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ZEE जानकारी: कश्मीर पर पर हार मान चुके पाकिस्तान के चाहने वाले हो रहे हैं बेचैन

असली खतरा देश के भीतर ही मौजूद है, और आपको खतरे के इन संकेतों को पहचान लेना चाहिए .

ZEE जानकारी: कश्मीर पर पर हार मान चुके पाकिस्तान के चाहने वाले हो रहे हैं बेचैन

आज सबसे पहले हम आपको भारत में पैदा हुए एक बड़े खतरे के संकेत से अवगत कराएंगे . हम कश्मीर के मुद्दे पर 'पाकिस्तान की पराजय' का विश्लेषण करेंगे. पाकिस्तान ने 72 वर्षों में पहली बार स्वीकार किया है, कि कश्मीर के मुद्दे पर वो अकेला पड़ चुका है. और दुनिया का कोई भी देश, ना तो उसकी बात सुन रहा है. और ना ही उसका साथ देने के लिए तैयार है. 

पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी कल पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर की राजधानी मुज़्ज़फराबाद में थे. वहां उन्होंने भारी मन से कहा कि कश्मीर के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में समर्थन मिलना मुश्किल है. और पाकिस्तान के लोगों को FOOLS PARADISE यानी मूर्खों के स्वर्ग में नहीं रहना चाहिए. संयुक्त राष्ट्र का ज़िक्र करते हुए उन्होंने ये भी कहा, कि कश्मीर के मसले को अच्छी तरह समझकर आगे ले जाना, बहुत पेचीदा काम है . और दुनिया की सबसे बड़ी संस्था में बैठे देश, पाकिस्तान के स्वागत के लिए फूल-मालाएं लेकर नहीं खड़े हैं. 

शाह महमूद कुरैशी को इस बात से भी परेशानी हो रही है, कि कई इस्लामिक देश भी इस वक्त उसके साथ नहीं, बल्कि भारत के साथ खड़े हैं. ये एक बहुत बड़ी टिप्पणी है. क्योंकि, पाकिस्तान की विदेश नीति चलाने वाला व्यक्ति, अगर कश्मीर के विषय पर खुद को इतना असहाय बता रहा है. तो समझ लीजिए, उसने और उसके देश ने अपनी हार स्वीकार कर ली है. 

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद से पाकिस्तान की बेचैनी बढ़ी हुई है. 

पहले उसने इस मामले को संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद में उठाया. लेकिन सुरक्षा परिषद ने पाकिस्तान के विदेश मंत्री द्वारा लिखी गई चिट्ठी को गंभीरता से नहीं लिया. और कोई भी टिप्पणी करने से इंकार कर दिया.

अगस्त 2019 के लिए सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी Poland के पास है. और कश्मीर के मुद्दे पर Poland का समर्थन हासिल करने के लिए शाह महमूद कुरैशी ने वहां के विदेश मंत्री से बात भी की. 

लेकिन, Poland ने पाकिस्तान को द्विपक्षीय तरीके से हल निकालने की नसीहत दी है. और कहा है, कि किसी भी विवाद का समाधान बातचीत से निकलना चाहिए.

यानी Poland ने वही बात कही है, जो भारत कहता है. भारत भी कश्मीर को द्विपक्षीय मामला मानता है. जबकि पाकिस्तान इसमें अंतरराष्ट्रीय दख़ल का प्रयास करता रहा है. और आज भी कर रहा है. लेकिन अब दुनिया को भी कश्मीर के 'सत्य' और उसे लेकर पाकिस्तान द्वारा फैलाए जा रहे 'असत्य' का ज्ञान हो चुका है. 

Poland ने भारत का साथ दिया और इसे द्विपक्षीय मामला बताया.

सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य Russia ने कहा, कि भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश बनाने का फैसला भारत के संविधान के दायरे में किया. 

संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी पाकिस्तान को संयम बरतने की सलाह दी.

Maldives, UAE, थाईलैंड और श्रीलंका ने इसे भारत का आंतरिक मामला बताया. 

अमेरिका ने भी कहा है कि उसे इस बात का ध्यान है कि ये भारत का अंदरुनी मामला है. 

सऊदी अरब और मलेशिया जैसे देशों ने इस मामले को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने की अपील की है.

इनमें से ज़्यादातर देशों का रुख देखने के बाद कहा जा सकता है, कि जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर भारत की कुटनीति रंग ला रही है. और दुनिया भारत का साथ दे रही है.

भारत के मित्र देशों ने अपने मन की बात कह दी है. लेकिन पाकिस्तान को अभी भी उम्मीद की एक छोटी सी किरण दिखाई दे रही है. और वो हैं भारत के विपक्षी दल. यानी असली खतरा देश के भीतर ही मौजूद है, और आपको खतरे के इन संकेतों को पहचान लेना चाहिए .

इस वक्त हमारे अपने ही देश में ऐसा माहौल पैदा हो गया है, जिसे देखकर कोई भी यही सोचेगा, कि भारत के विपक्षी दल, पाकिस्तान से कह रहे हैं, कि 'हम हैं ना'. उनकी बातें सुनकर, उनके Tweets देखकर ऐसा लग रहा है, जैसे जम्मू-कश्मीर में हालात बेकाबू हो चुके हैं. एक प्रकार से भारत का विपक्षी दल, पश्चिमी मीडिया और पाकिस्तान के एजेंडे वाली आग में घी डालने का काम कर रहा है. ऐसा लग रहा है, जैसे वो कह रहे हों, कि कहीं से भी जुल्म की तस्वीरों को पाकिस्तान के लिए ढूंढ कर निकालेंगे. वो सुरक्षाबलों की पोल खोलेंगे. सबूत लाकर देंगे. पाकिस्तान का काम करेंगे. और ऐसे बयान देंगे, ताकि पाकिस्तान उसका इस्तेमाल कर सके. डर तो इस बात का है, कि कहीं ऐसा ना हो, एक दिन भारत का ही विपक्ष, संयुक्त राष्ट्र में जाकर कश्मीर का मामला उठा दे. हमें ये कहते हुए बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा. लेकिन कभी-कभी सच्चाई का कड़वा घूंट पीना पड़ता है. 

कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में एक Tweet किया था. जिसमें उन्होंने अपना एक Video अपलोड करते हुए लिखा था, कि वो घाटी में फैली अशांति से असहज महसूस कर रहे हैं. उन्होंने उस तथाकथित हिंसा और लोगों के मारे जाने की ख़बर का भी ज़िक्र किया, जिसे पश्चिमी मीडिया ने किसी एजेंडे के तहत प्रचारित किया. और पाकिस्तान ने उसे हाथों-हाथ ले लिया. अब आप राहुल गांधी की बातें सुनिए. और सोचिए, कि क्या कोई देशभक्त हिन्दुस्तानी इतनी आसानी से पाकिस्तान और पश्चिमी मीडिया के एजेंडे का शिकार हो सकता है ? 

तो क्या हमारा देश ऐसे विभीषणों का देश बन गया है, जो अपना ही घर बर्बाद करने पर तुल गए हैं ? क्या हमारे देश को अब घर के भेदियों से ही खतरा होने लगा है?

पिछले कुछ दिनों में BBC सहित कुछ अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों ने जम्मू-कश्मीर से संबंधित भ्रामक ख़बरें फैलाईं. हिंसक Videos दिखाए.और कहा, कि घाटी में हालात सामान्य नहीं हैं. और राहुल गांधी की बातें सुनने के बाद ऐसा लगता है, कि उन्होंने पश्चिमी मीडिया, ख़ासकर BBC की रिपोर्ट को काफी गंभीरता से लिया है. राहुल गांधी ने अपने Tweet में Media Blackout और Communications Black Out जैसे शब्दों का ज़िक्र किया. घाटी के संदर्भ में कुछ ऐसी ही भ्रामक बातें BBC ने भी फैलाईं. लेकिन राहुल गांधी ने एक मिनट के लिए भी पीछे मुड़कर ऐसी संस्थाओं का इतिहास नहीं देखा.

वर्षों पहले ब्रिटेन की सरकार ने उत्तरी आयरलैंड में मीडिया और नेताओं पर पाबंदी लगा दी थी. 1988 से 1994 के बीच आयरलैंड से संबंधित संस्थाओं और लोगों की आवाज़ दबाने के लिए, ब्रिटेन ने अपने देश के मीडिया पर प्रतिबंध लगा दिया था.
ब्रिटेन के तत्कालीन गृह मंत्री ने इसके लिए बाकायदा आदेश पारित किया था. जिसके तहत ब्रिटेन की सरकार जिन लोगों को आतंकवादियों की श्रेणी में रखती थी, उनके TV या Radio, Interviews या बयानों पर रोक लगा दी गई थी. लेकिन उस वक्त BBC को अपने देश में कोई खामी नज़र नहीं आई थी. और आज वो भारत को नैतिकता का पाठ पढ़ा रहा है.

विडंबना देखिए, BBC जैसी संस्था, जम्मू-कश्मीर के लिए ‘Indian Occupied Kashmir’ जैसे शब्दों का प्रयोग करती है. और पश्चिमी मीडिया की भ्रामक रिपोर्ट्स को आधार बनाकर हमारे देश के नेता अपनी राजनीति करते हैं. वैसे, राहुल गांधी ने जिस हिंसा का ज़िक्र किया, उसपर जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है. और ऐसी ख़बरों को असत्य बताया है.

सत्यपाल मलिक के बयान के बाद आज राहुल गांधी ने एक और Tweet किया. और कहा, कि वो विपक्षी नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जाने के लिए तैयार हैं. इसके लिए उन्हें कोई विमान नहीं चाहिए. अपने Tweet में उन्होंने सत्यपाल मलिक से निवेदन करते हुए ये भी लिखा, कि उन्हें बस इतनी आज़ादी मिल जाए, ताकि वो घाटी के लोगों से, मुख्यधारा के नेताओं से और देश के सैनिकों से मिल सकें. 

राहुल गांधी ने अपने Tweet में शाब्दिक चालाकी का इस्तेमाल करते हुए, उसमें आज़ादी शब्द जोड़ दिया. यानी उन्होंने वही काम किया, जिसकी अपेक्षा पाकिस्तान जैसे देश को रहती है. 

इस बीच जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है. और कहा है, कि घाटी में नेताओं का प्रतिनिधिमंडल लाने की बात कहकर, राहुल गांधी ने मामले का राजनीतिकरण करने की कोशिश की है. इससे घाटी के लोगों को परेशानी हो सकती है. राहुल गांधी ने अपने Tweet में शर्तों के साथ लोगों से मिलने की इच्छा जताई. लेकिन, प्रशासन का कहना है, कि राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने कभी भी पहले से तय की गई शर्तों के आधार पर राहुल गांधी को निमंत्रण नहीं भेजा था. इस बीच आज सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट कर दिया है, कि अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद वहां की मौजूदा स्थिति को लेकर सुप्रीम कोर्ट दखल नहीं देगा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, कि सरकार को हालात सामान्य करने के लिए और वक्त दिया जाना चाहिए. क्योंकि, जम्मू-कश्मीर का मामला बेहद संवेदनशील है.

जम्मू-कश्मीर पर हो रही राजनीति में अब राहुल गांधी की बहन और कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा का भी प्रवेश हो गया है. और उन्होंने भी वही बात कही है, जो पाकिस्तान जैसा देश सुनना चाहता है. जम्मू-कश्मीर के विषय पर उनकी प्रतिक्रिया ये है, कि भारत सरकार का फैसला पूरी तरह असंवैधानिक है. और लोकतंत्र के मूल्यों के खिलाफ है.

राहुल गांधी चाहते हैं, कि वो जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में जहां चाहें, वहां घूम सकें. जिनसे चाहें, उनसे बात कर सकें. जिनसे चाहें उनसे मिल सकें. इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन हमारा सवाल ये है, कि वहां जाने से पहले इतनी भूमिका बांधने की क्या ज़रुरत है ? जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है. और देश का हर नागरिक वहां कभी भी, किसी भी वक्त जा सकता है. बस इसमें राजनीति नहीं होनी चाहिए. लेकिन दुख की बात ये है, कि ऐसा हो रहा है. और पाकिस्तान को ये सबकुछ काफी अच्छा लग रहा है. क्या आपने कभी इसकी वजह समझने की कोशिश की है. अगर नहीं, तो आज आपको नवाज़ शरीफ की पार्टी के एक बड़े नेता Mushahid Hussain की ये बातें बहुत ध्यान से सुननी चाहिएं. दो दिन पहले वो पाकिस्तान के एक News Channel पर बतौर मेहमान बैठे हुए थे. और उस वक्त उन्होंने एक-एक करके, भारत में मौजूद पाकिस्तान के मित्रों का नाम लिया था.

Mushahid Hussain ने अपनी बात में अंग्रेज़ी के एक शब्द का प्रयोग किया. वो शब्द था...Sympathizer...हिन्दी में इसका मतलब होता है, सहानुभूति रखने वाला. और इसके बाद उन्होंने एक-एक करके भारत में मौजूद पाकिस्तान के तथाकथित समर्थकों के नाम ले लिए. अगर आप Mushahid Hussain के शब्दों को Decode करेंगे तो आपको अंदाज़ा हो जाएगा कि देश को असली खतरा किन लोगों से है .

पाकिस्तानी सांसद ने जो नाम लिए उनमें अरुंधति रॉय हैं...ममता बनर्जी हैं. कांग्रेस पार्टी है. कम्यूनिस्ट पार्टी है. लेफ्ट Parties हैं. दलित Parties हैं. और इसीलिए हमने विश्लेषण की शुरुआत में कहा था, कि जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर पराजित हो चुके पाकिस्तान को अभी भी उम्मीद है. कि भारत में मौजूद उसके प्रसंशक उसके हिस्से का काम करते रहेंगे. और पाकिस्तान के पक्ष में एजेंडा चलाते रहेंगे. 

जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान सुरक्षा परिषद तो चला गया. लेकिन वो ये भूल गया, कि खुद पाकिस्तानी नागरिक ही दुनिया के सबसे बड़े मंच पर पाकिस्तान की हरकतों से हताश और निराश हो गए हैं. और अपने प्रतिनिधियों को भला-बुरा कह रहे हैं. पाकिस्तान के प्रति अपनी सहानुभूति प्रकट करनेवाले भारतीयों को आज संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की राजदूत मलीहा लोधी का ये Video बहुत ध्यान से देखना चाहिए.