ZEE जानकारी: परिवार, विवाह और प्रेम की वजह से 38 प्रतिशत लोग करते हैं आत्महत्या

National Crime Records Bureau यानी NCRB की तरफ से जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक भारत में होने वाली कुल आत्महत्याओं में 38 प्रतिशत रिश्तों की वजह से हो रही है . 

ZEE जानकारी: परिवार, विवाह और प्रेम की वजह से 38 प्रतिशत लोग करते हैं आत्महत्या

हमारे देश में कुछ नेता..सत्ता की खातिर अपनी विचारधारा की आत्महत्या कर देते हैं..तो कुछ छात्र गले में फंदा डालकर...आत्महत्या का ड्रामा करते हैं. लेकिन हमारे देश में कोई भी आत्महत्या की असली समस्या की बात नहीं करता...जो महामारी बनती जा रही है .

भगवान बुद्ध ने कहा था कि आप पूरी दुनिया घूमकर में ऐसे व्यक्ति की तलाश कर सकते हैं..जो आपके प्यार का सच्चा हकदार है . लेकिन आपको वो व्यक्ति कहीं मिलेगा नहीं. क्योंकि आप स्वयं अपना प्यार पाने के सबसे बड़े हकदार हैं . यानी जो व्यक्ति खुद से प्यार नहीं कर सकता, वो भला दूसरों को प्रेम कैसे कर सकता है ?

जो लोग अपने जीवन की कद्र नहीं करते..खुद से प्यार नहीं करते और दूसरों द्वारा दिए गए दुख को अपना सबसे बड़ा दर्द समझ लेते हैं . वो कई बार आत्महत्या जैसे कदम भी उठा लेते हैं . हमारे समाज में रिश्तों को, परिवार को और प्यार को जीवन का सबसे बड़ा आधार माना जाता है. लेकिन आपको ये जानकर दुख और पीड़ा का अनुभव होगा कि भारत में होने वाली ज्यादातर आत्महत्याओं के पीछे यही रिश्ते हैं, यही परिवार है, यही रिश्तेदार और यही प्यार है .

यानी हमारा जीवन स्नेह, आदर, प्यार और सम्मान के जिन स्तंभों पर खड़ा है...वो चकनाचूर हो रहे हैं और इन स्तंभों के गिरने से पैदा होने वाला दर्द और दुख का गुबार...लोगों का दम घोंट रहा है. उनकी जान ले रहा है .

National Crime Records Bureau यानी NCRB की तरफ से जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक भारत में होने वाली कुल आत्महत्याओं में 38 प्रतिशत रिश्तों की वजह से हो रही है . यानि परिवार, विवाह और प्रेम मिलकर...38 प्रतिशत आत्महत्याओं का कारण बन गए हैं. ये वो रिश्ते हैं जिनका आधार प्रेम है . यानी जीवन देने वाला प्रेम अब रिश्तों में ज़हर घोलने लगा है .

NCRB के आंकड़ो के मुताबिक आत्महत्या करने वाले 29.2 प्रतिशत लोगों ने पारिवारिक समस्याओं की वजह से अपनी जान दी. जबकि आत्महत्या करने वाले 5.3 प्रतिशत लोग अपने शादी शुदा जीवन से खुश नहीं थे . प्रेम संबंधों के कारण आत्महत्या करने वाले लोगों की संख्या 3.5 प्रतिशत है .

इसके अलावा 17 प्रतिशत आत्महत्याएं उन लोगों ने की, जो बीमारी से तंग आ गए थे. कर्ज़ से परेशान होकर जान देने वाले लोगों की संख्या 2.8 प्रतिशत है, जबकि नशे की आदत की वजह से अपना जीवन समाप्त करने वालों की संख्या 4 प्रतिशत है .

यानी करीब-करीब 40 प्रतिशत आत्महत्याएं टूटते रिश्तों की वजह से हो रही है. वो रिश्ते जिन पर हम सब बहुत गर्व किया करते हैं, वो रिश्ते जो हमें आपस में जोड़कर रखते हैं, वो रिश्ते जो हमारा हाथ मुश्किल वक्त पर भी थाम कर रखते हैं . लेकिन ऐसा लग रहा है कि रिश्तों की मज़बूती वाली ये बातें धीरे धीरे सिर्फ किस्से-कहानियों और किताबों का हिस्सा होकर रह गई है . क्योंकि जिस प्रेम की डोर से ये रिश्ते बंधे होते हैं वही डोर अब आत्महत्या का फंदा बनती जा रही है .यानी लोग परिवार के बीच रहकर भी अपनों का प्यार पाने लिए तरस रहे हैं. लोगों के पास सोशल मीडिया पर अपनी भावनाएं व्यक्त करने का तो समय है , लेकिन अपने परिवार के लोगों की बातें सुनने का और उनसे अपने दिल की बात कह देने का समय नहीं है. लोग Facebook की Wall पर तो सबसे जुड़े रहते हैं लेकिन असल जिंदगी में परिवारों के बीच ही एक ऐसी दीवार खड़ी हो गई है जिसने आपसी समझ, प्रेम, और भावनाएं व्यक्त करने की संभावनाओं को Log Out कर दिया है .

NCRB के मुताबिक भारत में प्रति एक लाख लोगों में ...करीब 10 लोग आत्महत्या कर रहे हैं. NCRB के ये नए आंकड़े वर्ष 2016 के हैं . जिनके मुताबिक उस वर्ष पूरे देश में 1 लाख 31 हज़ार 8 लोगों ने आत्महत्या की . लेकिन World Health Organization यानी WHO के मुताबिक भारत में वर्ष 2016 में 2 लाख 30 हज़ार से ज्यादा लोगों ने आत्महत्या की थी .

WHO की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत में प्रति एक लाख लोगों में... करीब 18 लोग आत्महत्या कर रहे हैं और भारत दक्षिण पूर्वी एशिया की Suicide Capital बन गया है . WHO और NCRB के आंकड़ों में अंतर इसलिए है क्योंकि WHO के मुताबिक भारत में आत्महत्या के बहुत सारे मामलों की Police Report दर्ज ही नहीं होती . जबकि NCRB सिर्फ उन्हीं आंकड़ों को अपने डेटा शामिल करता है...जो पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज होते हैं .लेकिन यहां हमें आंकड़ों में उलझने की ज़रूरत नहीं है..क्योंकि आप चाहें तो किसी भी आंकड़े को सच मान लें..लेकिन इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि भारत में आत्महत्या एक महामारी बनने की तरफ बढ़ रही है .

महान सूफी दार्शनिक रूमी ने कहा था कि Wound is the place where light enters you . यानी जीवन से मिला दर्द का घाव उस दरवाज़े की तरह है..जहां से सच की रोशनी भीतर प्रवेश करती है. जीवन के कड़वे अनुभव आपको स्वयं के करीब लाते हैं और आपके रूपांतरण का मार्ग प्रशस्त करते हैं.

यानी आपको दर्द चाहे आपके अपनों से ही क्यों ना मिले हो...उससे हार मानने की ज़रूरत नहीं है...क्योंकि यही दर्द आपके जीवन की दवा भी बन सकता है . और आपके सुखद भविष्य की नींव भी रख सकता है .

NCRB के मुताबिक.. सबसे ज्यादा आत्महत्या महाराष्ट्र में हुई है . वर्ष 2016 में ....पूरे देश में जितने लोगों ने आत्महत्या की, उनमें 13 प्रतिशत महाराष्ट्र से थे . जबकि दूसरे नंबर पर तमिलनाडु और तीसरे नंबर पर पश्चिम बंगाल है . हैरानी की बात ये है कि वर्ष 2014 और 2015 में भी इन राज्यों की यही Ranking थी .

इससे एक बात तो साफ है कि इन राज्यों में रहने वाले लोगों के साथ जीवन में कुछ तो ऐसा घट रहा है जिसकी वजह से यहां रहने वाले लोग सबसे ज्यादा आत्महत्या कर रहे हैं . लेकिन आत्महत्याओं के मामलों में जो बात सबसे ज्यादा चौकाने वाली है वो ये कि ज्यादातर आत्महत्याएं शादी-शुदा लोग कर रहे हैं . NCRB के मुताबिक भारत में की गई कुल आत्महत्याओं में 67 प्रतिशत आत्महत्याएं उन लोगों ने की है जो शादी-शुदा थे .

यानी भारत में पति-पत्नी के जिस रिश्ते को सबसे पावन, सबसे भावनात्मक और सबसे मज़बूत माना जाता है . वही रिश्ता आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह बन गया है . ये वो रिश्ता है जिसे स्थापित करते वक साथ फेरों के साथ.. सात जन्मों तक संग रहने के वादे किए जाते हैं . कई कसमें खिलाई जाती हैं . और तमाम रस्मो रिवाज़ के बाद..लोग शादी-शुदा जीवन में प्रवेश करते हैं .

लेकिन आजकल के युग में ये रिश्ते धीरे-धीरे रिसने लगते हैं और इनमें इतनी कड़वाहट आ जाती है कि लोग एक दूसरे के साथ एक पल भी खुशी के साथ गुज़ारने को तैयार नहीं हैं . कई बार जो रिश्ता लोगों को दिल से कबूल होता है वो अचानक तलाक, टकराव और अलगाव में बदल कर.. नामंज़ूर हो जाता है . आपको जानकर हैरानी होगी कि जो लोग अपने जीवन साथी से अलग हो गए हैं..

या जिनका तलाक हो गया है ..उनमें से सिर्फ 0.8 प्रतिशत लोगों ने आत्महत्या की . अब आप खुद सोचिए कि हमारे घरों में और समाज में आखिर ऐसा क्या हो रहा है कि लोग साथ रहकर ज्यादा दुखी हैं और अलग रहकर ज्यादा खुश .

शायद ये पतन इसलिए हो रहा है क्योंकि लोग एक दूसरे के जीवन पर ज़रूरत से ज्यादा अधिकार जमाना चाहते हैं . कोई किसी को निजता यानी privacy का अधिकार नहीं देना चाहता . कोई किसी को Space नहीं देना चाहता और लोग हमेशा एक दूसरे पर हावी होना चाहते हैं और एक दूसरे नियंत्रित करके रखना चाहते हैं .

महान कवि और दार्शनिक खलील जिब्रान ने कहा था कि... प्रेम केवल खुद को ही देता है और खुद से ही पाता है| प्रेम किसी पर अधिकार नहीं जमाता और न ही किसी के अधिकार को स्वीकार करता है| प्रेम के लिए तो प्रेम का होना ही बहुत है कभी ये मत सोचो कि तुम प्रेम को रास्ता दिखा रहे हो या दिखा सकते हो, क्योंकि अगर तुम सच्चे हो तो प्रेम खुद तुम्हे रास्ता दिखायेगा .

यानी असली रिश्ते और असली प्रेम वो हैं जहां आपको Joy Of Giving का एहसास होता है..यानी जब आप दूसरों को सुख देते हैं तो आपको खुशी मिलती है . लेकिन अब ऐसा लगता है कि लोग सिर्फ दूसरों से कुछ ना कुछ हासिल करना चाहते हैं . इसलिए लोगों ने प्रेम को भी एक कारोबार में बदल दिया है, जहां इच्छाओं के आदान-प्रदान की कीमत रिश्ते चुका रहे हैं .

संबंधों में कड़वाहट घुल गई है और कभी मुश्किल वक्त में काम आने वाले..रिश्तेदार ही आज नफरत के सूत्रधार बन गए हैं.

भारत की संस्कृति को प्रेम की संस्कृति कहा जाता है . भावनाएं हमारी सभ्यता का आधार रही हैं और हमारे समाज में तो प्रेम के मार्ग को मुक्ति का मार्ग भी कहा गया है. कृष्ण के प्रेम में पड़ी मीरा हों या सूरदास . या फिर माता-पिता के प्रति.. श्रवण कुमार की अटूट श्रद्धा..इन सबने हमें सिखाया है कि जीवन में प्रेम से बढ़कर कुछ नहीं है.

लेकिन आज रिश्तों को जोड़ने वाले प्रेम के पुल टूट रहे हैं . प्रेम की वजह से लोगों की जान जा रही है . इसलिए आज हमने इस समस्या को करीब से समझने के लिए एक विश्लेषण किया है . ये विश्लेषण देखकर आप समझ जाएंगे कि.. क्यों रिश्तों में आए मनमुटाव को आत्महत्या का नहीं बल्कि आत्मविश्लेषण का कारण बनाना चाहिए .

जैसा कि आपने हमारे विश्लेषण में भी देखा कि जो वानप्रस्थ आश्रम कभी भारतीय संस्कृति की पहचान हुआ करता था . वो अब दूषित वानप्रस्थ में बदल चुका है. पहले लोग अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को अच्छी तरह से निभा लेने के बाद...जंगल में चले जाया करते थे और ध्यान और साधना में जुट जाते थे और राम का नाम जपते थे . लेकिन अब लोग रिश्तों को ही राम-राम कहने लगे हैं .

हमारे घरों के बुजुर्ग अक्सर कहते हैं कि समय का सदुपयोग करना चाहिए और परिवार को भी ढेर सारा समय देना चाहिए . लेकिन क्या आप..अपने परिवार को, अपने रिश्तों को वक्त देते है ?..आप में से बहुत सारे लोग आज भी DNA देखने के बाद...सोने चले जाएंगे और हो सकता है कि उस दौरान भी, आप अपना Mobile Phone साथ रखते हों और सोने से पहले लगातार Social Media की हलचल का अपडेट लेते हों . लेकिन इन सबके बीच क्या आपने कभी सोचा है कि आप अपने परिवार के साथ कितना वक्त बिताते हैं ?

आप को जानकर हैरानी होगी..लेकिन सच यही है कि आप आज की स्थिति में अपने परिवार को 29 मिनट भी वक्त नहीं दे पा रहे हैं . जब हमने शहरों में रहने वाले एक आम भारतीय की दिनचर्या को समझने की कोशिश की..तो हमें ये हैरानी भरे आंकड़े हासिल हुए .

CMR India के एक सर्वे के मुताबिक Smart Phones इस्तेमाल करने वाले ज्यादातर भारतीय प्रतिदिन 2 से 6 घंटे का वक्त Mobile Phones इस्तेमाल करते हुए ही बिताते हैं . ये 24 घंटे का 25 प्रतिशत वक्त है . इसी तरह अगर एक आम भारतीय की औसत नींद 8 घंटे मान ली जाए तो ये 24 घंटे का 33 प्रतिशत है .

MoveI n Sync नामक IT कंपनी द्वारा किए गए सर्वे के मुताबिक एक औसत भारतीय दिन भर में 7 प्रतिशत वक्त ऑफिस तक का सफर तय करते हुए बिताता है . यानी करीब 2 घंटे .इसके अलावा काम-काज पर जाने वाले लोगों को करीब 8 घंटे यानी दिन भर का 33 प्रतिशत समय ऑफिस में भी बिताना होता हैं .

ये सब मिलाकर परिवार के साथ बिताने के लिए सिर्फ 2 प्रतिशत यानी 29 मिनट का समय बचता है . आपने ठीक सुना सिर्फ 29 मिनट . लेकिन बहुत सारे लोग इन 29 मिनटों के दौरान भी परिवार के साथ वक्त नहीं बिता पाते . या तो वो फोन पर किसी से बात कर रहे होते हैं, या फिर TV देख रहे होते हैं, या अपने Mobile Phones को चेक कर रहे होते हैं .

अब आप खुद अंदाज़ा लगाइये कि जिस समाज में लोगों के पास अपने दिल की बात कहने का वक्त नहीं है और दूसरों के दिल की बात सुनने का भी वक्त नहीं है..वो समाज कैसे खुश और सुखी रह सकता है . पति-पत्नी- पिता-पुत्र, मां-बेटी और भाई-बहनों के रिश्तों को हमारे समाज और संस्कृति में सबसे मजबूत रिश्ता माना जाता है .

लेकिन अपेक्षाओं की नदी में रिश्तों की ये नाव डूब रही है और हम इसके लिए कुछ नहीं कर पा रहे हैं, लोग रिश्तों से तंग आकर आत्महत्या जैसे कदम उठा रहे हैं .यहां ये बात भी समझनी चाहिए..कि भारत धीरे धीरे आर्थिक रूप से तरक्की कर रहा है और इसलिए भी भारत में आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं.

दुनिया के विकसित देशों में आत्महत्या की दर बहुत ज्यादा है. अमेरिका में प्रति एक लाख लोगों में से 21 आत्महत्या कर लेते हैं तो कोरिया में ये आंकड़ा करीब 40 का है . ये दोनों देश आर्थिक रूप से समृद्ध हैं और यहां रहने वाले लोगों को कम से दाल रोटी की तो चिंता नहीं करनी पड़ती . जबकि भारत मूल रूप से एक गरीब देश रहा है.

जहां लोगों के सामने रोटी-कपड़ा और मकान सबसे बड़ी समस्या हैं. लेकिन जैसे-जैसे ये समस्याएं हल हो रही हैं..भारत के लोगों में आत्महत्या की प्रवत्ति बढ़ रही है . जब लोग समृद्ध हो जाते हैं तब उन्हें इन छोटी-छोटी बातों की चिंता नहीं करनी पड़ती और कई बार उनके मन में नकारात्मक विचारों के लिए खूब सारी जगह बन जाती है.

इसलिए कहते हैं कि खाली दिमाग शैतान का घर हो जाता है . और इसी खाली दिमाग में महत्वकांक्षाएं, अकेलापन और तनाव..स्थायी मेहमान बन जाते है . और महत्वकांक्षाओं और हकीकत के बीच का अंतर...लोगों को आत्महत्या के रास्ते पर धकेल देता है .

स्वतंत्रता और निजता किसी भी रिश्ते की प्राण-वायु होती है इसलिए हर रिश्ते को निभाते हुए निजता और स्वतंत्रता का सम्मान ज़रूर किया जाना चाहिए . और आखिर में आप ये भी याद रखिए कि महान पुरुष ना तो किसी को अपने अधीन रखना पसंद करते हैं और ना ही खुद किसी के अधीन रहना पसंद करते हैं . इसलिए आत्महत्या वाले विचारों की गुलामी छोड़कर...लोगों को सच्चे दिल से प्रेम कीजिए और इस बात की कोई आकांक्षा मत पालिए कि इसके बदले में आपको क्या मिल रहा है.