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ZEE जानकारी: कोलकाता में डॉक्टरों पर हमले के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन

आज डॉक्टरों और लोगों के बीच भरोसा टूट चुका है . 

ZEE जानकारी: कोलकाता में डॉक्टरों पर हमले के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन

बीमारों का इलाज करना भारत में कभी भी कोई बिज़नेस नहीं था. भारत में मरीज़ों के इलाज को पेशा नहीं बल्कि सेवा माना गया. लेकिन आधुनिक भारत में ये एक बिज़नेस बन गया. आज भारत में गरीबों के लिए सरकारी अस्पताल हैं और अमीरों के लिए Five Star Hospitals. पैसा... अब मरीज़ की जान से भी बड़ा हो चुका है.

भारत की भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था को भी इससे लाभ होता है. भारत के मेडिकल सिस्टम की बीमारी की मूल वजह भी यही है. आज डॉक्टरों और लोगों के बीच भरोसा टूट चुका है . कभी लोग डॉक्टर को धरती पर भगवान का रूप मानते थे. लेकिन आजकल मरीज़, डॉक्टरों की पिटाई करने लगे हैं.

पश्चिम बंगाल में इस हफ्ते ऐसी ही एक घटना हुई जिसके बाद पूरे देश में डॉक्टरों की हड़ताल का दौर शुरू हो गया है. देश में इलाज आज भी बहुत महंगा है ? नई-नई सरकारी स्वास्थ्य योजनाएं भी बीमार सिस्टम को ठीक नहीं कर पा रही हैं. आज हम भारत के बीमार Medical System का एक DNA टेस्ट करेंगे . लेकिन सबसे पहले ये जानते हैं कि पश्चिम बंगाल के डॉक्टरों का गुस्सा अब पूरे देश के डॉक्टरों में क्यों फैलता जा रहा है. 

इसी हफ्ते सोमवार को कोलकाता के एक अस्पताल में गंभीर रूप से बीमार 80 वर्ष के एक बुजुर्ग की मौत हो गई . बुजुर्ग के परिवार वालों ने दो जूनियर डॉक्टरों की पिटाई कर दी. इसमें एक डॉक्टर को गंभीर चोटें आईँ. पुलिस ने भी जूनियर डॉक्टरों की कोई मदद नहीं की. नाराज़ जूनियर डॉक्टर सोमवार की रात को ही काम बंद करके विरोध प्रदर्शन करने लगे. ये डॉक्टर ममता बनर्जी की सरकार से सुरक्षा की मांग कर रहे थे.

पुलिस ने भी आरोपियों पर कोई कार्रवाई नहीं की. तीन दिनों तक ममता बनर्जी ने इस विरोध को नज़र अंदाज़ किया. लेकिन जब कुछ और सरकारी अस्पतालों के जूनियर डॉक्टर भी हड़ताल पर चले गए, तब ममता बनर्जी को लगा कि अब स्थिति गंभीर हो रही है. लेकिन उन्होंने जूनियर डॉक्टरों को सुरक्षा का कोई भरोसा नहीं दिलाया. बल्कि उनको अल्टीमेटम दिया कि 2 घंटे में काम पर लौटें, वरना जूनियर डॉक्टरों को हॉस्टल से बाहर निकाल दिया जाएगा. 

ममता बनर्जी ने विरोध प्रदर्शन करने वालों को बाहरी और बीजेपी का एजेंट बताया. मुख्यमंत्री के इन बयानों से डॉक्टरों का गुस्सा और बढ़ गया. अब तक पश्चिम बंगाल में 400 से ज़्यादा सरकारी डॉक्टर इस्तीफ़ा दे चुके हैं. पश्चिम बंगाल में कुल 14 मेडिकल कॉलेज हैं. इन सभी के जूनियर डॉक्टर हड़ताल पर चले गए हैं. राज्य में कुल 4 हजार जूनियर डॉक्टर 4 दिनों से हड़ताल पर हैं . ज्यादातर सरकारी अस्पतालों के Emergency Department में अब मरीजों की भर्ती नहीं की जा रही है . इसका सबसे ज्यादा असर गरीब लोगों पर पड़ा है .

ममता बनर्जी अगर चाहतीं तो जूनियर डॉक्टरों को सुरक्षा का भरोसा दिलाकर मामले को शांत कर सकती थीं. लेकिन उनके आक्रामक बयानों ने हालात और बिगाड़ दिए . अब उन्होंने इसे राजनीतिक बना दिया है और उनका आरोप है कि डॉक्टरों की हड़ताल में बीजेपी का हाथ है.

Indian Medical Association ने आज से तीन दिनों का विरोध प्रदर्शन शुरू किया है. IMA ने 17 जून को पूरे देश में डॉक्टरों की हड़ताल बुलाई है. देश के 10 राज्यों में डॉक्टरों का विरोध प्रदर्शन जारी है .

पश्चिम बंगाल के डॉक्टरों के समर्थन में दिल्ली, उत्तर प्रदेश, गोवा, ओडिशा, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़, राजस्थान और चंडीगढ़ में डॉक्टरों ने प्रदर्शन किया है. महाराष्ट्र के 4 हजार 500 Doctors ने एक भी आज एक दिन की हड़ताल की.

दिल्ली के भी कई बड़े अस्पतालों में आज हड़ताल थी. दिल्ली के All India Institute of Medical Sciences यानी AIIMS में कुछ डॉक्टर हेलमेट पहनकर मरीजों का इलाज कर रहे हैं. और कुछ डॉक्टरों ने सिर पर पट्टी बांधकर विरोध प्रदर्शन किया .

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री Doctor हर्षवर्धन ने आज ममता बनर्जी को एक चिट्ठी लिखी है. उन्होंने ममता बनर्जी से कहा है कि डॉक्टर समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं, उनको पूरी सुरक्षा मिलनी चाहिए. नाराज़ डॉक्टरों से बात करके स्थिति को सुलझाया जा सकता है . 

Calcutta High Court ने भी आज ममता सरकार को निर्देश दिया है कि वो 7 दिनों में बताएं कि समस्या को हल करने के लिए क्या-क्या कदम उठाए गए ?
ममता बनर्जी अब भी जूनियर डॉक्टरों से नहीं मिली हैं. लेकिन पश्चिम बंगाल के गवर्नर केशरी नाथ त्रिपाठी ने घायल जूनियर डॉक्टर से मुलाकात की है . उऩ्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को मुलाकात के लिए बुलाया है . राज्यपाल ने आज एक बयान में कहा कि उन्होंने ममता बनर्जी को फोन भी किया था. लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया . 

हड़ताल को लेकर ममता बनर्जी के तेवर अब नरम पड़ते नज़र आ रहे हैं . ममता बनर्जी सीनियर डॉक्टरों से मुलाकात कर रही हैं . और उन्होंने 4 जूनियर डॉक्टरों को भी मिलने के लिए संदेश भेजा है . लेकिन जूनियर डॉक्टरों ने कहा है कि वो उनसे मिलने नहीं जाएंगे . ऐसा लगता है कि ये लड़ाई मरीजों को बचाने की नहीं बल्कि अपने-अपने अहंकार की है. 

भारत की आबादी 135 करोड़ है. इसलिये हमारे यहां डॉक्टरों की तादाद भी लाखों में होनी चाहिये.

भारत में क़रीब 11 लाख Allopathic डॉक्टर हैं..जबकि आयुर्वेद के क़रीब 8 लाख डॉक्टर हैं.
WHO यानी विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के हिसाब से एक हज़ार लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिये...जबकि भारत में एक हज़ार 472 लोगों पर एक डॉक्टर है. यानी वो अंतरराष्ट्रीय मानकों से 50 प्रतिशत ज़्यादा काम कर रहे हैं.
भारत में 476 मेडिकल कॉलेज हैं और 560 Dental कॉलेज हैं. इनमें मेडिकल कॉलेज में 52 हज़ार 600 सीट हैं...जबकि Dental College में 33 हज़ार 300 सीट हैं. इसके मायने हैं कि भारत को हर साल क़रीब 50 हज़ार नये डॉक्टर मिलते हैं. 
हालांकि इस साल सरकार ने 25 नये मेडिकल कॉलेज खोलकर सीट दो हज़ार 750 तक बढ़ा दी है.
लेकिन भारत की ज़रूरत बहुत ज़्यादा है. एक स्टडी के मुताबिक़ आबादी के लिहाज़ से भारत में क़रीब 6 लाख डॉक्टरों की कमी है. जबकि भारत को 20 लाख से ज़्यादा नर्सिंग स्टाफ़ चाहिये.

WHO की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में 57 प्रतिशत ऐसे डॉक्टर हैं जिनके पास ज़रूरी डिग्री तक नहीं है.

लेकिन वो इलाज कर रहे हैं. आम भाषा में हम इन्हें झोलाछाप भी कहते हैं. हालांकि 1990 के बाद से Medical व्यवस्था के मामले में भारत में काफ़ी सुधार हुआ है. फिर भी हालात दयनीय बने हुए हैं.

एक स्टडी के मुताबिक़ वर्ष 2016 में सही इलाज ना मिलने की वजह से हर साल क़रीब 15 लाख लोगों की मौत हुई थी. 

जबकि हर साल क़रीब 25 लाख लोगों की मौत ऐसी बीमारियों की वजह से हो जाती है...जिनका इलाज मौजूद है. 
यही वजह है कि भारत में स्वास्थ्य व्यवस्था की बहुत बुरी हालत है. 195 देशों की रैंकिंग में भारत 145वें नंबर पर है. इस मायने में चीन, बांग्लादेश, श्रीलंका और भूटान जैसे

देश भी हमसे आगे हैं. भारत में साढ़े 23 हज़ार सरकारी अस्पताल हैं और इनमें क़रीब 7 लाख 11 हज़ार Bed मरीज़ों के लिए हैं. यानी अगर भारत की आबादी के अनुपात में देखा जाये...तो 1900 लोगों के लिये एक ही bed की व्यवस्था है. स्वास्थ्य पर भारत में GDP का सिर्फ़ 1.4 प्रतिशत हिस्सा ही ख़र्च किया जाता है. श्रीलंका स्वास्थ्य पर

भारत से चार गुना ज़्यादा ख़र्च करता है. जबकि इंडोनेशिया का स्वास्थ्य बजट GDP के 3 प्रतिशत से भी ज़्यादा है.
भारत में सरकार हर व्यक्ति पर एक साल में 1100 रुपये ख़र्च करती है. देखा जाये तो इतनी फीस को प्राइवेट अस्पताल के डॉक्टर एक बार में मरीज़ को देखने में ले लेते हैं. 

  • कोलकाता में डॉक्टरों पर हमले के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन

आज डॉक्टरों के प्रदर्शन...और उनकी हड़ताल की ख़बरें देखकर लग रहा होगा कि भारत में ये परेशानी इतनी ज़्यादा क्यों है. Indian Medical Association के मुताबिक़ देश में 80 प्रतिशत डॉक्टरों ने काम के दौरान मरीज़ या उसके तीमारदारों से कुछ हद तक आक्रामक रवैये का सामना किया है. वैसे भारत अकेला नहीं जहां डॉक्टरों से मारपीट होती है.

अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों में भी ऐसे केस होते हैं. चीन में भी ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं जब डॉक्टरों को मरीज़ के रिश्तेदारों ने पीटा हो.
अमेरिका में साढ़े तीन हज़ार डॉक्टरों पर हुए एक सर्वे में पता चला है कि उनमें से आधे डॉक्टरों से काम के दौरान मारपीट हो चुकी है.
चीन में 10 प्रांतों में भी डॉक्टरों को लेकर एक सर्वे हुआ था..जिसमें 50 प्रतिशत से ज़्यादा डॉक्टरों के साथ अभद्रता हुई और एक तिहाई के साथ मारपीट की गई.

अब सवाल है कि इन देशों ने डॉक्टरों के ख़िलाफ़ हिंसा को लेकर क्या क़दम उठाये हैं?

अमेरिका के 50 राज्यों में से 30 राज्यों ने ऐसे क़ानून बनाये हैं जो डॉक्टरों के ख़िलाफ़ हिंसा को बड़ा अपराध मानते हैं. इसके लिये सख़्त सज़ा भी हैं. इसे रोकने के लिये अमेरिका के अस्पतालों में सुरक्षाकर्मियों, CCTV कैमरा लगाये जाने के सुझाव दिये गये हैं. ब्रिटेन में तो कुछ अस्पताल ऐसे हैं जहां स्टाफ को ऐसे हालात से निपटने की ख़ास ट्रेनिंग दी जाती है. अगर मरीज़ या उनके रिश्तेदार डॉक्टरों से मारपीट करने के दोषी पाये जाते हैं तो उनका नाम सरकार से मिलने वाली मुफ़्त स्वास्थ्य सुविधाओं की सूची से हटा दिया जाता है.

फिर भी इन देशों में डॉक्टरों के ख़िलाफ़ हिंसा होती हैं. मरीज़ों और उनके परिवार-रिश्तेदारों के गुस्से का सामना अक्सर वहां के डॉक्टरों को करना पड़ता है. और इसके बाद अपनी सुरक्षा को लेकर डॉक्टरों को हड़ताल करनी पड़ती है...जैसा पश्चिम बंगाल में हुआ है.

देश में अस्पताल सरकारी हों या प्राइवेट, डॉक्टरों की सुरक्षा ज़रूर होनी चाहिए. उनके कमरे में सीसीटीवी कैमरे भी लगे होने चाहिए. मारपीट करने वालों के ख़िलाफ़ सख़्त क़ानून बनने चाहिए. सरकारी अस्पताल हो या प्राइवेट अस्पताल... दोनों ही अस्पतालों में मरीजों और उनके परिवार वालों के साथ अन्याय होता है . सरकारी अस्पतालों में लोग लंबी-लंबी लाइनों से परेशान हैं और प्राइवेट अस्पतालों में इलाज के लिए लाखों रुपए खर्च करने पड़ते हैं . 

सरकारी अस्पतालों में दवा सस्ती ज़रूर मिलती है . लेकिन इस सस्ती दवा के लिए लोगों को घंटों तक लाइनों में खड़ा होना पड़ता है . प्राइवेट अस्पतालों में लाइनें नहीं हैं लेकिन वहां दवा कंपनियां लोगों से सैकड़ों गुना का मुनाफा लूटती हैं . 

आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि आज भी हमारे देश में दवाओं की कीमत पर किसी का नियंत्रण नहीं है .दवा बनाने वाली कंपनी जितना चाहे दाम तय कर सकती है और बेच सकती हैं .

Health Sector पर सरकार का नियंत्रण 20 प्रतिशत से भी कम है . देश में बड़े नेताओं और उद्योगपतियों के बड़े बड़े अस्पताल हैं . यही लोग देश के 80 Per cent Health Sector को Control कर रहे हैं . 

देश में इलाज की 70 प्रतिशत जिम्मेदारी प्राइवेट अस्पतालों पर हैं . प्राइवेट अस्पताल इसका लाभ उठाते हैं .इन अस्पतालों में Bed का Rate और Operation का खर्चा, सब कुछ अस्पताल के मैनेजमेंट पर निर्भर करता है. इस पूरी व्यवस्था में बोझ बढ़ता है देश के आम लोगों पर. ऐसा लगता है कि अस्पतालों को अब Health Shop कहना चाहिए, जहां भारी कीमत चुकाकर अच्छी सेहत खरीदी जाती है.

हमारे देश में... इलाज शुरु होने पर लोग डॉक्टर्स को.. डॉक्टर साहब कहते हैं . और इलाज में कमी रहने पर लोग डॉक्टरों की पिटाई भी कर देते हैं . 

जब लोग डॉक्टरी के पेशे में आते हैं तब उनका मकसद सेवा होता है . लेकिन लूट की व्यवस्था धीरे-धीरे उनको अपने मन मुताबिक ढाल लेती है . प्राइवेट अस्पतालों में डॉक्टरों के ऊपर भी एक Sales मैनेजमेंट डिपार्टमेंट होता है . जो डॉक्टरों को महंगी दवाइयां बेचने का Target Fix करता है . अस्पताल को ज्यादा से ज्यादा मुनाफे में लाने की जिम्मेदारी डॉक्टरों पर छोड़ दी जाती है . डॉक्टर लूट की इस व्यवस्था का माध्यम बन गए हैं. लेकिन इसका लाभ भी डॉक्टरों को नहीं मैनेजमेंट को मिलता है . 

डॉक्टरों की हालत सबसे ज्यादा खराब सरकारी अस्पतालों में है . इन अस्पतालों में एक डॉक्टर को एक घंटे में 50 मरीज देखने पड़ते हैं . वहीं, प्राइवेट अस्पतालों में एक डॉक्टर को एक घंटे में 10 मरीज देखते हैं . सरकारी अस्पतालों में स्टाफ की कमी है . कई बार Ward Boy और Nurse का काम भी डॉक्टरों को ही करना पड़ता है. 

सरकारी अस्पताल में काम करने वाले एक जूनियर डॉक्टर को Training के नाम पर 48 घंटे से लेकर 72 घंटों तक लगातार काम करना पड़ता है . और इस शोषण के साथ-साथ डॉक्टरों को मरीजों के परिवार वालों की दहशत का भी सामना करना पड़ता है .

भारत में डॉक्टर बनने के लिये क़रीब 5 साल की पढ़ाई होती है. 

यानी MBBS की डिग्री के लिये साढ़े 4 साल लगते हैं और फिर उसके बाद एक साल की इंटर्नशिप होती है.
डॉक्टर की पढ़ाई सरकारी संस्थानों में 50 हज़ार से एक लाख रुपये तक ख़र्च होता है. जबकि एक निजी मेडिकल कॉलेज से पढ़ाई पर पांच साल में 5 लाख से 50 लाख रुपये तक की फ़ीस देनी होती है. स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने जुलाई 2014 में कहा था कि AIIMS जैसे अस्पताल में एक डॉक्टर की ट्रेनिंग पर 8 से 10 करोड़ रुपये ख़र्च किये जाते हैं.

यानी भारत में डॉक्टर बनना आसान नहीं है...इसके लिये बहुत पढ़ाई करनी पड़ती है. सरकार का भी इसमें बहुत योगदान होता है. इसलिये समाज में एक डॉक्टर की इज़्ज़त बहुत ज़रूरी है. चाहे निजी हों या सरकारी अस्पताल डॉक्टरों को सुरक्षा ज़रूर मिलनी चाहिये. हर अस्पताल में जहां डॉक्टर, मरीज़ देखते हैं, वहां CCTV कैमरे लगे होने चाहिये. तभी वो अपना काम पूरे भरोसे से कर पाएंगे. जो लोग डॉक्टरों से मार-पीट करते हैं, उन्हें सज़ा देने के लिए सख़्त क़ानून बनाने की भी ज़रूरत है. लेकिन इस पेशे से जुड़े लोगों को भी ईमानदार रहने की ज़रूरत है. क्योंकि भारत में उन्हें भगवान माना जाता है. मरीज़ों और डॉक्टर का रिश्ता बहुत ही पवित्र माना जाता है. लेकिन अब इसमें मिलावट हो रही है. ये विश्वास दोबारा क़ायम करने की ज़रूरत है. आज हम ख़ास मरीज़ों के लिये भी कुछ ज़रूरी बातें बताना चाहते हैं, जिन पर उन्हें ध्यान देने की ज़रूरत है.

सबसे पहले कि हमें अपनी सेहत का ध्यान रखना चाहिये
एक अच्छी Lifestyle इसलिये बहुत ज़रूरी है.
लेकिन अगर आप बीमार पड़ते हैं तो फ़ौरन डॉक्टर को दिखाइये. इसमें देरी से आपको तो नुक़सान होगा ही, डॉक्टर को भी आपका इलाज करने में वक़्त लगेगा.
डॉक्टर अगर आप को टेस्ट या दवाओं के बारे में बताते हैं, तो उन्हें समय पर करा लें. वरना आपकी बीमारी बढ़ जाएगी. इससे भी आप को ही परेशानी होगी. 
इस बात का भी ख़्याल रखिये कि आपके पास स्वास्थ्य बीमा ज़रूर हो.
ऐसा होने पर आपके ऊपर आर्थिक बोझ कम होगा. आप अपना इलाज किसी भी अस्पताल में अच्छी तरह करा पाएंगे.

ममता बनर्जी ने अपने तानाशाही तेवर से पूरे पश्चिम बंगाल को अस्पताल पहुंचा दिया है...अब वो बांग्ला भाषा का कार्ड खेलकर वोट बैंक की नई सियासत को अंजाम तक पहुंचाना चाहती है...और भाषा के नाम पर लोगों को भड़काना चाहती हैं...ममता दीदी ने कहा है कि बंगाल में रहना है तो बांग्ला बोलना ही पड़ेगा...

आपने ममता बनर्जी को सुन लिया...अब हम आपको एक दिलचस्प जानकारी देते हैं.

2011 की जनगणना के मुताबिक देश में करीब 10 करोड़ लोग बंगाली है...और बांग्ला, भारत की दूसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है. लेकिन ध्यान देने वाली बात ये है, कि बांग्ला बोलने वाला हर पांचवां शख्स पश्चिम बंगाल के बाहर रहता है. यानी करीब दो करोड़ बंगालियों के लिए हर दिन, किसी ना किसी दूसरी भारतीय भाषा को समझने की चुनौती होती है...

ऐसे में सोचने वाली बात ये है, कि अगर उनके साथ भी ममता दीदी वाला फॉर्मूला लागू हो...उन्हें भी जबरन स्थानीय भाषा बोलने के लिए मजबूर किया जाए तो क्या होगा ? लेकिन भारत सरकार की कोशिश हर भारतीय भाषा को आगे बढ़ाने की है. भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने टीवी चैनलों को लेकर नया आदेश जारी किया है. इस आदेश का मकसद भारतीय भाषाओं का प्रचार और प्रसार करना है. सरकार के फैसले के तहत अब सभी चैनलों को अपने Shows के Title भारतीय भाषाओं में भी दिखाने होंगे.