ZEE जानकारी: आखिर क्यों वाराणसी से प्रियंका गांधी नहीं लड़ रही है चुनाव?

प्रियंका गांधी वाड्रा को वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कांग्रेस पार्टी का उम्मीदवार क्यों नहीं बनाया गया ? इस सवाल पर कांग्रेस पार्टी के दो नेताओं ने दो अलग-अलग बयान दिए . 

ZEE जानकारी: आखिर क्यों वाराणसी से प्रियंका गांधी नहीं लड़ रही है चुनाव?

और अब हम आपको बताते हैं कि प्रियंका गांधी वाड्रा ने वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव क्यों नहीं लड़ा ?

जब कोई परिवार बहुत लंबे वक्त तक सत्ता में रहता है तो सत्ता उस परिवार के DNA में शामिल हो जाती है . ऐसे परिवारों में अक्सर सत्ता के लिए संघर्ष शुरू हो जाता है . आपने देखा होगा वो सभी पार्टियां जो परिवार के आधार पर खड़ी हुईं . उनमें अक्सर उत्तराधिकार की लड़ाई होती है . 

गांधी परिवार के बारे में कभी ऐसा नहीं कहा गया . लेकिन अब राजनीति में प्रियंका गांधी की Entry के बाद कांग्रेस में भी सत्ता के दो केंद्र बन गए हैं और इसकी वजह से कांग्रेस पार्टी दो गुटों में बंट गई है.

प्रियंका गांधी वाड्रा को वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कांग्रेस पार्टी का उम्मीदवार क्यों नहीं बनाया गया ? इस सवाल पर आज कांग्रेस पार्टी के दो नेताओं ने दो अलग-अलग बयान दिए . प्रियंका वाड्रा के गुट के नेता और उनके करीबी राजीव शुक्ला ने कहा कि प्रियंका गांधी वाड्रा, वाराणसी से चुनाव लड़ना चाहती थीं लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पुराने उम्मीदवार अजय राय को चुनाव लड़वाने का फैसला किया .

लेकिन राहुल गांधी के गुट के नेता और उनके करीबी सैम पित्रोदा ने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष ने ये फैसला प्रियंका गांधी वाड्रा पर छोड़ दिया था और प्रियंका ने खुद चुनाव ना लड़ने का फैसला लिया . कांग्रेस पार्टी के दोनों नेताओं के इन बयानों में विरोधाभास है . इसका मतलब ये है कि पार्टी और परिवार के अंदर सबकुछ ठीक नहीं है . 

आपको याद होगा... कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने इस बात को खूब हवा दी थी कि प्रियंका गांधी वाड्रा बनारस से चुनाव लड़ सकती हैं . प्रियंका वाड्रा भी बनारस से चुनाव लड़ना चाहती थीं . 

28 मार्च को रायबरेली में कांग्रेस पार्टी की एक बैठक हुई जिसमें एक कार्यकर्ता ने प्रियंका गांधी वाड्रा से ये सवाल पूछा था कि आप चुनाव क्यों नहीं लड़तीं ? तब प्रियंका ने जवाब दिया था कि वाराणसी से क्यों नहीं ? 

ये सारी बातचीत Off The Camera हुई थी . पत्रकारिता की भाषा में इसका मतलब है वो बातचीत जो Camera के सामने नहीं हुई यानी उसकी कोई Video Recording मौजूद नहीं है . लेकिन प्रियंका गांधी ने जब ये बात कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से कही उस वक्त वहां हमारे संवाददाता मौजूद थे . और वहीं से ही ये अटकलें लगनी शुरू हो गईं कि प्रियंका वाड्रा, वाराणसी से चुनाव लड़ सकती हैं.

इसके अलावा जब भी प्रियंका गांधी वाड्रा से ये सवाल पूछा गया तो उन्होंने यही जवाब दिया कि अगर कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी फैसला लेंगे तो वो वाराणसी से चुनाव ज़रूर लड़ेंगी . 29 मार्च को अमेठी में, 21 अप्रैल को वायनाड में और 23 अप्रैल को रायबरेली में उन्होंने कहा था कि अगर कांग्रेस के अध्यक्ष कहेंगे तो वो वाराणसी से चुनाव लड़ेंगी . 

यहां आपने एक बात Note की होगी. रायबरेली में जब उनसे ये सवाल पूछा गया कि क्या आप गोरखपुर से चुनाव लड़ेंगी तो उन्होंने साफ-साफ इनकार कर दिया . लेकिन वाराणसी से चुनाव लड़ने के सवाल पर उन्होंने कहा कि कांग्रेस के अध्यक्ष को फैसला करना है . इसका मतलब कहीं ना कहीं प्रियंका गांधी वाड्रा के मन में ये इच्छा मौजूद थी कि उन्हें वाराणसी की High Profile सीट से चुनाव लड़ने का मौका मिलना चाहिए . हम आपको प्रियंका वाड्रा का ये बयान एक बार फिर से सुनवाते हैं . 

पहले वाराणसी से प्रियंका गांधी वाड्रा की उम्मीदवारी को खूब प्रचारित किया गया और बाद में उन्हें वाराणसी से चुनाव लड़ने की अनुमति ही नहीं दी गई . इस पूरे घटनाक्रम से प्रियंका गांधी वाड्रा के समर्थकों का मनोबल टूटा है. अगर कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी नहीं चाहते थे कि प्रियंका, वाराणसी से चुनाव लड़ें तो ये बात पहले ही स्पष्ट कर देनी चाहिए थी . 

कांग्रेस ने सबसे बड़ी ग़लती ये की, उसने प्रियंका गांधी वाड्रा के बनारस से चुनाव लड़ने की अटकलों को पहले दिन से ही ख़ारिज नहीं किया . कांग्रेस पार्टी लगातार ये संकेत देती रही कि प्रियंका बनारस से लड़ भी सकती हैं . खुद प्रियंका गाँधी वाड्रा ने ये स्पष्ट शब्दों में कई बार कहा कि वो बनारस से लड़ने के लिए तैयार हैं, जिससे इस महा-मुक़ाबले को लेकर लोगों की उम्मीदें आसमान छूने लगीं . इतने संकेत देने के बाद चुनाव ना लड़ने के फ़ैसले से ऐसा लगता है, कि कांग्रेस इस महा-मुक़ाबले के लिए हिम्मत नहीं जुटा पाई और उसने बिना लड़े ही आत्मसमर्पण कर दिया .

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आज इस पर व्यंग्य करते हुए कहा है कि राहुल गांधी, केरल के वायनाड चले गए और प्रियंका गांधी ने वाराणसी की उम्मीदवारी छोड़ दी . इस तरह अब दोनों राजनीतिक शरणार्थी बन गए हैं .

बीजेपी के नेता टॉम वडक्कन ने आज कहा है कि राहुल गांधी ने अपने लिए तो एक Safe Seat ढूंढ ली . लेकिन वो अपनी बहन के लिए Safe Seat नहीं ढूंढ पाए . वो गांधी परिवार के करीबी हैं

प्रियंका गांधी वाड्रा का व्यक्तित्व बहुत प्रभावशाली है. उनके अंदर लोगों से सीधे जुड़ने का हुनर है. और उनकी संवाद करने की शैली काफ़ी हद तक उनकी दादी इंदिरा गांधी की याद दिलाती है. भारत की राष्ट्रीय राजनीति ने पिछले पांच-छह वर्षों में नरेंद्र मोदी के अलावा एक भी नया प्रभावशाली चेहरा नहीं देखा है. ऐसे में प्रियंका गांधी वाड्रा का Novelty Factor या नयापन वोटरों को लुभा सकता था . लेकिन गांधी परिवार की मजबूरी ये भी थी कि वो प्रियंका को राजनीति में लाना तो चाहते थे, लेकिन ये भी चाहते थे कि प्रियंका, राहुल गाँधी से चार क़दम पीछे ही रहें. 

वाराणसी में प्रियंका वाड्रा के जीतने की संभावना तो नहीं थी लेकिन अगर वो नरेंद्र मोदी की जीत के अंतर को आधा भी कर देतीं, तो इस हार में भी उनकी जीत हो जाती. लेकिन दूसरा पहलू ये भी है कि अगर ऐसा हो जाता तो प्रियंका गांधी वाड्रा की छवि एक राष्ट्रीय नेता की बन जाती और देश उन्हें नरेंद्र मोदी के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखने लगता . ऐसे में राहुल गांधी का क्या होता ? 

कांग्रेस के हाईकमान को ये मंज़ूर नहीं है . कांग्रेस का हाईकमान यानी यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी और कांग्रेस के अध्यक्ष यानी राहुल गांधी.. शायद ये नहीं चाहते कि प्रियंका गांधी वाड्रा राष्ट्रीय स्तर की नेता बनें . 

जिस दिन कांग्रेस ने प्रियंका गांधी वाड्रा को Launch किया था... उसी दिन राहुल गांधी ने इशारा दिया था कि वो प्रियंका को उत्तर प्रदेश की भावी मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं. इसका मतलब ये है कि पार्टी उन्हें उत्तर प्रदेश तक ही सीमित रखना चाहती है. और चाहती है कि वो 2022 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव की तैयारी करें . और अगर वो जीत गईं तो उन्हें मुख्यमंत्री का पद ईनाम में दिया जाएगा .

अगर कांग्रेस चाहती तो प्रियंका गांधी के प्रभावशाली व्यक्तित्व का लाभ पूरे भारत में उठा सकती थी . लेकिन कांग्रेस ने उन्हें उत्तर प्रदेश की 40-50 सीटों के बीच फंसा दिया है .

आज भी जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी किसी दौरे पर निकलते हैं या उनकी कोई रैली होती है तो पार्टी की पूरी मशीनरी उनके पीछे अपनी पूरी ताक़त लगा देती है . कांग्रेस का सोशल मीडिया विभाग लगातार राहुल गांधी का प्रचार करता है. और उनके Videos को वायरल करता है. लेकिन प्रियंका के मामले में ना तो पार्टी अपनी पूरी ताक़त झोंकती है . और ना ही सोशल मीडिया पर पार्टी उनका प्रचार करती है. इससे प्रियंका ही नहीं कांग्रेस पार्टी को भी नुकसान हो रहा है .