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ZEE जानकारी: असहनशीलता का एजेंडा चलाने वाले बुद्धिजीवियों का सच!

Pseudo-Seculars, Celebrities और राजनैतिक कार्यकर्ताओं का Favourite शब्द बन गया है Mob Lynching.

ZEE जानकारी: असहनशीलता का एजेंडा चलाने वाले बुद्धिजीवियों का सच!

आज का विश्लेषण हम एक शब्द से शुरू करेंगे- और वो शब्द है Mob Lynching...आपने भी सुना होगा. कुछ लोगों के लिए ये काफी Fashionable शब्द है. Pseudo-Seculars, Celebrities और राजनैतिक कार्यकर्ताओं का Favourite शब्द बन गया है Mob Lynching.

इसी Mob Lynching का सहारा लेकर, ये तमाम लोग खुलकर राजनीति करते हैं. और असहनशीलता वाला एजेंडा भी चलाते हैं.  Mob Lynching वैसे तो अंग्रेजी का शब्द है. लेकिन अब इसे भारत का बच्चा-बच्चा जानने लगा है. हिन्दी में Mob का अर्थ हुआ, भीड़ और Mob Lynching का मतलब हुआ, भीड़ द्वारा किसी व्यक्ति को पीट पीटकर मार डालना.

अब इसी शब्द का राजनीतिक इस्तेमाल देश के कुछ अंग्रेजी बोलने वाले Celebrities करने लगे हैं. जो अपने आप को बुद्धिजीवी कहते हैं. ऐसे लोगों के पास कोई काम नहीं है. इनकी अपनी राजनीतिक महात्वाकांक्षाएं हैं. इसलिए आज, इन्हें Expose करना ज़रुरी है. पिछले 48 घंटों से इन Celebrities और नेताओं ने Mob Lynching शब्द को एक गुप्त एजेंडे के तहत धर्म विशेष से जोड़कर, समाज को बांटने की कोशिश की है.

इन्होंने ये साबित करने की कोशिश की है, कि हिंसा या Mob Lynching की किसी भी घटना के लिए देश की बहुसंख्यक आबादी ज़िम्मेदार है. और अल्पसंख्यकों को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है. यानी देश में अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं . Mob Lynching की घटना का सच चाहे कुछ भी हो. उसमें धार्मिक एंगल ना भी हो. बावजूद इसके देश का बुद्धिजीवी वर्ग किसी ना किसी प्रकार से हर घटना में धार्मिक एंगल ढूंढ ही लेता है. हालांकि, ऐसे लोगों की चिंता काफी Selective है. इसे साबित करने के लिए आज हमारे पास पश्चिम बंगाल के Hooghly से कुछ तस्वीरें आई हैं. सबसे पहले आप ये Video देखिए. फिर हम इस विश्लेषण को आगे बढ़ाएंगे.

ये घटना उत्तर प्रदेश की नहीं है, ये घटना गुजरात की नहीं है, ये घटना महाराष्ट्र की भी नहीं है . ये पश्चिम बंगाल की घठना है
इस Video में भीड़ जिस व्यक्ति को पीट रही थी, वो कोई अपराधी नहीं था. बल्कि वो पश्चिम बंगाल के Hiralal Paul College के प्रोफेसर सुब्रतो चटर्जी थे. आप जब इस घटना का पूरा सच सुनेंगे, तो आपको यकीन नहीं होगा .

आरोपों के मुताबिक, कॉलेज के सीनियर और जूनियर छात्रों के बीच झगड़ा चल रहा था. सीनियर छात्र ममता बनर्जी की पार्टी TMC से जुड़े हुए थे. और वो जूनियर छात्रों को ममता बनर्जी की प्रशंसा करने और उन्हें समर्थन देने के लिए मजबूर कर रहे थे.

ऐसे भी आरोप हैं, कि कॉलेज के सीनियर छात्र अपने जूनियर्स को कॉलेज परिसर में 'TMC ज़िन्दाबाद' और 'ममता ज़िन्दाबाद' के नारे लगाने का दबाव बना रहे थे. इस झगड़े के बीच प्रोफेसर सुब्रतो चटर्जी ये सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे थे, कि जूनियर छात्रों को परेशान ना किया जाए. और इसी कोशिश के दौरान वो जूनियर छात्रों को कॉलेज से बाहर निकलने में मदद कर रहे थे. और यही बात TMC से जुड़े छात्रों को पसंद नहीं आई. और उन्होंने उस प्रोफेसर की पिटाई कर दी. आगे बढ़ने से पहले आप इस प्रोफेसर की बातें सुन लीजिए.

ममता बनर्जी के राज में हो रही हिंसा के खिलाफ देश के किसी बुद्धिजीवी ने कोई चिट्ठी नहीं लिखी. किसी भी फिल्म निर्देशक ने आक्रोश नहीं जताया. किसी भी अभिनेता या अभिनेत्री ने Press Conference नहीं की. शायद इसलिए, क्योंकि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुद ही उस चिट्ठी का समर्थन किया था, जो चिट्ठी देश के 49 लेखक, एक्टर और फिल्मकारों ने लिखा था . और इनमें ज्यादातर वो लोग हैं जिनके पास आजकल काम की कमी है . इन जानी-पहचानी हस्तियों ने बढ़ती असहनशीलता के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखी थी. 

उस चिट्ठी में Mob Lynching, मुस्लिम, दलित और अल्पसंख्यक वाले शब्दों का कार्ड खेला गया था. और 'जय श्री राम' के नारे को भड़काऊ बताकर, उसे Mob Lynching से जोड़ दिया था. अपनी व्यथा बताते हुए अपर्णा सेन जैसी फिल्मकार ने कहा था, कि वो हर रोज़ सुबह उठकर जब अखबार पढ़ती हैं या टीवी देखती हैं. तो उन्हें देश के अलग-अलग हिस्सों में हो रही Mob Lynching की घटनाओं से पीड़ा होती है. और हमारे देश में बढ़ती असहिष्णुता भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बहुत बड़ा ख़तरा है.

इन 49 लोगों में से कम से कम 30 ऐसे हैं, जिनका रिश्ता कहीं ना कहीं पश्चिम बंगाल से है. लेकिन, इनमें से किसी ने भी अभी तक पश्चिम बंगाल में हर रोज़ हो रही हिंसा के खिलाफ कोई टिप्पणी नहीं की है. सब अपने-अपने घर में आराम से सोफे पर बैठे हैं. और बहुसंख्यक आबादी को बदनाम करने के लिए किसी आपराधिक घटना को Mob Lynching साबित करने का इंतज़ार कर रहे हैं. आज आपको इस लिस्ट में शामिल कुछ बुद्धिजीवियों के नाम और चेहरे भी याद कर लेने चाहिए.

इन लोगों में फिल्म निर्माता और निर्देशक अनुराग कश्यप हैं.

निर्देशक केतन मेहता और श्याम बेनेगल हैं.

फिल्म निर्देशक मणिरत्नम हैं.

इतिहासकार रामचंद्र गुहा हैं.

गायिका शुभा मुद्गल हैं.

अपर्णा सेन और कोंकणा सेन शर्मा जैसी एक्ट्रेस हैं.

लिस्ट में शामिल सभी 49 लोगों के नाम सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध हैं. और आप Internet पर उनके नाम पढ़ सकते हैं. लेकिन हमने सिर्फ कुछ लोगों के नाम आपको बताए. क्योंकि, इन सभी लोगों की अपने-अपने क्षेत्र में अच्छी-ख़ासी हैसियत है. चिट्ठी लिखने वाले लोगों में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्होंने 2014 में प्रधानमंत्री मोदी को वोट ना देने के लिए भी चिट्ठी लिखी थी. और इस बार लिखी गई चिट्ठी में कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिनके संबंध ऐसे NGO's से थे, जिनपर हाल-फिलहाल में सरकार ने कार्रवाई की है. और उनके फंड रोक दिए हैं. और ये एक वजह हो सकती है, कि समय-समय पर ऐसे लोग गुप्त एजेंडे के तहत अपना काम करते रहते हैं. 

2014 की हार के बाद 2015 में ऐसे ही लोगों ने देश में अवॉर्ड वापस करने का एक फैशन चला दिया. और 2019 में हार हुई, तो ये एक बार फिर शुरु हो गए हैं. ये अभी भी चैन से नहीं बैठे हैं. और यकीन मानिए, ये ऐसे ही बेचैन रहेंगे. सच तो ये है, कि ये बुद्धिजीवी हैं ही नहीं. ये शानदार अंग्रेज़ी बोलने वाले Celebrities हैं. ये लोग अलग-अलग व्यवसायों से जुड़े हुए हैं. और देश के मीडिया ने इन्हें बुद्धिजीवी के तौर पर पेश किया. और ये भी यही चाहते हैं.

अंग्रेज़ी में इसे Public Relations कहते हैं. इसी PR की बदौलत इन्होंने देश के लोगों के दिमाग में भी बुद्धिजीवी वाली छवि बना ली है. लेकिन सिर्फ बुद्धिजीवी कहलाने से कुछ नहीं होता. सही और ग़लत को समझने की बुद्धि भी होनी चाहिए. जिन लोगों को आपराधिक घटनाएं Mob Lynching लगती हैं. वही लोग, 'TMC ज़िन्दाबाद' और 'ममता ज़िन्दाबाद' ना बोलने वालों की Lynching पर मौन व्रत धारण कर लेते हैं. 

पश्चिम बंगाल को ज्ञान, शिक्षा और देशभक्तों की भूमि माना जाता है. 

भारत के राष्ट्रगान की रचना करने वाले रवींद्रनाथ टैगोर पश्चिम बंगाल की धरती पर पैदा हुए थे. 

राष्ट्रवाद का जो वृक्ष आज पूरे भारत में फैल चुका है. उसका बीज बोने का काम बंकिम चंद्र चटर्जी ने किया था. वो भी पश्चिम बंगाल की धरती से ही आते हैं. बंकिम चंद्र चटर्जी को आधुनिक भारत के महान निर्माताओं में से एक माना जाता है. उन्होंने भारत के राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की रचना की थी. बंकिम चंद्र चटर्जी के साहित्य में मौजूद राष्ट्र प्रेम को साहित्य के विद्वानों ने Romantic Idealism कहा है. यानी आदर्शवाद के प्रति हद से ज्यादा समर्पण और प्रेम.

बंकिम चंद्र के उपन्यासों में नायक बहुत देशभक्त और चरित्रवान थे. वो बहुत गर्व से ये बात कहते थे कि मैं अपनी मातृभूमि के लिए अपनी जान भी दे सकता हूं. बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास आनंद मठ में हिंदू राष्ट्रवाद के भाव की पराकाष्ठा देखने को मिलती है.

ठीक इसी तरह पश्चिम बंगाल की धरती ने देश को श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसा महापुरुष दिया. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ही ये नारा दिया था कि एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान नहीं चलेंगे. वो भारत में कश्मीर के संपूर्ण विलय के लिए संघर्ष करने वाले नेता थे. वो कश्मीर को Special Status देने के खिलाफ थे. जिसकी वजह से उन्होंने वर्ष 1953 में कश्मीर का दौरा किया था. और इसी दौरान रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मौत हो गई. 

महान स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस को कौन भूल सकता है. जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए, तुम मुझे खून दो... मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा का नारा दिया. सुभाष चंद्र बोस ने अपनी नेतृत्व क्षमता से आज़ाद हिंद फौज को जोश से भर दिया था. ये सुभाष चंद्र बोस द्वारा छेड़ा गया ऐतिहासिक संग्राम था, जिसमें अंग्रेज़ों की सेना के 45 हज़ार से ज़्यादा सैनिकों की मौत हुई थी .

लेकिन विडंबना देखिए. श्यामा प्रसाद मुखर्जी से लेकर श्याम बेनेगल तक. लोगों की सोच कहां से कहां पहुंच गई. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर के लिए अपना बलिदान दे दिया. लेकिन श्याम बेनेगल उस भीड़ का हिस्सा बन गए, जो धर्म विशेष के खिलाफ चलाए जा रहे एजेंडे को हवा देती है.

दरअसल, जिन लोगों को हमारे देश में कथित तौर पर असहनशीलता दिखाई दे रही है. वो खुद ही सबसे ज़्यादा असहनशील हैं. याद कीजिए, आज़ादी से पहले हम किस तरह अलग-अलग रियासतों में बंटे हुए थे. देश में 500 से ज़्यादा राजा-रजवाड़े और रियासतें थीं. और इस वक्त देश में जिस प्रकार का माहौल पैदा करने की कोशिश की जा रही है. उसे देखकर ऐसा ही लगता है, कि असहिष्णु गैंग एक बार फिर हमें उसी दौर में ले जाना चाहता है. जब हमारा समाज एकजुट नहीं था. और बंटा हुआ था. और इसके लिए असहनशीलता वाला खेल खेला जा रहा है.

सच्चाई ये है, कि सहनशीलता जिसमें नहीं है, वो बहुत जल्दी टूट जाता है. और जिसने सहनशीलता का कवच ओढ़ रखा है. वो जीवन में हर सेकेंड मिल रही चोट के बावजूद और भी मज़बूत होता जाता है. लेकिन ये बात समाज के तथाकथित बुद्धिजीवियों पर लागू नहीं हो सकती है. क्योंकि उनके तन और मन में असहनशील शब्द ने अपना घर बना लिया है. और जिसके मन में नकारात्मक सोच ने कब्ज़ा कर लिया हो, वो लाख कोशिशों के बावजूद सहनशील बातें नहीं कर सकता.