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ZEE जानकारी: कश्मीर पर एक परिवार ने की ख़ता और पीढ़ियों ने पाई सजा

पंडित नेहरू एक आदर्शवादी राजनेता थे . वो पाकिस्तान की चालाकियों को अपने आदर्शवाद से हराना चाहते थे . यहीं वो भूल कर गए . 

ZEE जानकारी: कश्मीर पर एक परिवार ने की ख़ता और पीढ़ियों ने पाई सजा

आज हम आपको ये समझाने की भी कोशिश करेंगे कि जम्मू-कश्मीर और नेहरू गांधी परिवार का क्या रिश्ता रहा है . हम आपको ये भी बताएंगे कि कैसे पंडित नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक हर किसी ने कश्मीर में एक जैसी गलतियां की . 

मशहूर शायर मुज़फ़्फ़र रज़्मी का एक शेर है. 

ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने 
लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई . 

साधारण भाषा में इसका अर्थ है कि किसी क्षण की गई कोई गलती..आपकी आने वाली पीढ़ियों पर भारी पड़ सकती है. ऐसी ही एक गलती भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भी की थी . 

पंडित नेहरू एक आदर्शवादी राजनेता थे . वो पाकिस्तान की चालाकियों को अपने आदर्शवाद से हराना चाहते थे . यहीं वो भूल कर गए . वर्ष 1947 में अक्टूबर के महीने में काबायली जम्मू और कश्मीर में घुस चुके थे . 

28 अक्टूबर 1947 को पंडित नेहरू ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को एक Telegram भेजा .

इस Telegram में पंडित नेहरू ने लियाकत अली को उन शर्तों की जानकारी दी... जिनके तहत कश्मीर भारत में शामिल हुआ था . पंडित नेहरू ने कश्मीर से काबायलियों को भगाने में सहयोग मांगा . उन्होंने कश्मीर में ऐसा माहौल बनाने की अपील की जिसमें जनता की भागीदारी बढ़ सके . पाकिस्तान ने पंडित नेहरू की सद्भावना का जवाब दुर्भावना से दिया . पंडित नेहरू के Telegram के जवाब में पाकिस्तान ने आरोप लगाया कि भारत, जम्मू और कश्मीर पर हमला करके कश्मीर के विलय की तैयारी कर रहा है . 

पाकिस्तान से ना-उम्मीद होने के बाद शांतिप्रिय पंडित नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र संघ का रुख किया . 
एक जनवरी 1948 को UN Security Council में भारत के प्रतिनिधि P P पिल्लई ने जम्मू और कश्मीर पर काबायलियों के हमले का मुद्दा उठाया . उन्होंने कहा कि उरी से सटे इलाकों में भारत की सेना का मुकाबला 19 हजार हमलावरों से हुआ . हमलावरों में काबायली भी शामिल थे . इसके अलावा जम्मू और कश्मीर से सटे पश्चिमी पंजाब यानी पाकिस्तान वाले पंजाब की सीमा से सटे जिलों से भी हमलावर मौजूद थे . इन सभी हमलावरों की संख्या करीब एक लाख थी . 

जब भारत की सेना पूरे जम्मू और कश्मीर को जीतने से थोड़ी ही दूर थी . तभी पंडित नेहरू ने संघर्ष विराम और जनमत संग्रह का ऐलान कर दिया . पंडित नेहरू ने सैन्य, राजनीतिक और अंतर-राष्ट्रीय कारणों से युद्ध विराम की घोषणा कर दी . इस वजह से जम्मू और कश्मीर बंट गया . Line Of Control यानी नियंत्रण रेखा के दोनों तरफ कश्मीर पर दो अलग-अलग देशों का अधिकार हो गया . जो हिस्सा आज पाकिस्तान के पास है उसे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर कहा जाता है .

जम्मू-कश्मीर की समस्या का इतिहास नेहरू-गांधी परिवार और अब्दुल्ला परिवार के इतिहास से जुड़ा है . दोनों परिवारों के राजनीतिक वारिस पीढ़ी दर पीढ़ी कश्मीर की समस्या को उलझाते रहे हैं . पंडित जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के बाद सोनिया गांधी और अब राहुल गांधी भी कश्मीर पर सिर्फ राजनीति कर रहे हैं . 

राजनीति की खातिर जम्मू-कश्मीर को HighJack करने की शुरुआत होती है शेख अब्दुल्ला और पंडित नेहरू की दोस्ती से . 1948 में पंडित नेहरू की मदद से शेख अब्दुल्ला जम्मू और कश्मीर के प्रधानमंत्री बन गए लेकिन जल्द ही ये दोस्ती और भरोसा टूट गया . वर्ष 1953 में पंडित नेहरू के इशारे पर शेख अब्दुल्ला को प्रधानमंत्री पद से हटा दिया गया और जेल में डाल दिया गया .

1948 से 1953 के बीच कश्मीर से जुड़े हुए पंडित नेहरू के हर फैसले पर शेख अब्दुल्ला का प्रभाव था . 

1953 में शेख अब्दुल्ला की जगह बख्शी गुलाम मोहम्मद को प्रधानमंत्री बनाया गया . लेकिन कश्मीर के लोगों ने उन्हें दिल्ली की कठपुतली माना . वर्ष 1957, 1962 और 1967 में जम्मू और कश्मीर में चुनाव हुए लेकिन इन चुनावों में धांधली हुई . इनमें से 1957 और 1962 के चुनाव पंडित नेहरू के प्रधानमंत्री रहते हुए कराए गए . तीसरा चुनाव इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए कराया गया . 

शेख अब्दुल्ला इस दौरान जेल में रहे और कांग्रेस ने चुनाव में धांधली करके सत्ता पर कब्जा जमा लिया . इन घटनाओं से कश्मीर की जनता का भरोसा टूट गया . 

वर्ष 1964 में पंडित नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को रिहा कर दिया . इसके बाद वर्ष 1975 में इंदिरा गांधी और शेख अब्दुल्ला के बीच एक समझौता हुआ .

कांग्रेस पार्टी ने समर्थन करके शेख अब्दुल्ला को राज्य का मुख्यमंत्री बनवा दिया . बिना चुनाव जीते शेख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बन गए . इंदिरा गांधी ने शेख अब्दुल्ला को कश्मीर Gift कर दिया . ये तुष्टीकरण की पराकाष्ठा थी और इंदिरा गांधी की ऐतिहासिक भूल थी . क्योंकि इसके बाद अब्दुल्ला परिवार ने कश्मीर की राजनीति पर कब्जा कर लिया . एक परिवार कश्मीर को अपनी जागीर समझने लगा . 

किसी भी युद्ध को अगर मैदान में जीत लिया जाए...लेकिन मेज़ पर आकर उस विजय का फ़ायदा ना उठाया जाए...तो इसे जीत नहीं...समझौता कहा जाएगा.

1971 के युद्ध के बाद भारत के साथ यही हुआ था. भारत की सेना ने पाकिस्तान को पूर्वी और पश्चिमी...दोनों मोर्चों पर हराया था . भारत ने पाकिस्तान के 90 हज़ार से ज़्यादा सैनिकों को युद्ध बंदी बना लिया था. पाकिस्तान में पंजाब और सिंध के कई इलाक़ों में भारतीय सेना का क़ब्जा हो गया था. हमारी फ़ौज नियंत्रण रेखा को पार करके पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाले कश्मीर में भी कई किलोमीटर अंदर तक चली गई थीं.

कुल मिलाकर पाकिस्तान की 15 हज़ार वर्ग किलोमीटर ज़मीन भारत के पास आ गई थी.
ये इतनी ज़मीन थी...जिसमें दिल्ली जैसे 10 शहर बसाए जा सकते हैं. 

ये पाकिस्तान की करारी हार थी. लेकिन जब भारत की इस विशाल जीत के बाद पाकिस्तान को मेज़ पर समझौते के लिये आना पड़ा...तो हम ऐसी कई बातों को मनवाने में नाकाम रहे, जो कश्मीर का मुद्दा हमेशा के लिये ख़त्म कर देतीं .

दिसंबर 1971 में 13 दिनों तक चले युद्ध के 6 महीने बाद 2 जुलाई 1972 को भारत और पाकिस्तान के बीच शिमला समझौता हुआ था . इस पर भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जुल्फीकार अली भुट्टो ने हस्ताक्षर किए थे .
इस समझौते में लिखा गया कि दोनों पक्ष सभी विवाद शांतिपूर्ण तरीके से निपटाएंगे. 
हर मतभेद को द्विपक्षीय तरीके से सुलझाया जाएगा .
दोनों देश एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देंगे.
और जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा का उल्लंघन नहीं किया जाएगा.

1971 का युद्ध जीतने के बाद भारत चाहता तो पाकिस्तान पर कश्मीर को लेकर दबाव बना सकता था . लेकिन तब शिमला समझौते में इंदिरा गांधी ने सदभावना दिखाते हुए पाकिस्तान को पूरी ज़मीन वापस कर दी थी. और बंदी बनाए गए 90 हज़ार सैनिकों को भी वापस भेद दिया गया . इसलिये अगर डिप्लोमेसी में इसे भारत की हार नहीं कहेंगे...तो इसे बड़ी जीत भी नहीं कह सकते . 

हमने आपको शेख अब्दुल्ला और पंडित नेहरू की दोस्ती के बारे में बताया . हमने आपको ये भी बताया कि कैसे पंडित नेहरू के निधन के बाद इंदिरा गांधी ने भी इस राजनीतिक दोस्ती को निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी...1982 में जम्मू-कश्मीर के मुख्य मंत्री रहते हुए शेख अबदुल्ला का निधन हो गया . 

इसके बाद शेख अब्दुल्ला के बेटे फारुक अब्दुल्ला और इंदिरा गांधी के बेटे राजीव गांधी के बीच राजनीतिक दोस्ती शुरू हुई . वर्ष 1987 में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस पार्टी ने साथ-साथ चुनाव लड़ा . इस चुनाव में भी धांधली का आरोप लगा . जिन लोगों ने धांधली का आरोप लगाया उनमें से कुछ अलगाव-वादी और आतंकवादी बन गए . 

वर्ष 1989 में जब आंतकवादियों ने कश्मीरी पंडितों को कश्मीर घाटी से बाहर निकालने का अभियान शुरू किया तब फारुक अब्दुल्ला, जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री थे . उस सरकार में कांग्रेस पार्टी शामिल थी . 

यानी राजीव गांधी ने भी कश्मीर पर अपनी मां और नाना की नीतियों का ही पालन किया . और स्थिति जस की तस बनी रही .

वर्ष 2004 में देश में यूपीए की सरकार आई . ऐसा माना जाता था कि सरकार का असली रिमोट कंट्रोल कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के हाथ में था . लेकिन कश्मीर को लेकर सोनिया गांधी भी अपने पति राजीव गांधी, सास इंदिरा गांधी और पंडित नेहरू के दिखाए रास्ते पर चलती रहीं . तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी को जम्मू-कश्मीर का मुद्दा सुलझाने के लिए 10 वर्ष मिले थे . 

लेकिन किसी ने भी इस दिशा में कोई पहल नहीं की . इस दौरान अलगाववादियों का प्रभाव बढ़ने लगा . सैयद अली शाह गिलानी और यासीन मलिक जैसे अलगाववादियों की हैसियत मुख्यधारा के राजनेताओं जैसी हो गई . यानी ये लोग कश्मीर को भारत से अलग करने का सपना तो देख रहे थे . लेकिन इनका स्टेटस...Stake Holder वाला हो गया था . वर्ष 2004 से 2014 के UPA सरकार ने..कश्मीर में शांति स्थापित करने को लेकर कुछ नहीं किया .

वर्ष 2004 से 2006 के बीच मनमोहन सिंह की सरकार ने अलगाववादियों के साथ बातचीत की पहल की . लेकिन ऐसा माना जाता है कि सरकार के पास उस वक्त कश्मीर को लेकर कोई रोड मैप ही नहीं था . 

2005 में कश्मीर को लेकर एक बड़ा फैसला लिया गया . इस फैसले के तहत BSF को कश्मीर के अंदरूनी इलाकों से हटाकर...बॉर्डर पर भेज दिया गया और कश्मीर की आतंरिक सुरक्षा की ज़िम्मेदारी CRPF को सौंप दी गई . सेना के साथ मिलकर BSF ने वर्ष 2005 तक कश्मीर में हालात काबू में कर लिए थे . लेकिन अचानक हुए इस बदलाव का फायदा...आतंकवादियों और अलगाववादियों ने उठाया .

इसके बाद वर्ष 2009 के दौरान भी कांग्रेस के कई बड़े नेता चुपचाप हुर्रियत के साथ बातचीत करने की कोशिश करते रहे .

वर्ष 2010 में कश्मीर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए . इनमें 100 से ज्यादा नागरिकों की जान भी चली गई . 

इसी दौरान कश्मीर के अलगाववादी नेताओं को VIP माना जाना लगा...उनकी सुरक्षा, खान पान और रहन सहन पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने लगे . इसका फायदा इन अलगाववादियों ने उठाया और कश्मीर को अशांत बनाने के लिए Terror Funding की मदद ली जाने लगी . इसी पैसे से अलगाववादियों ने देश भर में संपत्तियां खरीदी .और अमीर होते गए .

यानी 10 वर्षों के दौरान कश्मीर कांग्रेस के हाथ से निकल गया . और आतंकवाद और कट्टरपंथ की समस्या दूर नहीं की जा सकी .

जम्मू कश्मीर..पाकिस्तान के लिए कोई मुद्दा नहीं...बल्कि उद्योग है . कश्मीर के नाम पर ही पाकिस्तान की सेना अपने हथियारों को जंग लगने से बचा पाती है . पाकिस्तान को कश्मीर अपनी Jugular Vein यानी शह रग मानता रहा है . ये रग खून को सिर तक पहुंचाने का काम करती है . लेकिन भारत ने अनुच्छेद 370 हटाकर पाकिस्तान की ये नस काट दी है . 

इसी के साथ कश्मीर में पाकिस्तान कि वो Supply Line भी कट गई है...जिसके सहारे वो आतंकवाद का कारोबार करता था . DNA में हम आपको पहले ही बता चुके हैं कि पाकिस्तान में दुनिया को दिखाने के लिए तो एक लोकतांत्रिक सरकार है. लेकिन असल में पाकिस्तान को बाजवा Doctrine के द्वारा ही चलाया जाता है. इस Doctrine को ये नाम पाकिस्तान के वर्तमान सेना प्रमुख.. जनरल कमर जावेद बाजवा के नाम पर दिया गया है . जनरल बाजवा को आप आतंकवाद, अलगावाद और कट्टरपंथ के उद्योगों का CEO भी कह सकते हैं . और पाकिस्तानी सेना के इन Products की सबसे ज्यादा खपत...जम्मू कश्मीर में ही होती थी . लेकिन अब इस उद्योग पर ताला लग गया है . 

पाकिस्तान की सेना ने आतंकवाद और अलगाववाद को कश्मीर में किसी Product की तरह बेचा...तो जम्मू कश्मीर के नेताओं ने इसे हाथों हाथ खरीद लिया . जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक परिवारों ने अलगाववाद और आतंकवाद को इस्लाम और कट्टरपंथ के धागे से बांधने की कोशिश की . ये सब राजनीतिक फायदे और मुस्लिम वोट बैंक के लिए किया गया . कश्मीर के धार्मिक और राजनीतिक दोहन के मामले में कांग्रेस भी पीछे नहीं रही . कांग्रेस को हमेशा ये लगा कि अलगाववादियों का साथ देकर...मुस्लिम मतदाओं को लुभाया जा सकता है . 

जम्मू-कश्मीर की 96 प्रतिशत मुस्लिम आबादी को तो इस राजनीति का बंधक बनाया ही गया..देश के 20 करोड़ मुसलमानों को भी कश्मीर के नाम पर Blackmail किया गया . भारत के कुल मतदाताओं में मुस्लिम वोटर्स की संख्या 15 प्रतिशत है. और कांग्रेस ने हमेशा इन्हीं 15 प्रतिशत वोटों पर नज़र जमाकर रखी . लेकिन 2019 लोकसभा चुनाव के नतीजों ने कांग्रेस की इस बांटो और राज करो वाली राजनीति का अंत कर दिया . और इस साल 5 अगस्त को अनुच्छेद 370 के हटते ही कांग्रेस के बचे कुचे अरमानों पर भी पानी फिर गया .

कश्मीर सिर्फ भारत और पाकिस्तान के बीच ही विवाद का मुद्दा नहीं है. बल्कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय भी इस इलाके को गिद्ध दृष्टि से देखता है . अमेरिका जैसे देशों को कश्मीर विवाद सुलझाने के नाम पर कूटनीति की दुनिया का सरपंच बनने का मौका मिल जाता है. तो चीन जैसे विस्तारवादी देश भी कश्मीर पर कब्ज़ा करने की फिराक में रहते हैं . पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर...में चीन का निवेश इसी बात का उदाहरण है..कि दो देशों की लड़ाई का फायदा..कैसे तीसरे देश उठाते हैं . 

इसके अलावा अमेरिका, चीन और Russia जैसे देश दुनिया में सबसे ज्यादा हथियारों की Supply करते हैं. कश्मीर के नाम पर पाकिस्तान और भारत के बीच युद्ध के हालात बनते ही...इन देशों पर पैसों की बारिश होने लगती है . पाकिस्तान अपने 70 प्रतिशत हथियार चीन से खरीदता है . जबकि चीन अपने 35 प्रतिशत हथियार पाकिस्तान को बेचता है. इसी तरह भारत अपने 70 प्रतिशत हथियार Russia से लेता है...जबकि बाकी की ज़रूरत..अमेरिका, फ्रांस और इजरायल जैसे देशों से पूरी होती है. मतलब साफ है कि कश्मीर.. सिर्फ भारत और पाकिस्तान के बीच का विवाद नहीं है...बल्कि दुनिया के बड़े देशों के लिए भी Cash Machine बन चुका है . 

जम्मू-कश्मीर पर नेहरू-गांधी परिवार ने सीमा रेखा पार की और हमारे देश के मीडिया ने लक्ष्मण रेखा पार कर दी . कश्मीर पर जैसी गलती राहुल गांधी ने की..वैसी ही गलती मीडिया के एक वर्ग ने भी की . और ये गलती अंजाने में नहीं हुई बल्कि जान-बूझकर की गई . कांग्रेस की तरह देश के कुछ डिजाइनर पत्रकार इस फिराक में थे कि किसी तरह वो ये साबित कर सकें कि जम्मू-कश्मीर में कुछ ठीक नहीं है...और केंद्र सरकार का दावा झूठ है . आपने देखा होगा...आज से ठीक चार दिन पहले यानी 24 अगस्त को राहुल गांधी, विपक्ष के कुछ नेताओं और पत्रकारों के साथ श्रीनगर एयरपोर्ट पहुंचे थे . राहुल गांधी और उनके साथ गए कई पत्रकारों ने आरोप लगाया कि एयरपोर्ट पर सुरक्षाबलों ने उनसे बदसलूकी की . 

दिल्ली-एनसीआर में एसी के कमरे में बैठकर एजेंडा तैयार करने वाले कुछ डिजाइनर संपादकों के निर्देश पर खबर दिखाई गई कि सुरक्षाबलों ने पत्रकारों के साथ मारपीट की . अभिव्यक्ति पर हमला किया गया . इस घटना का सच तो आपसे छिपा लिया गया लेकिन कश्मीर पर सरकार और सुरक्षाबलों के खिलाफ दुष्प्रचार किया गया .और इसी बात का फायदा पाकिस्तान ने उठाया . पाकिस्तानी मीडिया में ये दिखाया गया कि भारत के पत्रकार कह रहे हैं कि उनकी आवाज़ दबाई जा रही है ...और कश्मीर का सच नहीं दिखाने का दबाव बनाया जा रहा है .

अब आपको कश्मीर पर 24 अगस्त का मीडिया वाला पूरा एपिसोड बताते हैं . जिससे आपको ये समझने में आसानी होगी कि कैसे मीडिया के एक वर्ग ने कश्मीर पर पाकिस्तान को फायदा पहुंचाने की कोशिश की .

24 अगस्त को दोपहर 12 बजकर 15 मिनट पर राहुल गांधी, विपक्ष के कई नेता और पत्रकारों की एक टीम...एक ही विमान में बैठकर दिल्ली से श्रीनगर के लिए रवाना हुई . दोपहर 2 बजकर 16 मिनट पर विमान श्रीनगर एयरपोर्ट पहुंचा . 

लेकिन राहुल गांधी और उनके साथ आए विपक्ष के नेताओं को एयरपोर्ट प्रशासन ने सुरक्षा वजहों से एयरपोर्ट से बाहर निकलने की इजाजत नहीं दी . राहुल गांधी ने इस बात का विरोध किया . 

और वहां राहुल के साथ दिल्ली से गए पत्रकारों ने पहले से तैयार पटकथा के हिसाब से शूटिंग शुरू कर दी . वो एयरपोर्ट पर कैमरे से फोटो खींच रहे थे . वीडियो बना रहे थे . एयरपोर्ट पर तैनात सिक्योरिटी फोर्स ने मीडिया से कैमरे बंद करने की अपील की . पत्रकारों को ये भी समझाया गया कि श्रीनगर एयरपोर्ट सिविल एयरपोर्ट के साथ-साथ डिफेंस एयरपोर्ट भी है और यहां वायुसेना के काफी Assets हैं . इसीलिए यहां वीडियोग्राफी की अनुमति नहीं दी जा सकती . 

लेकिन दिल्ली में बैठे कुछ डिजाइनर संपादकों के निर्देश पर काम कर रहे दूत...सुरक्षा एजेंसियों की बात मानने को तैयार नहीं थे . उस दौरान मीडिया वीडियो रिकॉर्डिंग और लाइव टेलीकास्ट भी करता रहा . और जब एयरपोर्ट प्रशासन ने मीडिया को ऐसा करने से रोकने की कोशिश की तो ये सुरक्षाबल के जवानों पर ही भड़क उठे . उन्होंने इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमले से जोड़ दिया .

कुछ न्यूज चैनलों में इस तरह दिखाया गया जैसे लोकतंत्र खतरे में पड़ गया हो . जबकि बुद्धिजीवियों और डिजाइनर पत्रकारों में से किसी ने ये समझने की कोशिश नहीं की...कि श्रीनगर एयरपोर्ट सुरक्षा की दृष्टि से कितना संवेदनशील है . 

श्रीनगर एयरपोर्ट पर आए दिन आतंकी हमले के खतरे से जुड़े खुफिया इनपुट मिलते रहते हैं . श्रीनगर एयरपोर्ट के पास ही...एयरपोर्ट से सिर्फ 1 किलोमीटर की दूरी पर बीएसएफ कैंप भी है . 

अक्टूबर, 2017 में इसी बीएसएफ कैंप पर आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने हमला किया था . इस आतंकी हमले में बीएसएफ का एक जवान शहीद हो गया और तीन आतंकी भी मारे गए थे . ये ऑपरेशन 10 घंटे चला था . और इस दौरान 5 घंटे के लिए श्रीनगर एयरपोर्ट बंद कर दिया गया . 

यहां आपको ये भी पता होना चाहिए कि आमतौर पर देश के एयरपोर्ट की सुरक्षा CISF यानी Central Industrial Security Force करती है ...लेकिन श्रीनगर एयरपोर्ट देश के कुछ चुनिंदा एयरपोर्ट में हैं जिसकी सुरक्षा में CRPF यानी Central Reserve Police Force की तैनाती होती है .