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ZEE जानकारी: ICJ ने पाकिस्तान से कुलभूषण जाधव की फांसी की सजा की समीक्षा को कहा

अदालत ने कुलभूषण जाधव केस की दोबारा सुनवाई और फांसी की सज़ा पर पुर्नविचार करने का निर्देश दिया है.

ZEE जानकारी: ICJ ने पाकिस्तान से कुलभूषण जाधव की फांसी की सजा की समीक्षा को कहा

आज हम सबसे पहले देश की 135 करोड़ से ज़्यादा की आबादी को दिल से बधाई देना चाहते हैं. क्योंकि, अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस के दिन, International Court of Justice ने कमांडर कुलभूषण जाधव के सत्य का अभिनंदन किया है. और भारत के पक्ष में फैसला सुनाते हुए, पाकिस्तान को पूरी दुनिया में अकेला कर दिया है. ये एक बहुत बड़ी जीत है. जिसके दूरगामी परिणाम देखने को मिलेंगे. ICJ का फैसला 42 पन्नों में दर्ज है. लेकिन सबसे ज़रुरी बात लिखी है, फैसले के 40वें पन्ने में.

अदालत ने इस केस की दोबारा सुनवाई और फांसी की सज़ा पर पुर्नविचार करने का निर्देश दिया है.  इसका मतलब ये हुआ, कि पाकिस्तान की सैन्य अदालत द्वारा सुनाई गई फांसी की सज़ा पर रोक जारी रहेगी. 

अदालत ने ये भी कहा है, कि फांसी की सज़ा पर रोक लगाए रखना पाकिस्तान के लिए एक अनिवार्य शर्त है. और वो उससे पीछे नहीं हट सकता. 

पाकिस्तान का दावा था, कि नियमों के तहत इस केस की सुनवाई International Court of Justice में नहीं हो सकती.
लेकिन ICJ के 16 में से 15 जजों ने इस बात को खारिज कर दिया. और कहा कि कुलभूषण जाधव केस को ICJ में लाकर भारत ने कोई ग़लती नहीं की. और ये नियमों के अंतर्गत किया गया.

अदालत ने पाया, कि पाकिस्तान ने Vienna Convention का उल्लंघन किया है. क्योंकि, कुलभूषण जाधव की गिरफ्तारी के बाद उन्हें Vienna Convention के तहत मिलने वाले अधिकारों की जानकारी नहीं दी गई. 

Vienna Convention के मुताबिक, कुलभूषण जाधव की गिरफ्तारी के बाद पाकिस्तान को बिना किसी देरी के उसके गिरफ्तारी से जुड़ी सूचना पाकिस्तान में मौजूद भारत के उच्चायुक्त को देनी थी. लेकिन इस केस में उसने ऐसा नहीं किया. ये Vienna Convention के आर्टिकल 36 के पैराग्राफ One B का उल्लंघन है. 

ICJ ने ये भी पाया, कि पाकिस्तान ने कमांडर जाधव को Consular Access ना देकर, Vienna Convention के आर्टिकल 36 के पैराग्राफ One A और पैराग्राफ One C का उल्लंघन किया है. 

इसीलिए ICJ ने फैसला सुनाते हुए पाकिस्तान को आदेश दिया है, कि वो बिना किसी देरी के कमांडर जाधव को उनके अधिकारों के बारे में जानकारी दे. और उन्हें तत्काल प्रभाव से Consular Access की सुविधा दी जाए.

अदालत ने ये भी कहा है, कि इस केस की निष्पक्ष तरीके से दोबारा सुनवाई करने के लिए पाकिस्तान बाध्य है. ICJ ने पाकिस्तान को ये भी आदेश दिया है, कि ऐसा करते वक्त Vienna Convention के नियमों का उल्लंघन ना हो. 

अदालत के आदेश में ये भी कहा गया है, कि केस की सुनवाई के लिए पुर्नविचार का तरीका पाकिस्तान खुद चुन सकता है. लेकिन 
ये तरीका कारगर होना चाहिए.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ICJ के फैसले का स्वागत किया है और उसे तथ्यों के आधार पर फैसला सुनाने के लिए बधाई दी है. नरेंद्र मोदी ने ये भी कहा है कि सत्य और इंसाफ की जीत हुई है. उन्होंने भरोसा जताया है, कि कुलभूषण जाधव को इंसाफ ज़रुर मिलेगा. और भारत सरकार देश के हर नागरिक की सुरक्षा के लिए हर संभव प्रयास करती रहेगी.

ICJ के 16 में से 15 जजों ने सर्वसम्मति से भारत के पक्ष में फैसला सुनाया. जबकि एक वोट जो भारत के खिलाफ गया, वो पाकिस्तान के अस्थायी जज तस्सदुक हुसैन जिलानी का था.

42 पन्नों के फैसले में 8 मुख्य बिन्दुओं पर भारत के पक्ष में फैसला दिया गया. जबकि इनमें से 7 प्वाइंट्स ऐसे थे, जिसमें पाकिस्तानी जज ने भारत के खिलाफ फैसला दिया. यानी ICJ जैसी सम्मानित संस्था में जज के तौर पर बैठा एक पाकिस्तानी अगर पूर्वाग्रह से पीड़ित होकर फैसला सुना सकता है. तो इससे आप पाकिस्तान की नीयत का अंदाज़ा लगा सकते हैं. और ये भी समझ सकते हैं, कि इस फैसले के बाद जब कमांडर जाधव के केस की सुनवाई पाकिस्तान में नए सिरे से होगी. तो फिर सारे पाकिस्तानी जज क्या फैसला सुनाएंगे ?

ये पूरी लड़ाई कुलभूषण जाधव को Consular Access ना देने और Vienna Convention के नियमों का उल्लंघन करने के आधार पर लड़ी जा रही थी. जिसमें भारत की जीत हुई है. 

पाकिस्तान ने जाधव को मार्च 2016 में गिरफ्तार किया था. और तब से भारत ने एक या दो बार नहीं बल्कि 16 बार जाधव को Consular Access मुहैया करवाने की गुज़ारिश की, लेकिन पाकिस्तान ने हमेशा इंकार कर दिया.

भारत की मांग थी कि अंतर्राष्ट्रीय अदालत, पाकिस्तान की सैन्य अदालत द्वारा सुनाई गई सज़ा को Vienna Convention का उल्लंघन घोषित करे... और पाकिस्तान में कुलभूषण को फांसी देने से रोका जाए . 

Vienna Convention के Article 36 के तहत, अगर किसी विदेशी नागरिक को कोई देश अपनी सीमा के अंदर गिरफ्तार करता है, तो संबंधित देश के दूतावास को बिना किसी देरी के तुरंत इसकी सूचना देनी पड़ती है. 

गिरफ्तार किए गए विदेशी नागरिक के निवेदन पर पुलिस को संबंधित दूतावास या राजनयिक को Fax करके सूचना देना अनिवार्य है. 

इस Fax में पुलिस को गिरफ्तार व्यक्ति का नाम, गिरफ्तारी की जगह और गिरफ्तारी की वजह भी बतानी पड़ती है. 

लेकिन पाकिस्तान ने ऐसा नहीं किया. पाकिस्तान ने जाधव को 3 मार्च 2016 को गिरफ्तार किया था और इसकी जानकारी 25 मार्च को दी गई थी, वो भी एक Press Release के ज़रिए. 

International Court of Justice ने इन बिन्दुओं पर विचार करने के बाद पाकिस्तान को जमकर फटकाई लगाई. और उसे Consular Access ना देने और Vienna Convention के नियमों का उल्लंघन करने का दोषी पाया.
अब सवाल ये है, कि ICJ के फैसले के बाद पाकिस्तान क्या करेगा ? 

United Nations Charter के Article 94 में ये लिखा है कि संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों को अंतर्राष्ट्रीय अदालत के ऐसे फैसलों को मानना होगा, जिनमें वो खुद Party हैं. लेकिन ये भी एक तथ्य है कि अंतर्राष्ट्रीय अदालत अपने फैसलों को मानने के लिए किसी भी देश को बाध्य नहीं कर सकती. 

उदाहरण के तौर पर अमेरिका, जापान और चीन जैसे देश ICJ के फैसले को मानने से इंकार कर चुके हैं. 
2018 में ईरान के ऊपर लगाए गए प्रतिबंधों में छूट देने के लिए ICJ ने अमेरिका जैसे ताकतवर देश को आदेश दिया था. लेकिन अमेरिका ने उस फैसले को मानने से इंकार कर दिया था. 

हालांकि सुरक्षा परिषद पाकिस्तान को अदालत का फैसला मानने के लिए बाध्य कर सकती है. लेकिन वहां सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों की मर्ज़ी चलती है. अमेरिका, Russia, China, France और United Kingdom... में से एक ने भी इस फैसले के खिलाफ Veto कर दिया, तो फिर पाकिस्तान पर कुलभूषण की फांसी रोकने का कोई दबाव नहीं पड़ेगा. सुरक्षा परिषद में चीन पाकिस्तान का साथ दे सकता है.

हालांकि, इसका एक दूसरा पहलू भी है. जिसे पाकिस्तान नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता.

पाकिस्तान ने खुद Vienna Convention पर हस्ताक्षर किए हैं. और ICJ का फैसला खारिज करते ही वो इस Convention का हिस्सा नहीं रहेगा. 

फैसला खारिज करने के बाद अगर पाकिस्तान फिर कभी इस कोर्ट में जाता है, तो उसका पक्ष पहले ही कमज़ोर मान लिया जाएगा. 

इसके अलावा पाकिस्तान पर अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार संगठनों का दबाव बढ़ेगा. 

जिसका सीधा असर पाकिस्तान की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.

वर्ल्ड बैंक और इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड जैसे संस्थान भी पाकिस्तान से दूरी बना सकते हैं.

सवाल ये है, कि अमेरिका जैसे देश की तरह क्या पाकिस्तान ICJ के फैसले को मानने से इंकार कर सकता है. और इसका जवाब है नहीं. क्योंकि पाकिस्तान इस वक्त पूरी दुनिया में इतना अकेला और कमज़ोर पड़ चुका है, कि उसे ICJ का फैसला मानना ही पड़ेगा. 

इसी का एक दूसरा पहलू ये है, कि पाकिस्तान भले ही बाहर से इस फैसले को स्वीकार कर ले. लेकिन वो एक धोखेबाज देश है. और हो सकता है, कि दोबारा सुनवाई के नाम पर वो दुनिया की आंखों में धूल झोंके. और सरबजीत की ही तरह कमांडर जाधव को भी पाकिस्तान के किसी जेल में मार डाले. इसीलिए हम कह रहे हैं, कि

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के पास एक बहुत अच्छा मौका है. वो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी और अपने देश की साख बचा सकते हैं. भारत के साथ अपने संबंधों को अच्छा कर सकते हैं. अगर इमरान ख़ान एक कदम आगे बढ़कर बिना किसी शर्त पर कमांडर जाधव को रिहा कर देते हैं, तो उन्हें ना सिर्फ भारत से तारीफ मिलेगी. बल्कि पूरी दुनिया उनका सम्मान करेगी. और वो अपना कद पाकिस्तानी सेना के सामने बढ़ा लेंगे. लेकिन 
लेकिन एक बार फिर वही सवाल आएगा, कि क्या पाकिस्तान की सेना उन्हें ऐसा करने देगी ? 

भारत के लिए ICJ का फैसला एक कूटनीतिक और क़ानूनी जीत है. 

ICJ ने भारत के पक्ष को पूरी तरह सही माना

भारत के Consular Access अधिकार को ऊपर रखा 

पाकिस्तान की न्यायिक प्रक्रिया में खामी की बात कही 

ICJ ने पाकिस्तान को कहा- फैसले की समीक्षा करें 

जाधव केस में पाकिस्तान ने Vienna Convention का उल्लंघन किया

पाकिस्तान में सरकार और न्यायिक प्रक्रिया में सेना की भूमिका पर सवाल उठाए

और जाधव की फांसी की सज़ा पर रोक लगाने का दिया आदेश

लेकिन भारत की चिंताएं अभी ख़त्म नहीं हुई है.
 
अगर पाकिस्तान इस फैसले को स्वीकार कर लेता है. तो इसका मतलब ये होगा कि पाकिस्तान में दोबारा इस केस की सुनवाई
होगी. हालांकि, ICJ ने अपने फैसले में पाकिस्तान को ये अधिकार दिया है, कि वो अपनी मर्ज़ी की अदालत में कमांडर जाधव की सुनवाई कर सकता है. और इस बात की भी आशंका है, कि पाकिस्तान एक बार फिर इस मामले को सैन्य अदालत में लेकर जाए. ना कि किसी Civilian Court में.

एक तथ्य ये भी है, कि पाकिस्तान में सिर्फ सैन्य अदालतें ही नहीं, बल्कि ज़्यादातर अदालतें Compromised हैं. कुछ दिन पहले ही नवाज़ शरीफ की बेटी मरियम नवाज़ ने एक वीडियो जारी किया था. जिसमें एक जज ने दावा किया था, कि नवाज़ शरीफ को सज़ा दिलाने के लिए उसपर दवाब बनाया गया. और उसे ब्लैकमेल किया गया. 

इसीलिए हम कह रहे हैं, कि पाकिस्तान में न्याय नाम की कोई चीज़ नहीं है. उसके DNA में न्याय नहीं अन्याय है. 
वहां की सारी अदालतें Fixed हैं. सेना ही एक प्रकार से सबकुछ कंट्रोल करती है. वहां की सैन्य अदालत ने 2015 से 2018 के बीच 186 लोगों को फांसी की सज़ा सुना दी. 

यानी किसी की हत्या को अगर आपको वाजिब ठहराना है, तो पाकिस्तान में ये काम अदालत करती है. हत्यारों को क्लीन चिट देना और बेगुनाहों को सज़ा देना पाकिस्तान की अदालतों का परम कर्तव्य बन गया है. इसीलिए हमें डर है, कि कहीं कमांडर जाधव के साथ भी कोई अनहोनी ना हो जाए. 

भारत के लिए चिंता की एक और बात ये है, कि सुनवाई के नाम पर पाकिस्तान कमांडर जाधव को लम्बे समय तक जेल में बंद करके यातनाएं दे सकता है. 

जेल में रहने के दौरान सरबजीत की ही तरह कमांडर जाधव की हत्या हो सकती है.

ICJ ने अपने फैसले में कहीं भी ये नहीं कहा है, कि पाकिस्तान उसे इस बात की गारंटी दे, कि कमांडर जाधव को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा. 

ICJ के फैसले में सबसे बड़ी बात ये निकलकर आई है, कि पाकिस्तान की सैन्य अदालत द्वारा लिए गए फैसले को खारिज कर दिया गया. और पाकिस्तान का चरित्र भी दुनिया को पता चल गया. अब ये देखिए, कि पाकिस्तान की सैन्य अदालतों को Killing Machine क्यों कहा जाता है. 

पाकिस्तान में सैन्य अदालतें बिल्कुल भी पारदर्शी नहीं हैं. और इसे सिर्फ पाकिस्तानी सेना के एजेंडे पर क़ानूनी मुहर लगाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

सैन्य अदालतों द्वारा लिये गए फैसले के खिलाफ वहां की अन्य अदालतों में अपील नहीं की जा सकती.

पाकिस्तान में सैन्य अदालतों के जजों के पास कानून की ट्रेनिंग होना अनिवार्य नहीं है. और वो सेना से ही जुड़े होते हैं. 

जून 2017 को यूरोप की संसद ने पाकिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघन और मौत की सज़ा के मामले में एक प्रस्ताव पास किया था . 
जिसमें कहा गया था, कि पाकिस्तान की सैन्य अदालतें गोपनीय तरीके से मामलों की सुनवाई करती हैं. और बिना पुख्ता सबूतों के आधार पर फांसी की सज़ा भी सुना दी जाती है.

पिछले कुछ वर्षों में वहां की सैन्य अदालतें 186 लोगों को मौत की सज़ा सुना चुकी है. 

भारत के मशहूर कवि और Nobel पुरस्कार विजेता रबिंद्रनाथ टैगोर कहा करते थे, कि तथ्य कई होते हैं, परन्तु सच सिर्फ एक होता है. आज का सच यही है, कि भारत ने सिर्फ 1 रुपया खर्च करके, पाकिस्तान को उसकी हैसियत दिखा दी है. International Court Of Justice में कुलभूषण जाधव का पक्ष रखने वाले वकील हरीश साल्वे ने, केस की सुनवाई के लिए सिर्फ 1 रुपये की फीस ली थी. और आज जैसे ही ICJ ने भारत के पक्ष में फैसला सुनाया, उसी वक्त ये तय हो गया, कि पाकिस्तान को हराने के लिए सिर्फ एक रुपये का भारतीय सिक्का ही काफ़ी है. 

पाकिस्तान ने 25 मार्च 2016 को कमांडर जाधव की गिरफ्तारी से जुड़ी ख़बर भारत को दी.

और उसी दिन से भारत ने कूटनीतिक तरीकों से पाकिस्तान पर दबाव बनाना शुरु कर दिया. इस मामले में विदेश मंत्रालय ने काफी आक्रामक रुख अपनाया. और कमांडर जाधव को Consular Access देने और उनकी रिहाई के लिए कई बार पाकिस्तान को सूचित किया. 

भारत ने समझदारी दिखाते हुए बिना किसी देरी के मई 2017 में इस मामले को ICJ में उठा दिया. और उसके लिए हरीश साल्वे के नेतृत्व में एक मज़बूत टीम बनाई गई. 

इसी के बाद दिसम्बर 2017 में पाकिस्तान को दबाव में झुकना पड़ा. और कमांडर जाधव के परिवार को उनसे मिलने की इजाज़त देनी पड़ी. 

भारत ने शुरुआत से ICJ में कहा, कि पाकिस्तान एक ग़ैर ज़िम्मेदार देश है. और उसने समय-समय पर अंतर्राष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन किया है.

भारत ने पाकिस्तान की सैन्य अदालत में हुए Trial को हास्यास्पद बताया. 

भारत का Stand ये था, कि कुलभूषण जाधव का इस्तेमाल करके पाकिस्तान, बलोचिस्तान की समस्याओं के लिए भारत को दोषी ठहराना चाहता था. 

ICJ में भारत की दलील थी, कि पाकिस्तान ने सिर्फ Propaganda नहीं चलाया. बल्कि भारत के खिलाफ जाधव मामले का असफल इस्तेमाल किया.

अदालत में भारत ने ये भी कहा, कि पाकिस्तान ने आम नागरिकों का ट्राएल मिलिट्री कोर्ट में कराया. लेकिन, मुंबई में हुए आतंकवादी हमलों के लिए ज़िम्मेदार आतंकवादियों को अभी तक सज़ा नहीं मिली.

आज सबसे बड़ा सवाल ये भी है, कि क्या पाकिस्तान, कमांडर कुलभूषण जाधव की मां और उनकी पत्नी के साथ हुई बदसलूकी के लिए माफी मांगेगा ?

दिसम्बर 2017 की वो तस्वीरें याद कीजिए. जब पाकिस्तान ने मानवीय आधार पर कमांडर जाधव की मां और पत्नी से मुलाकात की इजाज़त दी थी. ये मुलाकात इस्लामाबाद में पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय में हुई थी. लेकिन उस दौरान पाकिस्तान की सरकार और वहां के मीडिया ने शालीनता की सारी सीमाएं लांघ दी थीं.

मानवीय आधार पर एक मां को अपने बेटे से और एक पत्नी को अपने पति से सीधे तौर पर नहीं मिलने दिया गया. वो आमने-सामने ज़रुर बैठे थे, लेकिन उनके बीच में शीशे की दीवार थी. 

जिस वक्त ये मुलाकात चल रही थी...उस वक्त बंद कमरे में Video Recording भी की जा रही थी.

पाकिस्तान ने जानबूझकर, एक दुखी मां और पीड़ित पत्नी की संवेदनाओं से खिलवाड़ किया था. और उन पर एक तरह का मनोवैज्ञानिक दबाव डाला था.

जब, कमांडर जाधव की पत्नी पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के Office के अंदर जा रही थीं...उस वक्त उन्होंने जूते पहने हुए थे.

लेकिन, कुलभूषण जाधव से मुलाकात से ठीक पहले, उन दोनों से ज़बरदस्ती चूड़ी और मंगलसूत्र उतरवा लिए गए. उन्हें बिन्दी हटाने के लिए कहा गया. और जब इससे भी मन नहीं भरा, तो पाकिस्तानी अधिकारियों ने उनकी पत्नी के जूते भी उतरवा लिए. 

पाकिस्तान ने शालीनता की तमाम सीमाएं पार करते हुए, मुलाकात ख़त्म होने के बाद कुलभषण जाधव की पत्नी को उनके जूते वापस देने से इनकार कर दिया. और मजबूरी में उन्हें चप्पल पहनकर बाहर आना पड़ा. 

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के Office पहुंचने से लेकर बाहर निकलने तक, और फिर Airport तक दोनों का Media Trial भी किया गया.

जब ये दोनों, कुलभूषण से मुलाकात के लिए पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के ऑफिस पहुंचे थे . कुलभूषण की मां और पत्नी ने हाथ जोड़कर, वहां मौजूद पाकिस्तान के Media का अभिवादन किया. लेकिन, पाकिस्तान की सरकार ने वहां के स्थानीय मीडिया के साथ शायद Fixing कर ली थी. वहां का मीडिया पूरी तरह तैयार होकर आया था. इसीलिए, जैसे ही कुलभूषण की मां और पत्नी अंदर जाने लगीं...उनसे चुभने वाले सवाल पूछे गए. बाहर निकलने के बाद उन दोनों को पूरे 2 मिनट तक गाड़ी का इंतज़ार करवाया गया. कमांडर जाधव की मां से पूछा गया...कि एक आतंकवादी की मां होकर उन्हें कैसा लगता है ? उन दोनों के सामने पाकिस्तान ज़िन्दाबाद की नारेबाज़ी की गई. और ये सबकुछ एक सोची-समझी रणनीति के तहत किया गया. ताकि उन दोनों को मानसिक तौर पर परेशान किया जाए. आज उन तस्वीरों को एक बार फिर याद करने की ज़रुरत है.

अब ये देखिए, कि पाकिस्तान की सैन्य अदालतों को Killing Machine क्यों कहा जाता है. 

15 जून 2017 को यूरोप की संसद ने पाकिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघन और मौत की सज़ा के मामले में एक प्रस्ताव पास किया था . 

जिसमें कहा गया था, कि पाकिस्तान की सैन्य अदालतें गोपनीय तरीके से मामलों की सुनवाई करती हैं.

इस प्रस्ताव में कुलभूषण यादव का भी जिक्र था. जिन्हें लेकर कहा गया था कि कुलभूषण जाधव जो कि एक भारतीय नागरिक हैं उन्हें Consular Access नहीं दी गई.

इस प्रस्ताव में ये भी कहा गया था कि पाकिस्तान में गोपनीय अदालती कार्रवाई के तहत 274 नागरिकों को सज़ा सुनाई गई है और इनमें से 161 लोगों को फांसी की सज़ा मिली है .

इसी साल जनवरी में International Commission of Jurists ने भी एक रिपोर्ट जारी की थी और कहा था कि पाकिस्तान में सैन्य अदालतों का गलत इस्तेमाल होता है.

पाकिस्तान में 2015 में 11 सैन्य अदालतों का गठन किया गया था . इन अदालतों में 646 लोगों पर केस चलाए गए. जिनमें से 641 लोगों को सज़ा सुनाई गई .

इनमें से 345 लोगों को मौत की सज़ा मिली और 56 लोगों को फांसी के फंदे पर लटका भी दिया गया.

पिछले साल पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने भी माना था, कि 2015 के बाद से सैन्य अदालतों ने 186 लोगों को मौत की सज़ा
सुनाई है. यानी पाकिस्तान की सैन्य अदालतें Killing Machine बन गई हैं. जो सेना और सरकार के इशारे पर लोगों को मौत की सज़ा सुना रही है.