close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

ZEE जानकारी: मुसलमानों की शिक्षा, रोजगार के लिए केंद्र सरकार ने बनाया खास प्लान

सरकार ने मुसलमानों के शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए एक स्पेशल पैकेज तैयार किया है.

ZEE जानकारी: मुसलमानों की शिक्षा, रोजगार के लिए केंद्र सरकार ने बनाया खास प्लान

हमारे देश में वोट बैंक की राजनीति का लंबा इतिहास रहा है. इसके लिए देश के करीब 20 करोड़ मुसलमानों को अलग होने का पाठ पढ़ाया गया. उन्हें Secularism के नाम पर डराया गया. इसका नतीजा ये हुआ कि मुसलमान पढ़ाई-लिखाई से लेकर नौकरी और कारोबार तक में पिछड़ते गए. अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समस्या की जड़ को पकड़ लिया है और ऐसा क़दम उठाया है जिससे मुस्लिम तुष्टिकरण की दुकानें बंद हो गई हैं.

सरकार ने मुसलमानों के शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए एक स्पेशल पैकेज तैयार किया है. इसके तहत अगले पांच वर्षों में 5 करोड़ अल्पसंख्यक छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति दी जाएगी . साथ ही मदरसों को आधुनिक बनाया जाएगा . ताकि मुसलमानों को अच्छी शिक्षा मिले और उनकी तरक़्क़ी हो.

आज हम मोदी सरकार की इस योजना का स्पेशल DNA टेस्ट करेंगे . साथ ही...देश में मुसलमानों की हालत की गहराई से समीक्षा करेंगे . 
आपने 23 मई के बाद Social Media और News Channels की Debate में एक खास विचारधारा के लोगों को ये कहते हुए ज़रूर सुना होगा कि बीजेपी की सरकार दोबारा सत्ता में आ गई है. अब देश के मुसलमानों का क्या होगा ? 

लेकिन, मोदी सरकार का ध्यान...मुसलमानों की Education, Employment और Empowerment पर है . ये सरकार का Three 'E' Plan है... पहले E का मतलब है... Education यानी शिक्षा, दूसरे E का मतलब है... Employment यानी रोज़गार और तीसरे E का मतलब है... Empowerment... यानी सशक्तीकरण सरकार अगले 5 वर्षों में 5 करोड़ अल्पसंख्यक छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति देने जा रही है. इनमें 50 प्रतिशत लड़कियों को चुना जाएगा . 

सरकार मदरसों को आधुनिक बनाएगी ताकि यहां की शिक्षा भी मुख्य धारा से जुड़ सके. और यहां पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं भी नौकरियां हासिल कर सकें. मदरसों में पढ़ाने वाले मौलवियों को हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान और कंप्यूटर का प्रशिक्षण दिया जाएगा. 
मोदी सरकार ने आज के फ़ैसले मुस्लिम तुष्टिकरण की दुकानें बंद कर दी हैं. 
सरकार ने उन 60 अल्पसंख्यक बहुल जिलों को चुना है, जहां स्कूल जाने वाली मुस्लिम लड़कियों की संख्या कम है . इन इलाकों में पढ़ो-बढ़ो जागरूकता अभियान चलाया जाएगा .

बीच में पढ़ाई छोड़ देने वाली अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों को ब्रिज कोर्स से जोड़ा जाएगा . 

मुसलमान और दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय, सरकारी नौकरियों में पिछड़ ना जाएं, इसके लिए गरीब अल्पसंख्यक छात्रों को मुफ्त कोचिंग दी जाएगी . 

इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर स्कूल-कॉलेज, तकनीकी शिक्षण संस्थान, और लड़कियों के लिए Hostel बनाए जाएंगे.

भारत के मुसलमानों को वर्ष 1947 से पहले ही देश की मुख्यधारा से अलग कर दिया गया. इसकी वजह समाज सुधारक सर सैयद अहमद खां के विचार थे. सर सैयद भारत में लोकतंत्र के विरोधी थे . क्योंकि उनको लगता था कि अगर भारत में लोकतंत्र आया तो मुसलमानों को हिंदू राज में रहना होगा. उन्होंने 1887 में ही हिंदू और मुसलमानों को देश की दो अलग अलग क़ौम बताकर ही अलगाववाद की विचारधारा की बुनियाद रख दी थी.

सर सैयद अहमद खां ने 28 दिसंबर 1887 को एक भाषण में Two Nation Theory दी थी. उन्होंने कहा था कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग कौमें हैं. आप काजी मुहम्मद अदील अब्बासी की किताब ख़िलाफ़त आंदोलन के Page Number 26 पर सर सैयद का पूरा भाषण पढ़ सकते हैं. इस किताब को नेशनल बुक ट्रस्ट ने प्रकाशित किया है .))

भारत में सांप्रदायिक राजनीति की मूल समस्या ये है कि हिंदुओं का नेतृत्व मुसलमान नहीं कर सकता है . और मुसलमानों का नेतृत्व हिंदू नहीं कर सकता है . इस समस्या की शुरुआत सर सैयद के विचारों से हुई . आज़ादी के बाद भी ये बीमारी हमारे देश की राजनीति में मौजूद है. इसी वजह से संख्या में कम होने के नाम पर मुसलमान Special Status की मांग करते हैं. लोग ये बात आज भी नहीं समझ सके हैं कि उनका विकास इस बात पर निर्भर नहीं करता है कि उनके प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद या विधायक की जाति या धर्म क्या है ? 

सर सैयद अहमद की वजह से भारत की राजनीति में जो समस्याएं आईं उनको पंडित नेहरू ने भी नहीं सुलझाया. आज़ादी के बाद हिंदुओं के लिए संविधान के मुताबिक कानून बनाए गए. लेकिन मुसलमानों को Personal Law और शरीयत का पालन करने की छूट दी गई . यानी उनके लिए अलग क़ानून था और देश के बाक़ी लोगों के लिए अलग क़ानून.

मुसलमानों को लगा कि उनके अधिकार बढ़ रहे हैं. उनका महत्व बढ़ रहा है. लेकिन हक़ीक़त ये थी कि वो लगातार मुख्य धारा से कटते जा रहे थे. क्योंकि उनकी अलग शिक्षा व्यवस्था को बढ़ावा दिया गया . आज़ादी के बाद भी मदरसों के पाठ्यक्रम को Update नहीं किया गया . मुसलमान लगातार आधुनिक शिक्षा से दूर होते चले गए . इसलिए नौकरियों में भी उनके लिए मौके घटते गए और उनका आर्थिक और सामाजिक विकास भी रुक गया . 

दुर्भाग्य की बात ये है कि मुसलमानों की इन कमियों को वोट बैंक की राजनीति करने वालों ने उनकी खूबी बताकर पेश किया . इन पार्टियों ने मुसमलानों को वोट बैंक बनाकर उनको अलग पहचान देने की कोशिश की . इसी वजह से मुसलमान, लगातार पिछड़ते गए और किसी ने मुसलमानों के मसीहा बनने वाले नेताओं से सवाल भी नहीं किया. 

अगर भारत को सुपरपावर बनना है, तो देश के 20 करोड़ मुसलमानों को छोड़कर भारत के विकास की कल्पना करना असंभव है. इसीलिए आज भारत के मुसलमानों को एक सामाजिक क्रांति की ज़रूरत है . ये सच है कि भारत के मुसलमान शिक्षा में बहुत पिछड़े हुए हैं.

देश में 74 प्रतिशत लोग साक्षर हैं...जबकि मुसलमानों में ये दर क़रीब 69 प्रतिशत है. मुसलमानों के बीच पढ़ाई-लिखाई को लेकर असली समस्या प्राइमरी स्कूल के बाद शुरू होती है. एक रिसर्च के मुताबिक़ प्राइमरी स्कूल यानी पांचवीं क्लास तक 65.3 प्रतिशत मुसलमान पढ़ते हैं. लेकिन इसके बाद सिर्फ़ 11 प्रतिशत मुस्लिम छात्र 10वीं कक्षा तक पढ़ पाते हैं. जबकि 12वीं कक्षा तक सिर्फ़ 4.5 प्रतिशत मुसलमान छात्र ही पहुंच पाते हैं. कॉलेज की पढ़ाई यानी Graduation के मामले में भारत के मुसलमान सबसे ज़्यादा पिछड़े हुए हैं. मुसलमानों में सिर्फ़ 3 प्रतिशत लोग ही कॉलेज की पढ़ाई पूरी करते हैं.

देश में मुसलमानों के पास औद्योगिक ट्रेनिंग की भारी कमी है. इस वजह से रोज़गार पाने में भी उनके सामने रुकावटें आती हैं. इसका असर उनकी ज़िंदगी और परिवार के विकास पर पड़ता है.

भारत की 40 प्रतिशत आबादी ही नौकरी या कोई और काम करने लायक़ है. बाक़ी 60 प्रतिशत में बच्चे, बुजुर्ग और घर संभालने वाली महिलाएं शामिल हैं. मुसलमानों में सिर्फ़ 33 प्रतिशत आबादी ही काम करती है.

ये बाक़ी धर्मों के मुक़ाबले सबसे कम है. यानी भारत में मुसलमानों के बीच रोज़गार के लायक़ शिक्षा या कोई और ट्रेनिंग भी काफ़ी कम हैं. 

NSSO यानी National Sample Survey Office ने 2009-2010 में एक रिपोर्ट में बताया था कि एक मुसलमान नागरिक हर महीने औसतन 980 रुपये ख़र्च करता है. जबकि, देश के दूसरे नागरिकों की ये औसत एक हज़ार 128 रुपये है.

इन सब पहलुओं की वजह से देश की अर्थव्यवस्था में भी मुस्लिम समुदाय की भागीदारी कम हो जाती है.यानी पढ़ाई-लिखाई देश में मुसलमानों के पिछड़ेपन की मूल वजह है. वर्ष 2016 में लोकसभा में पेश आंकड़ों के मुताबिक़ मुसलमानों की साक्षरता दर पिछले 2 दशकों में बेहतर हुई है.

वर्ष 2001 में 59 प्रतिशत मुसलमान साक्षर थे. 2011 में ये तादाद 68.5 प्रतिशत हो गई थी. यानी इन 10 वर्षों में मुसलमानों के बीच शिक्षा का स्तर बेहतर हुआ और ये 9 प्रतिशत बढ़ गया. जबकि इस दौर में पूरे भारत की साक्षरता दर 8.2 प्रतिशत बढ़ी है. पिछले दशक में बाक़ी धर्मों के मुक़ाबले मुसलमानों के बीच अच्छी पढ़ाई-लिखाई को लेकर जागरूकता बढी है. 2001 से 2011 के बीच बौद्ध धर्म के लोगों की साक्षरता दर 8.6 प्रतिशत बढ़ी, सिखों में 6 प्रतिशत, ईसाइयों में 4.2 प्रतिशत और जैन धर्म में 0.8 प्रतिशत साक्षरता दर बढ़ी है.

इसका मतलतब है कि मुसलमान अपनी नई पीढ़ी को पढ़ाना चाहते हैं. लेकिन उनके लिये अब तक जो बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाये जाने का दावा किया गया था...उसका फ़ायदा उन तक नहीं पहुंचा. वो आज भी पिछड़े हुए हैं.

इस देश में सड़कें बन रही हैं, अस्पताल बन रहे हैं, स्कूल बन रहे हैं. देश के विकास के लिए हो रहे ये काम सभी नागरिकों के लिए हैं. जनसंख्या के आधार पर उनके इस्तेमाल में कोई भेदभाव नहीं होगा. आज किसी को ये नहीं सोचना चाहिए कि उसके समुदाय की संख्या कम या ज़्यादा है, तो उसे स्पेशल स्टेटस मिलना चाहिए. आज देश के मुसलमानों को भी ये सोचना होगा कि ख़ुद को अलग समझकर देश के विकास की मुख्यधारा से दूर रहने से उनको कितना नुक़सान हुआ है. ज़रूरी है कि वो अपनी अलग व्यवस्था की मांग छोड़कर देश की मुख्यधारा में शामिल हों.

भारत में क़रीब 20 करोड़ मुसलमान हैं...और इनमें 31 प्रतिशत अनपढ़ हैं.
3 प्रतिशत मुसलमान ही कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर पाते हैं.
वर्ष 2011 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ मुसलमानों में बेरोज़गारी की दर SC/ST वर्ग से भी ज़्यादा है.

देश में मुस्लिम समुदाय की आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक स्थिति को जानने के लिये वर्ष 2005 में मनमोहन सरकार ने एक कमेटी बनाई थी. जस्टिस राजिंदर सच्चर के नेतृत्व में बनी इस 7 सदस्यीय कमेटी ने वर्ष 2006 में अपनी रिपोर्ट में बताया कि देश में मुसलमानों की स्थिति अन्य समुदायों की तुलना में काफ़ी ख़राब है.

रिपोर्ट में बताया गया कि बड़े सरकारी अफ़सरों में केवल 6 प्रतिशत मुसलमान हैं. निजी क्षेत्र की कंपनियों में भी उनका अनुपात आबादी के लिहाज़ से काफ़ी कम है. 
जबकि कई राज्यों में जेलों में मुस्लिम क़ैदियों की तादाद 30 से 40 प्रतिशत तक है.
सच्चर कमेटी ने सुझाव दिया था कि -
मदरसों में मिलने वाली डिग्री को रक्षा और बैकिंग जैसे क्षेत्रों में मान्यता दी जाये.
अल्पसंख्यक छात्रों को हॉस्टल की सुविधा में तरजीह दी जाये.
उर्दू Medium स्कूल खोले जाएं और उनके लिये उर्दू में किताबें मुहैया कराई जाएं.
सरकारी नौकरियों में इंटरव्यू बोर्ड में मुसलमानों को जगह दी जाये.

मुसलमानों की शिक्षा के लिए इस बार मोदी सरकार ने बड़ी पहल की है...लेकिन इस मुद्दे पर राजनीति भी शुरू हो गई है. 

मुस्लिम समाज सुधारक सर सैयद अहमद ख़ान ने 28 दिसंबर 1887 को अलीगढ़ में एक भाषण में Two Nation Theory दी थी. उस भाषण में सर सैयद अहमद ख़ां ने कहा था हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग क़ौम हैं. मुसलमानों की आबादी हिंदुओं के मुक़ाबले बहुत कम है. अगर अंग्रेज़ चले गए और भारत में लोकतंत्र आया तो मुसलमानों पर हिंदू राज करेंगे. मुसलमानों के लिए यही अच्छा है कि इस देश पर अंग्रेज़ राज करते रहें.
इस भाषण का ज़िक्र काजी मुहम्मद अदील अब्बासी की किताब ख़िलाफ़त आंदोलन में है.

पर, भारत में मदरसों में दी जाने वाली शिक्षा को लेकर सन 1837 से बहस जारी है. ये वो वक़्त था जब भारत में आधुनिक शिक्षा की शुरुआत की गई थी. तब भारत में सर सैयद अहमद ख़ान और फ़ज़लुर रहमान जैसे मुस्लिम शिक्षाविदों ने मदरसों को आधुनिक बनाने पर ज़ोर दिया था.

इसका ज़िक्र मानव संसाधन विकास मंत्रालय की वर्ष 2018 की एक रिपोर्ट में किया गया है. इसमें बताया गया है कि सर सैयद अहमद ख़ान मदरसों में दी जाने वाली शिक्षा में बदलाव चाहते थे. लेकिन मुसलमानों एक वर्ग ऐसा भी था जो इसके ख़िलाफ़ था. 

जब सर सैयद ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी स्थापित करने के लिये 1886 में अलीगढ़ Movement की शुरुआत की...तब मुसलमानों के एक बड़े वर्ग ने इसका विरोध करते हुए देवबंद में इस्लाम पर आधारित शिक्षा का समर्थन किया था. 

जब देश आज़ाद हुआ, तो देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने All India Madrasa Board बनाने पर ज़ोर दिया.

लेकिन आज तक अखिल भारतीय स्तर पर इस बोर्ड की स्थापना नहीं की गई. हालांकि अलग अलग राज्यों में मदरसा बोर्ड बनाये गये हैं. 
वर्ष 2018 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने चार राज्यों, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और त्रिपुरा के क़रीब 11 हज़ार मदरसों को आधुनिक बनाने की शुरुआत की थी. इस प्रोजेक्ट को अध्य्यन के बाद 18 राज्यों में लागू किया जाएगा.