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ZEE जानकारी: उन्नाव रेप पीड़िता की चिट्ठी ने खोला दिया सिस्टम का 'कच्चा-चिट्ठा'!

2 साल पहले जून 2017 में उत्तर प्रदेश के उन्नाव में एक नाबालिग लड़की के साथ रेप की वारदात हुई थी . इस मामले में यूपी के बीजेपी के विधायक कुलदीप सिंह सेंगर मुख्य आरोपी हैं .

ZEE जानकारी: उन्नाव रेप पीड़िता की चिट्ठी ने खोला दिया सिस्टम का 'कच्चा-चिट्ठा'!

इस देश में आतंकवादी याकूब मेमन को फांसी की सजा से बचाने के लिए सेलिब्रिटीज आधी रात को सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाते हैं, लेकिन एक पीड़ित लड़की की चिट्ठी सुप्रीम कोर्ट पहुंचने से पहले ही खो जाती है . 

आज हमारे पहले विश्लेषण को आप देश, समाज, सिस्टम और न्यापालिका के लिए ज़रूरी Open Letter यानी खुलापत्र भी कह सकते हैं . इस विश्लेषण का आधार उन्नाव की पीड़ित लड़की की एक चिट्ठी है . ये चिट्ठी सिस्टम द्वारा सताई गई एक लड़की की कलम से लिखी गई थी . इसमें किसी एजेंडे की महक नहीं थी, इसमें- देश पर खतरा मंडरा रहा है, लोकतंत्र खतरे में है...इस तरह के बड़े बड़े वाक्य नहीं लिखे गए थे . इस चिट्ठी में वोट बैंक की भी कोई गुंजाइश नहीं थी . इसमें सिर्फ जान बचाने की गुहार थी और ये गुहार अदालतों के कामकाज वाले बोझ के तले दबकर रह गई . 

आज से 2 साल पहले जून 2017 में उत्तर प्रदेश के उन्नाव में एक नाबालिग लड़की के साथ रेप की वारदात हुई थी . इस मामले में यूपी के बीजेपी के विधायक कुलदीप सिंह सेंगर मुख्य आरोपी हैं . सेंगर फिलहाल पार्टी से निलंबित हो चुके हैं और इस वक्त सीतापुर की जेल में बंद हैं . इस मामले में पीड़ित लड़की पिछले 2 वर्षों से इंसाफ की लड़ाई लड़ रही है . और इन 2 वर्षों में उसने ये लड़ाई लड़ते-लड़ते.. बहुत कुछ खो दिया है .

इसी महीने की 28 तारीख को जब ये लड़की अपने परिवार के साथ उन्नाव से रायबरेली जा रही थी, तब उसकी कार को एक ट्रक ने टक्कर मार दी . इस दुर्घटना में परिवार की दो महिलाओं की मौके पर ही मौत हो गई . जबकि पीड़ित और उसके वकील को गंभीर हालत अस्पताल में भर्ती कराया गया है . लड़की के परिवार का आरोप है कि ये हादसा नहीं था बल्कि हत्या की साजिश थी . 

पीड़ित लड़की और उसके परिवार ने इसी महीने की 12 तारीख को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को एक चिट्ठी लिखी थी . इस चिट्ठी में लिखा गया था कि आरोपी विधायक के करीबी उन्हें धमकियां दे रहे हैं . चिट्ठी में कहा गया था कि धमकी देने वालों ने केस से जुड़े जज को खरीदने की बात भी कही थी, और परिवार के लोगों को झूठे मुकदमे में फंसाने की धमकी भी दी थी . चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के अलावा इस चिट्ठी की कॉपी.. इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस, उत्तर प्रदेश सरकार के प्रमुख सचिव, उत्तर प्रदेश पुलिस के डीजीपी,और सीबीआई के अधिकारियों को भी भेजी गई थी . 

अब आप सोच रहे होंगे कि जब.. चीफ जस्टिस और बड़े बड़े अधिकारियों को भेजी गई चिट्ठी में इस परिवार ने धमकी का जिक्र कर दिया था.. तो फिर आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई . इसका कारण जानकर आप हैरान रह जाएंगे . ऐसा इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि ये चिट्ठी चीफ जस्टिस तक... वक्त पर पहुंच ही नहीं पाई.

आज जब सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई शुरू हुई तो उस वक्त एक वकील ने इस चिट्ठी का जिक्र किया . इसके बाद चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगोई ने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी मीडिया से मिली है, लेकिन उन तक ये चिट्ठी अभी नहीं पहुंची है . इसके बाद चीफ जस्टिस ने इस मामले में Court Registry से भी जवाब मांगा . अब कल इस चिट्ठी को ही याचिका मानकर इस मामले की सुनवाई की जाएगी . 

यानी रायबरेली में पीड़ित लड़की और उसके परिवार के साथ हुए हादसे से 16 दिन पहले जो चिट्ठी चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को मिल जानी चाहिए थी, वो Court registry में अटकी रह गई . 

ऐसा शायद इसलिए हुआ क्योंकि हमारे देश में गरीब और पीड़ितों की चिट्ठियों में किसी की दिलचस्पी नहीं होती . शायद इसकी वजह ये भी है कि इन चिट्ठियों को लिखने वाले ना तो Celebrities होते हैं और ना ही उनमें किसी को कोई ग्लैमर दिखाई देता है . 

हमारे देश का मीडिया भी सिर्फ अंग्रेज़ी बोलने वाले Celebrities की चिट्ठियों को महत्व देता है . इन डिजाइनर चिट्ठियों पर देश में बहस होती है . लंबे-लंबे लेख छपते हैं . ऐसा माहौल बनाया जाता जैसे ये देश अब रहने लायक ही नहीं है . लेकिन जब कोई रेप पीड़ित इंसाफ की उम्मीद में चिट्ठी लिखती है.. तो ना तो उसकी कोई कद्र करता है ना ही उसे Hashtag बनाकर सोशल मीडिया पर ट्रेंड कराया जाता है .

28 जुलाई को हुए सड़क हादसे के बाद से ही उन्नाव की रेप पीड़ित की हालत बहुत नाजुक बनी हुई है . और फिलहाल लखनऊ के अस्पताल में उसे बचाने की कोशिशें जारी हैं . उसके वकील भी जिंदगी के लिए संघर्ष कर रहे हैं . जबकि हादसे के बाद उसकी चाची और मौसी की मौत हो गई थी .

ये परिवार पिछले 2 वर्षों से इंसाफ की लड़ाई लड़ रहा है. और इस लड़ाई के दौरान ही परिवार के कई लोगों की जान जा चुकी है . तो क्या हमारे देश में इंसाफ की लड़ाई लड़ना अब जानलेवा भी बन गया है ?. क्या हमारे देश में पीड़ितों को मरने के बाद ही इंसाफ मिलता है ? और क्या ऐसा ही उन्नाव की रेप पीड़ित के साथ भी हो रहा है ?

इस लड़ाई में ये लड़की एक साल पहले ही अपने पिता को भी खो चुकी है.  3 अप्रैल 2018 को पीड़ित के पिता ने रेप के आरोपी विधायक के भाई पर मार पिटाई का आरोप लगाया . इसके एक दिन बाद पीड़ित के पिता को ही अवैध हथियारों से जुड़े एक मामले में जेल भेज दिया गया .

9 अप्रैल 2018 को इस लड़की के पिता की पुलिस कस्टडी में मौत हो गई . तब पुलिस पर लड़की के पिता को टॉर्चर करने के आरोप भी लगे थे . यानी हमारे देश में लोग अपनी जान देकर भी इंसाफ हासिल नहीं कर पाते . आम आदमी की कलम से लिखी गई चिट्ठियां दफ्तरों की फाइलों में दब जाती हैं. उन पर धूल जम जाती है.. लेकिन कोई इन शिकायतों की तरफ ध्यान नहीं देता . जबकि डिजाइनर चिट्ठियों को सब हाथों हाथ ले लेते हैं .

उन्नाव रेप केस को लेकर देश में एक बार फिर से बहस छिड़ गई है. कुछ लोग बीजेपी पर अपने विधायक को बचाने का आरोप लगा रहे हैं, तो कुछ लोग इस मुद्दे पर राजनीति कर रहे हैं . आज हमने उन्नाव रेप केस को लेकर आ रहे तमाम बयानों का एक छोटा सा वीडियो विश्लेषण तैयार किया है . आप इस मामले से जुड़े इन बयानों को सुनिए..फिर हम इस केस के दूसरे पहलुओं पर भी बात करेंगे .

केंद्र सरकार ने उन्नाव की रेप पीड़ित के एक्सीडेंट मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी है . लेकिन कल इस मामले को लेकर देश की संसद में भी खूब राजनीति हुई थी . संसद भवन के सामने समाजवादी पार्टी और कुछ अन्य पार्टियों के सांसदों ने विरोध प्रदर्शन किया था . इन सांसदों के हाथों में Posters थे, जिन पर हिंदी में.. भारत शर्मिंदा है और अंग्रेज़ी में India Ashamed जैसे वाक्य लिखे हुए थे . इन पोस्टर्स पर HashTag उन्नाव भी लिखा हुआ था . 

HashTag का इस्तेमाल तब किया जाता है जब किसी खबर को ट्रेंड कराने की कोशिश होती है. ज़ाहिर है कि हमारे देश के कुछ नेता इसे Social Media पर बहस का विषय बनाना चाहते हैं. जबकि सच ये है कि पीड़ित और उसके परिवार में से शायद ही कोई सोशल मीडिया पर हो . इसलिए इन Celebrities और नेताओं को चाहिए कि वो photo opportunity की बजाय पीड़ितों के पास जाकर उन्हे न्याय के अवसर दिलाएं . 

हमारे देश में अंग्रेज़ी बोलने वाले सेलिब्रिटिज़ एक आतंकी को बचाने के लिए तो आधी रात में सुप्रीम कोर्ट चले जाते हैं . एक आतंकी को तत्काल न्याय दिलाने की कोशिश करते हैं . लेकिन उन लोगों की मदद नहीं करते , जो लोग सिस्टम द्वारा सताए जाते हैं . आज जिस चिट्ठी के बारे में हमने आपको बताया है, वो कई अधिकारियों को भेजी गई थी, लेकिन इस चिट्ठी के मिलने की बात सुप्रीम कोर्ट के अलावा किसी ने नहीं मानी है. हो सकता है कि कुछ दिनों के बाद ये चिट्ठी सिस्टम की तमाम फाइलों से हमेशा के लिए गायब हो जाए . 

1993 में दामिनी नामक एक फिल्म आई थी . इस फिल्म में एक लड़की का रेप हो जाता है. जिसे फिल्म की नायिका दामिनी... इंसाफ दिलाने की कोशिश करती है . इस फिल्म में रेप पीड़ित लड़की को जान से मार दिया जाता है. दामिनी और उसके वकील पर भी जानलेवा हमले किए जाते हैं, गवाहों को डराया और धमकाया जाता है. 

आरोप लग रहे हैं कि उन्नाव रेप केस में भी इसी तरह की साजिश की जा रही है, और अदालतों को भी तारीखों के बीच उलझाया जा रहा है . आप दामिनी फिल्म का ये सीन देखिए, फिर हम आपको भारतीय कानून से जुड़े कुछ जरूरी आंकड़े भी दिखाएंगे. .

देश में महिलाओं के साथ होने वाले अपराध लगातार बढ़ रहे हैं.
देश में रोज़ 107 से ज़्यादा बलात्कार होते हैं.
170 से ज़्यादा महिलाओं का अपहरण होता है.
और रोज़ 21 महिलाओं की दहेज के लिये हत्या कर दी जाती है.
और फिर ये अपराध मुक़दमों की शक्ल में अदालत तक पहुंचते हैं.

भारत की अदालतों में काम का बोझ भी इतना ज़्यादा है कि इंसाफ़ का इंतज़ार करते-करते लोग बूढ़े हो जाते हैं. कई बदक़िस्मत ऐसे होते हैं...जिनके केस का फ़ैसला उनकी मौत के बाद आता है.

सुप्रीम कोर्ट में ही क़रीब 60 हज़ार केस Pending हैं...और हर रोज़ इनकी तादाद बढ़ती जा रही है. 
वैसे आज ही केंद्रीय कैबिनेट ने सुप्रीम कोर्ट मे जजों की संख्या को 31 से बढ़ाकर 34 किये जाने को मंज़ूरी दी है.
यानी नई संख्या के हिसाब से अब भी हर जज के पास 1700 से ज़्यादा केस हैं.

आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि जो चिट्ठी उन्नाव की पीड़ित लड़की ने देश के चीफ़ जस्टिस को लिखी...वो कैसे सुप्रीम कोर्ट में काम के इस दबाव के बीच दबी रह गई.

भारत के मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई ने कल दिल्ली में Happiness Education Conference के दौरान कहा था कि अगर देश का बड़ा हिस्सा खुश यानी Happy हो जाए तो फिर अदालतों में Cases की संख्या घट जाएगी . क्योंकि अगर सब खुश होंगे तो कोई किसी पर केस करेगा ही नहीं . 

हम चीफ जस्टिस के इस बयान से पूरी तरह सहमत हैं . और इसका स्वागत करते हैं. देश के सभी लोगों को खुश रहना आना चाहिए . खुशी जीवन की बहुत सारी समस्याओं का हल है . लेकिन देश में खुशी का असली माहौल तभी बन सकता है जब पंक्ति के आखिर में खड़े लोगों को भी न्याय मिले .

देश में असली खुशी तब आएगी जब अंग्रेज़ी बोलने वाले Celebrities ऐसे पीड़ितों के पक्ष में आवाज़ उठाने लगेंगे . हमारे देश के कथित बुद्धिजीवी एक आतंकवादी के लिए आधी रात को सुप्रीम कोर्ट खोलने की अपील कर देते हैं . लेकिन महिलाओं की सुरक्षा की बात करने के लिए कोई आगे नहीं आता . कोई आधी रात में सुप्रीम कोर्ट जाकर ये नहीं कहता कि पीड़ित की जान खतरे में है, 

अंग्रेज़ी बोलने वाली ये हस्तियां अपनी डिजाइनर चिट्ठियों को सोशल मीडिया पर ट्रेंड करा देती हैं . मॉब लिंचिंग पर टीवी Studios में होने वाली बहसों में हिस्सा लेती हैं . और ये पूरा Gang एजेंडा सेट करने में लग जाता है . किसी भी आपराधिक केस में गवाहों की क्या अहमियत होती है, इस बात को हम इसी महीने विधायक कृष्णानंद राय मर्डर केस में आये फ़ैसले को देखकर समझ सकते हैं.

कृष्णानंद राय उत्तर प्रदेश के मोहम्मदाबाद से बीजेपी के विधायक थे. कृष्णानंद और उनके 6 समर्थकों की नवंबर 2005 में ग़ाज़ीपुर में हत्या कर दी गई थी. इस केस में 5 चश्मदीद गवाहों में 2 लोग कृष्णानंद राय के रिश्तेदार थे.

लेकिन 3 जुलाई को इस केस में जब 13 साल बाद फ़ैसला आया...तो आरोपी विधायक मुख्तार अंसारी, सांसद अफ़ज़ाल अंसारी और उनके साथियों को CBI कोर्ट ने बरी कर दिया...क्योंकि सभी गवाह अदालत में उस बयान से पलट गये..जो उन्होंने पुलिस के सामने दिए थे.

इस केस में अपने 478 पेज के फैसले के आखिर में जज अरुण भारद्वाज ने लिखा कि अगर सुनवाई के दौरान चश्मदीदों को सुरक्षा मिली होती तो इस मामले का नतीजा कुछ और होता . उन्होंने लिखा कि भारत की कानूनी प्रक्रिया में गवाहों की सुरक्षा को लेकर हालात दयनीय हो चुके हैं . कई केस ऐसे होते हैं जिनमें गवाह या तो धमकी मिलने की वजह से बयान से पलट जाते हैं...या फिर उन्हें पैसों का लालच दिया जाता है.

IPC के Section 195-A के मुताबिक़ गवाह को धमकाने पर 7 साल तक की सज़ा हो सकती है.
नाबालिग़ से Rape के दोषी आसाराम को पिछले वर्ष उम्र क़ैद की सज़ा मिली थी...इस मामले के 10 गवाहों में से 3 की हत्या कर दी गई थी.

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सरकार Witness Protection Scheme लाई, जिसके तहत गवाहों को सुरक्षा देना ज़रूरी हो गया है. ज़रूरत पड़ने पर उनकी पहचान भी छुपाई जा सकती है. ऐसा पहले नहीं था. अब आपको कुछ ऐसे मामलों के बारे में बताते हैं जिनमें पीड़ितों को मरने के बाद ही इंसाफ मिला .

दिल्ली में अप्रैल 1999 में एक मॉडल जेसिका लाल का मर्डर हुआ था. इस केस में आरोपी मनु शर्मा को Sessions Court ने वर्ष 2006 में बरी कर दिया था...क्योंकि इस केस में 3 चश्मदीद गवाह बयान से पलट गये थे. इसके बाद जब मीडिया ने इस मामले को उठाया...तो ये केस दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा...और फिर वहां से जेसिका लाल को न्याय मिला, इस केस में मनु शर्मा समेत 3 लोग दोषी साबित हुए. मनु शर्मा को उम्र क़ैद की सज़ा मिली थी.

इससे पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा प्रियदर्शनी मट्टू की बलात्कार के बाद हत्या का केस देश की सुर्ख़ियां बना था.
1996 में हुए इस मर्डर में एक IPS अफसर का बेटा संतोष सिंह आरोपी था.
ये केस CBI को दिया गया और जब मामला कोर्ट में पहुंचा...तो मुक़दमे में जो व्यक्ति मुख्य गवाह था...उसे कोर्ट में पेश ही नहीं किया गया. इसी वजह से 1999 में कोर्ट ने संतोष सिंह को बरी कर दिया.
जब हर तरफ़ आलोचना हुई, तो CBI ने हाईकोर्ट में अपील की...और फिर वर्ष 2006 में संतोष सिंह को मौत की सज़ा सुनाई गई.

दिल्ली में दिसंबर 2012 में हुआ निर्भया गैंगरेप और मर्डर केस आपको याद होगा. अदालत में ये मुक़दमा वर्ष 2018 तक चला...जब सुप्रीम कोर्ट ने 4 दोषियों की मौत की सज़ा को बरक़रार रखने का फ़ैसला सुनाया.

यानी भारत में High Profile केस में भी जल्दी और आसानी से न्याय मिलने की गारंटी नहीं होती है. जांच के दायरे से लेकर कोर्ट के गलियारों तक...लोगों को बहुत धक्के खाने पड़ते हैं. और फिर गवाहों की जान को भी ख़तरा बना रहता है. और कई मामलों में तो पीड़ितों को मरने के बाद ही न्याय मिलता है.

भारत का आदर्श वाक्य है... सत्यमेव जयते... अर्थात् सत्य की ही विजय होती है . भारत का हर अच्छा नागरिक... सत्य की जीत होते हुए देखना चाहता है . लेकिन उन्नाव की घटना को देखकर लगता है कि बाहुबली और अपराधी किस्म के लोग सत्य की हत्या कर देते हैं, वो गवाहों को डराते हैं...धमकाते हैं. ऐसे में झूठ जीत जाता है और सच हार जाता है .