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ZEE जानकारी: क्यों जरूरी है समान नागरिक संहिता

एक तरफ भारत में समान नागरिक संहिता को लेकर बहस चल रही है, जबकि कई देश इस क़ानून को अपने यहां लागू कर चुके हैं.

ZEE जानकारी: क्यों जरूरी है समान नागरिक संहिता

पिछले एक महीने के दौरान देश में बहुत बड़ा बदलाव आ चुका है.
भारत में ट्रिपल तलाक़ के ख़िलाफ़ क़ानून बन चुका है.

अनुच्छेद-370 को हटाकर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख़ को केंद्र शासित प्रदेश बनाया जा चुका है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की सेना को Chief of Defence Staff देने की बात कही है.
ये वो मुद्दे हैं जो नीति और नीयत के अभाव में दशकों से सरकारी फाइलों की तरह धूल खा रहे थे.
अब एक और बड़ा मुद्दा - Uniform Civil Code यानी समान नागरिक संहिता को लेकर देश में बहस शुरू हो गई है.

पहले शिवसेना ने कहा कि मोदी सरकार Uniform Civil Code लाने की तैयारी कर चुकी है. फिर केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो का बयान आया कि सबकी मंशा पूरी होने जा रही है .

फिलहाल देश में हर धर्म के लोग शादी, तलाक़ और ज़मीन जायदाद जैसे मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ के मुताबिक़ करते हैं. मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदाय के अपने पर्सनल लॉ हैं, जबकि हिंदू सिविल Law के तहत हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध आते हैं.

लेकिन समान नागरिक संहिता लागू होने पर देश में सबके लिये एक क़ानून होगा, चाहे वो किसी भी धर्म का क्यों ना हो. जो लोग संविधान में Secular शब्द का हवाला देते हैं...आज वो देश में एक क़ानून वाली व्यवस्था का विरोध कर रहे हैं.

समान नागरिक संहिता एक Secular यानी पंथनिरपेक्ष कानून है...जो किसी भी धर्म या जाति के सभी निजी कानूनों से ऊपर होता है.
अनुच्छेद-44 के तहत संविधान में समान नागरिक संहिता को लागू करना राज्यों की ज़िम्मेदारी बताया गया है, लेकिन ये आज तक गोवा को छोड़कर देश में कहीं लागू नहीं हो पाया है. 

अलग-अलग धर्मों के अलग क़ानून होने से न्यायपालिका पर बोझ पड़ता है. अगर Uniform Civil Code लागू होता है तो अदालतों में वर्षों से चल रहे मुक़दमों के फैसले जल्दी होंगे. शादी, तलाक, गोद लेना और जायदाद के बंटवारे में सबके लिए एक जैसा कानून होगा, फिर चाहे वो किसी भी धर्म का क्यों ना हो.
एक क़ानून होने से देश की राजनीति पर भी असर पड़ेगा. इससे वोट बैंक वाली सियासत कमज़ोर हो जाएगी . 

25 जून को संसद में प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस को उसका इतिहास याद दिलाया था, कि कैसे उसकी सरकारें हमेशा Uniform Civil Code को लागू करने के मुद्दे पर पीछे हट गईं.

Law Commission ने 7 अक्टूबर 2016 को Uniform Civil Code पर लोगों से राय मांगी थी. इसमें 16 सवाल दिये गये थे.
इसके बाद आयोग ने कहा कि अगर मौजूदा Personal Law में सुधार कर दिया जाये...और धार्मिक परंपराओं और मूल अधिकारों के बीच तालमेल बेहतर किया जाये...तो Uniform Civil Code की ज़रूरत नहीं पड़ेगी.

एक तरफ भारत में समान नागरिक संहिता को लेकर बहस चल रही है, जबकि पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, Turkey, इंडोनेशिया, सूडान और Egypt जैसे कई देश इस क़ानून को अपने यहां लागू कर चुके हैं.

इसलिये भारत में Uniform Civil Code लागू नहीं होने से हम वर्षों से संविधान की मूल भावना का अपमान कर रहे हैं..