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ZEE जानकारी: आखिर किसकी देन है कश्मीर समस्या?

देश के हर नागरिक को कश्मीर की समस्या के बारे में दिलचस्पी लेनी चाहिए और ये समझने की कोशिश करनी चाहिए कि आखिर हमारे देश के नीति निर्माताओं से गलती कैसे हो गई? 

ZEE जानकारी: आखिर किसकी देन है कश्मीर समस्या?

कश्मीर की समस्या आज भारत की एकता और अखंडता के लिए बहुत बड़ा घाव है . ज़ी न्यूज़ ने हमेशा कश्मीर के मामले का बहुत गहराई से अध्ययन किया है. देश के हर नागरिक को कश्मीर की समस्या के बारे में दिलचस्पी लेनी चाहिए और ये समझने की कोशिश करनी चाहिए कि आखिर हमारे देश के नीति निर्माताओं से गलती कैसे हो गई? 

कई विद्वानों ने ये बात स्वीकार की है कि कश्मीर समस्या की वजह देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की गलत नीतियां थीं. पंडित जवाहर लाल नेहरू को Great Prime Minister और Statesman मानने वाले लोग भी ये मानते हैं कि कश्मीर की समस्या पंडित नेहरू की भूलों का नतीजा है . लेकिन कभी किसी ने इस बात पर गहराई से अध्ययन नहीं किया कि आखिर जवाहर लाल नेहरू की सबसे बड़ी भूल क्या थी ? पंडित नेहरू आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री थे . इसलिए उनकी ज़िम्मेदारी भी सबसे ज़्यादा थी.

अगर हम इस बात पर गौर करें कि कश्मीर की समस्या क्यों लगातार उलझती गई तो इसके लिए तत्कालीन भारत सरकार के 3 प्रमुख फैसले ज़िम्मेदार थे . 

पहला गलत फैसला... वर्ष 1947 में जब पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया तो भारत ने कश्मीर की रक्षा के लिए सही समय पर सेना को नहीं भेजा . 

दूसरा गलत फैसला... भारत कश्मीर के मुद्दे को खुद अपनी तरफ से संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गया 

और तीसरा गलत फैसला था... कश्मीर में जनमत संग्रह कराने के लिए तैयार हो जाना और उसका ऐलान करना 

ये तीनों गलत फैसले तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने लिए थे . लेकिन इन तीनों गलत फैसलों के पीछे जो सलाह थी, वो भारत के पहले गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन की थी . 
कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच हुए पहले युद्ध में लॉर्ड माउंटबेटन की भूमिका इसलिए भी संदिग्ध है क्योंकि उस वक्त भारत और पाकिस्तान दोनों देशों की सेनाओं के कमांडर इन चीफ़ अंग्रेज़ थे. लॉर्ड माउंटबेटन दोनों ही सेनाओं के कमांडर इन चीफ़ के संपर्क में थे. यानी युद्ध का परिणाम क्या होगा ये तय करना, लॉर्ड माउंटबेटन के हाथ में ही था . 

भारत की सबसे बड़ी गलती थी. कश्मीर की समस्या को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाना . पंडित नेहरू को ये सलाह भी लॉर्ड माउंटबेटन ने ही दी थी . 

1 जनवरी 1948 को भारत United Nations Security Council पहुंचा और UNSC से कश्मीर मामले का हल निकालने के लिए कहा . 

लेकिन भारत ने ये मामला गलत Chapter के अंतर्गत इस मामले को उठाया था . 

भारत ने Security Council के Chapter Six के Article 35 के तहत ये शिकायत की थी . 

जिसके तहत कोई भी सदस्य देश सुरक्षा परिषद का ध्यान अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए खतरा मानी जाने वाली परिस्थितियों की तरफ आकर्षित कर सकता है. 

सुरक्षा परिषद का Chapter Six दो देशों के बीच हुए विवाद को शांति से सुलझाने की बात करता है. 

लेकिन जानकारों के मुताबिक भारत को सुरक्षा परिषद में Chapter Seven के तहत शिकायत करनी चाहिए थी. 

United Nations के Charter का Chapter Seven उस स्थिति के लिए है, जब कोई देश दूसरे देश पर हमला करता है. और 1947 में यही हुआ था. वर्ष 1947 में पाकिस्तान की सेना ने कश्मीर पर हमला कर दिया था.

शेख अब्दुल्ला की महात्वाकांक्षा भी कश्मीर समस्या के लिए ज़िम्मेदार है .

वर्ष 1947 में जब भारत और पाकिस्तान को आज़ादी मिली तब देश में 565 से ज़्यादा राजा-रजवाड़े और रियासतें थीं . अंग्रेज़ों ने इन सभी को ये छूट दी थी कि वो भारत या पाकिस्तान में से किसी एक देश को चुन सकते हैं . 

उस वक्त कश्मीर रियासत के राजा हरि सिंह थे . वो एक बड़ी मुस्लिम आबादी वाले राज्य के राजा थे . 
आज़ादी से पहले वर्ष 1941 के आंकड़ों के मुताबिक जम्मू और कश्मीर में मुसलमानों की आबादी 72.4 प्रतिशत थी जबकि हिंदुओं की आबादी 25 प्रतिशत थी. कश्मीर की रियासत, भारत और पाकिस्तान के बीच में थी . एक तरफ कश्मीर पर पाकिस्तान के हमले और कब्ज़े का भय था और दूसरी तरफ महाराजा हरि सिंह की महात्वाकांक्षा थी . 

राजा हरि सिंह, कश्मीर को Switzerland जैसा एक अलग देश बनाने का ख्वाब देख रहे थे . 

लेकिन अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान की मदद से काबायलियों ने कश्मीर पर हमला बोल दिया . महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद की अपील की . भारत सरकार ने विलय की शर्त रखी . महाराजा हरि सिंह ने इस शर्त को मान लिया और विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए . 

लेकिन ये विलय भी शर्तों के साथ किया गया था . जम्मू कश्मीर सिर्फ रक्षा, विदेशी मामले और दूरसंचार के मामलों में ही भारत सरकार के हस्तक्षेप के लिए राज़ी हुआ . 

कश्मीर में एक पक्ष, कश्मीर के नेता शेख अब्दुल्ला का भी था . शेख अब्दुल्ला जम्मू कश्मीर के लोकप्रिय नेता थे . खास तौर पर उन्हें जम्मू कश्मीर के मुसलमानों का समर्थन हासिल था . 

मार्च 1948 में महाराजा हरि सिंह ने शेख अब्दुल्ला को कश्मीर का प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया . उस वक्त भारत के संविधान का एक Draft तैयार हो रहा था . शेख अब्दुल्ला को भी संविधान का प्रारूप तैयार कर रही इस संविधान सभा में शामिल किया गया . 

संविधान सभा में कश्मीर पर लंबी बहस हुई . जिसके बाद ये निष्कर्ष निकाला गया कि संविधान के Article 370 के तहत जम्मू कश्मीर को Special Status दिया जाएगा . 

Article 370 की ज़रूरत क्यों पड़ी ? इसकी एक बड़ी वजह थी . पंडित जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला बहुत अच्छे दोस्त थे . शेख अब्दुल्ला पर पंडित जवाहर लाल नेहरू का अच्छा प्रभाव था . लोग ये भी कहते थे कि कश्मीर घाटी में शेख अब्दुल्ला, पंडित नेहरू के आदमी हैं . 

इतिहास के कई विद्वानों का ये मानना है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू इस बात को लेकर काफी भावुक थे कि कश्मीर एक मुस्लिम बहुल इलाका है इसके बाद भी वो भारत में शामिल होना चाहता है . इसलिए कश्मीर को Special Status दिया जाना चाहिए . ताकि कश्मीर के मुसलमानों को सुरक्षा महसूस हो. 

Article 370 के मूल में पंडित जवाहर लाल नेहरू की यही भावना थी. जिसे प्रबल करने का काम उनके राजनीतिक दोस्त शेख अब्दुल्ला ने किया था . 

उस वक्त भी बहुत सारे दक्षिण पंथी लोगों ने पंडित जवाहर लाल नेहरू के इस कदम का विरोध किया था . 

संविधान का प्रारूप तैयार करने वाले भीम राव अंबेडकर भी कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने के पक्ष में नहीं थे. नेहरू सरकार से उनके इस्तीफे की एक वजह ये भी मानी जाती है . लेकिन माना जाता है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू के सिर पर महात्मा गांधी का आशीर्वाद था और उन्हें चुनौती देने वाले लोगों की संख्या बहुत कम थी .

अगर पंडित नेहरू ने सरदार पटेल को भरोसे में लेकर फैसले लिए होते तो आज कश्मीर भारत के लिए समस्या नहीं होता . 

पंडित नेहरू और शेख अब्दुल्ला की दोस्ती ने कश्मीर समस्या को और उलझा दिया . कश्मीर समस्या की वजह से भारत में बहुत बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ, जिसका नेतृत्व श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने किया .

श्यामा प्रसाद मुखर्जी, भारत में कश्मीर का संपूर्ण विलय चाहते थे . 

उनका नारा था, कि एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान नहीं चलेंगे . 

श्यामा प्रसाद मुखर्जी देश की एकता और अखंडता पर ज़ोर देते थे.

और वो कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानते थे . 

श्यामा प्रसाद मुखर्जी वर्ष 1934 से 1938 तक कोलकाता विश्वविद्यालय के कुलपति रहे थे. भारत की आज़ादी के बाद वो पंडित जवाहर लाल नेहरू की सरकार में मंत्री बने और उन्होंने राष्ट्र निर्माण में अपना पूरा योगदान दिया. वो पंडित नेहरु की कैबिनेट में Industry And Supply Minister थे. ये ऐतिहासिक तथ्य है. लेकिन वर्ष 1950 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने पंडित जवाहर लाल नेहरू के मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था. क्योंकि वो पंडित नेहरू की कुछ नीतियों से सहमत नहीं थे.

कहा जाता है कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी आज़ाद भारत के पहले नेता थे, जिन्होंने अपने आदर्शों और उसूलों के लिए सरकार से इस्तीफा दे दिया था. अगर वो चाहते तो वर्षों तक देश के बड़े बड़े पदों पर विराजमान होकर सुख और ऐश्वर्य का जीवन जी सकते थे. जैसा कि आज कल के नेता करते हैं. लेकिन मुखर्जी ने देश की एकता और अखंडता के लिए संघर्ष करने का संकल्प लिया. नेहरू सरकार से इस्तीफ़ा देकर डॉक्टर मुखर्जी ने 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी.

वर्ष 1953 में उन्होंने भारत में पूर्ण विलय के लिए प्रजा परिषद् के आंदोलन का समर्थन किया.

11 मई 1953 को कश्मीर में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बिना परमिट के प्रवेश किया. जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. 

उस ज़माने में जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने के लिए देश के बाकी हिस्सों के लोगों को इजाज़त लेनी पड़ती थी. इसी को परमिट सिस्टम कहते थे. इसके विरोध में गए डॉक्टर मुखर्जी को जम्मू-कश्मीर सरकार ने गिरफ़्तार कर लिया था. 23 जून 1953 को हिरासत में ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी की रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई थी.