलों और आम नागरिकों की सुरक्षित आवाजाही. लेकिन सुरक्षा से जुड़े इस फैसले पर पिछले 24 घंटों से सिर्फ और सिर्फ राजनीति हो रही है. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला इस फैसले को तुगलकी फरमान बता रहे हैं. तो एक और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के मुताबिक, ये फैसला, Martial Law जैसा है. लेकिन इस बीच किसी को ना तो राज्य की जनता की परवाह है. और ना ही सुरक्षाबलों के हितों की चिंता. किसी ने इस फैसले को ठीक से पढ़ने और समझने की कोशिश भी नहीं की. इसलिए, ऐसे लोगों को इस फैसले से जुड़ी मुख्य बातें बताना हम अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं.

पुलवामा और बनिहाल में सुरक्षाबलों के काफिले पर हुए हमले के बाद जम्मू-कश्मीर प्रशासन फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है. लोकसभा चुनाव को देखते हुए, घाटी में बड़े पैमाने पर सुरक्षाबलों की ज़रुरत होगी. ऐसे में उन्हें एक जगह से दूसरी जगह सुरक्षित पहुंचाना एक बहुत बड़ी चुनौती है. क्योंकि, अब भी आतंकवादी हमलों का ख़तरा बना हुआ है. इसीलिए राष्ट्रीय राजमार्ग पर Traffic Movement को Regulate करने का फैसला लिया गया है. 

चुनाव को देखते हुए सुरक्षाबलों को एक जगह से दूसरी जगह भेजा जाएगा. लिहाज़ा काफिले पर फिदायीन हमले का ख़तरा है. और इसी हमले की आशंका को कम करने के लिए ये फैसला लिया गया है. ताकि हमारे सैनिक भी सुरक्षित रहें. और आम लोगों का भी कोई नुकसान ना हो. 

ऐसा नहीं है, कि Emergency के हालात में जम्मू-कश्मीर के आम नागरिक, राष्ट्रीय राजमार्ग का प्रयोग नहीं कर पाएंगे.

Notification के मुताबिक अगर कोई Emergency होती है...तो ऐसी स्थिति में स्थानीय प्रशासन अपने स्तर पर उचित कार्रवाई करेगा. और लोगों को Pass या Permit देकर उन्हें आने-जाने की सुविधा दी जाएगी. हालांकि, इसके लिए प्रशासन से अनुमति लेनी होगी.

इस फैसले का एक मुख्य पहलू है, लोकसभा चुनाव के दौरान आतंकवादी हमले का ख़तरा.

खुफिया एजेंसियों के मुताबिक, ISI ने इन चुनावों को नाकाम करने के लिए लश्कर और जैश के आतंकियों की कई टीमें बनाई हैं. 

जो पोलिंग बूथ और चुनाव में हिस्सा लेने वाले उम्मीदवारों पर हमला कर सकते हैं. 

ISI ने घाटी में मौजूद आतंकियों को विस्फोटक के इस्तेमाल की ट्रेनिंग देने की योजना भी बनाई है. और इसके लिए वो अफगानिस्तान के एक आतंकवादी की घुसपैठ कश्मीर में कराना चाहती है.

पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ने आतंकियों की तीन टीमें बनाई हैं. जिन्हें सेना के जवानों और सुरक्षा बलों के काफिले पर हमला करने को कहा गया है. 

यानी एक तरफ पाकिस्तान किसी भी कीमत पर कश्मीर में लोकसभा चुनावों को नाकाम करना चाहता है. और दूसरी तरफ हमारे ही देश के नेता, इस गंभीर परिस्थिति को हल्के में ले रहे हैं. राज्य सरकार के इस फैसले पर वहां की आम जनता तो कुछ नहीं बोल रही. लेकिन जम्मू-कश्मीर के नेताओं ने सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील विषय पर अपना एजेंडा चलाना शुरु कर दिया है. ये नेता चुनावी रैलियों में इस फैसले को इस तरह प्रचारित कर रहे हैं, कि दिल्ली में लिया गया फैसला उन पर ज़बरदस्ती थोपा जा रहा है. वैसे जो नेता इस तरह की बातें बोल रहे हैं, वो खुद चुनावी रैलियों में सुरक्षाबलों का काफिला लेकर चलते हैं. 

उमर अब्दुल्ला, उनके पिता फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती तीनों को Z Plus श्रेणी की सुरक्षा मिली हुई है. Z Plus श्रेणी की सुरक्षा में 36 सुरक्षाकर्मी तैनात होते हैं, जिसमें SSG कमांडो और बाकी पुलिस दल के लोग शामिल होते हैं. और इसे देश की सबसे बड़ी सुरक्षा श्रेणी भी कहा जाता है. लेकिन, सुरक्षा घेरे में चलने वाले इन नेताओं की नज़रों में देश के सैनिकों और आम नागरिकों की सुरक्षा का कोई महत्व नहीं है. अलगाववाद की राजनीति करने वाले नेताओं के लिए देश की जनता और देश के सैनिक, VIP यानी Very Important Person नहीं, बल्कि Least Important Person हैं. शायद इसीलिए, उनके हित में लिए गए फैसले पर इतनी राजनीति हो रही है.

अब इसी ख़बर से जुड़ा हुआ एक विरोधाभास देखिए. 

मुख्यमंत्री रहते हुए, जब उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती का काफिला श्रीनगर की सड़कों से गुज़रता था, तो सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए रास्ते Block कर दिए जाते थे. आम जनता को आगे जाने की इजाज़त नहीं दी जाती थी. और ये सबकुछ VIP सुरक्षा के नाम पर किया जाता था. फिर चाहे लोग परेशान हों. और उनके जीवन में कोई बड़ी मुसीबत ही क्यों ना हो. लेकिन उस वक्त ऐसे नेताओं का ध्यान लोगों की समस्याओं पर नहीं जाता था. और आज जब उन्हीं लोगों और सुरक्षा बलों की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए हफ्ते में , दो दिनों तक हाइवे बंद करने का फैसला हुआ है, तो इन नेताओं ने राजनीति शुरु कर दी है. शुद्ध हिन्दी में इसे अवसरवादी राजनीति कहते हैं. इस राजनीति को पहचानना ज़रूरी है.