ZEE जानकारी: शरद पवार ने CM बनने के लिए अपने राजनीतिक गुरु की पार्टी से तोड़ लिया था नाता

आज NCP के तीन नेता शरद पवार, अजित पवार और प्रफुल्ल पटेल की कानूनी मुसीबतों के बारे में भी जानना जरूरी है 

ZEE जानकारी: शरद पवार ने CM बनने के लिए अपने राजनीतिक गुरु की पार्टी से तोड़ लिया था नाता

आज आपको पवार परिवार की फैमली ट्री भी ज़रूर देखनी चाहिए. शरद पवार के पिता का नाम गोविंद पवार और माता जी का नाम शारदा पवार है. गोविंद पवार के 5 बच्चे थे. जिसमें शरद पवार तीसरे नंबर के बेटे हैं. शरद पवार के 3 भाई और 1 बहन थी. शरद पवार अपने परिवार से राजनीति में आने वाले पहले व्यक्ति हैं. आज शरद पवार जिस अजित पवार की वजह से कष्ट में हैं वो उनके बड़े भाई अनंत पवार के बेटे हैं. अनंत पवार के 3 बेटों में अजित पवार दूसरे नंबर के बेटे हैं. अजित पवार के अलावा शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले भी राजनीति में हैं और पवार परिवार की तीसरी पीढ़ी के 2 सदस्य भी चुनावी राजनीति में उतर चुके हैं.

जिसमें शरद पवार के सबसे बड़े भाई अप्पा साहेब के पोते रोहित पवार कर्जत-जामखेड से विधायक हैं. जबकि अजित पवार के बेटे पार्थ पवार 2019 लोकसभा चुनाव मवाल से हार गए थे.शपथग्रहण के बाद अब मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस के पास विधानसभा में बहुमत सिद्ध करने की चुनौती है. महाराष्ट्र विधानसभा में 288 सीटें हैं और बहुमत का आंकड़ा 145 है. विधानसभा चुनाव के नतीजों में बीजेपी को 105 सीटें मिली हैं. बीजेपी को समर्थन कर रहे अजित पवार के साथ 12 विधायक हैं और इन 12 विधायकों में अजित पवार भी शामिल हैं. बीजेपी ने निर्दलीय और अन्य छोटी पार्टियों के 23 विधायकों के समर्थन का भी दावा किया है.

बीजेपी गठबंधन के पास कुल मिलाकर 140 विधायकों का समर्थन है. जो बहुमत के लिए जरूरी 145 सीटों से 5 कम हैं. लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या अजित पवार. NCP को तोड़कर अलग पार्टी बनाएंगे? दल बदल विरोधी कानून के तहत ऐसा करने के लिए उन्हें NCP के दो तिहाई विधायकों के समर्थन की जरूरत होगी. महाराष्ट्र विधानसभा में NCP के 54 विधायक हैं.

और अलग पार्टी बनाने के लिए अजित पवार को 36 विधायकों का समर्थन चाहिए.अगर अजित पवार 36 या इससे अधिक NCP विधायकों का समर्थन हासिल कर लेते हैं तो उन्हें नई पार्टी बनाने में कोई मुश्किल नहीं होगी. लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाए तो NCP के सभी बागी विधायकों की सदस्यता खत्म हो सकती है. आज शिवसेना के प्रवक्ता संजय राउत की चर्चा भी जरूरी है.

उद्धव और आदित्य ठाकरे को सीएम बनाने की कोशिशों में संजय राउत खुद को किंगमेकर मानते रहे हैं. पिछले करीब एक महीने से वो महाराष्ट्र में शिवसेना का मुख्यमंत्री बनाने का दावा कर रहे हैं. कहा जा रहा है कि शिवसेना की उम्मीदों पर यही अति आत्मविश्वास भारी पड़ गया. शिवसेना और बीजेपी के रिश्तों में कड़वाहट पर संजय राउत लगातार शेर लिखकर ट्वीट करते रहे हैं... आज NDA गठबंधन के नेता रामदास अठावले ने उन्हें शेरो शायरी वाले अंदाज में ही जवाब दिया है

आज NCP के तीन नेता शरद पवार, अजित पवार और प्रफुल्ल पटेल की कानूनी मुसीबतों के बारे में भी जानना जरूरी है .सितंबर 2019 में प्रवर्तन निदेशालय ने शरद पवार और अजित पवार के ख़िलाफ़ मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया था. मनी लॉन्ड्रिंग का ये केस महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव बैंक में 25 हज़ार करोड़ रुपये घोटाले के आरोप में दर्ज किया गया था.

ED ने महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव बैंक घोटाले के आरोप में प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत NCP अध्यक्ष शरद पवार और अजित पवार के ख़िलाफ़ ECIR मतलब Enforcement Case Investigation Report दर्ज की, जिसकी मान्यता FIR के बराबर ही होती है.

ED का आरोप है कि महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव बैंक से ग़लत तरीके से लोन दिए गए...ये लोन कोऑपरेटिव सुगर फैक्टरीज़ को दिए गए थे. फिलहाल बैंक घोटाले के इस केस की जांच ED कर रहा है.

NCP नेता प्रफुल्ल पटेल के ख़िलाफ़ दो कानूनी मामले हैं. पहला केस प्रवर्तन निदेशालय ने अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के साथी इकबाल मिर्ची से जुड़े जमीन के समझौते पर प्रफुल्ल पटेल के खिलाफ़ दर्ज किया है. दूसरा केस ED ने प्रफुल्ल पटेल पर Air India profitable seat sharing deal पर हुए घोटाले पर दर्ज किया है. प्रफुल्ल पटेल पर दर्ज दोनों ही मामलों की जांच प्रवर्तन निदेशालय कर रहा है.

राजनीति के इस महामुकाबले में कौन विजेता बना और कौन फिसड्डी..अब ये आपको बताते हैं. सत्ता की बाज़ी शिवसेना के हाथ से निकल चुकी है और वो राजनीति की रेस का सबसे फिसड्डी खिलाड़ी बन गई है. शिवसेना की ना सिर्फ सारी चालें फेल हो गईं..बल्कि उसने अपना आधार भी खो दिया है. कांग्रेस से हाथ मिलाकर शिवसेना ने अपनी मराठी मानुष और हिंदुत्व वाली छवि का भी नुकसान कर लिया है.

शिवसेना के बाद..सबसे ज्यादा नुकसान NCP का हुआ है. शिवसेना ने तो सिर्फ सत्ता खोई है..लेकिन NCP के नेताओं ने तो पूरी की पूरी पार्टी ही खो दी है. NCP दो हिस्सों में बंट चुकी है और शरद पवार के परिवार में भी फूट पड़ गई है. राजनीति की इस दौड़ की तीसरी सबसे बड़ी Looser कांग्रेस है. कांग्रेस की छवि एक बार फिर सुस्त, Confused और फैसले ना लेने में सक्षम. पार्टी की बन गई है. कांग्रेस ने एक बार फिर अपना राजनीतिक चेहरा खो दिया है.

बीजेपी राजनीति के इस मुकाबले में एक विजेता बनकर उभरी है. जिसके पास फिलहाल सत्ता भी है. जनाधार भी. और हारी हुई बाज़ी पलटने में माहिर नेता भी. बीजेपी ने एक बार फिर साबित किया है कि वो जब चाहे...अपने विरोधियों को सरप्राइज़ दे सकती है और उसके अगले कदम के बारे में पता करना बहुत मुश्किल है.

बीजेपी अब एक ऐसी पार्टी बन गई है जहां से खबरों को Leak कराना आसान नहीं है और इसी गोपनीयता ने बीजेपी को बार बार दूसरों से आगे रखा है. शरद पवार एक ऐसे नेता हैं जिन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस पार्टी से की. लेकिन दो बार उनके फैसले कांग्रेस पार्टी के ही खिलाफ रहे हैं.

पहली बार. वर्ष 1999 में शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर ने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने का विरोध किया. तब ये तीनों नेता कांग्रेस पार्टी के सदस्य थे. और इन्होंने सोनिया गांधी के विदेशी मूल का होने की वजह से विरोध किया था. इसके बाद इन तीनों नेताओँ को कांग्रेस पार्टी से निकाल दिया गया था और इन्होंने मिलकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बनाई थी.

41 वर्ष पहले 1977 के आम चुनाव के बाद कांग्रेस पार्टी. कांग्रेस(यू) और कांग्रेस (आई) में बंट गई थी. तब शरद पवार कांग्रेस (यू) में शामिल हुए थे. वर्ष 1978 में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में इन दोनों पार्टियों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था. चुनाव के बाद जनता पार्टी को रोकने के लिए इन्होंने मिलकर सरकार बनाई थी. कुछ ही महीनों बाद शरद पवार ने कांग्रेस (यू) को भी तोड़ दिया और जनता पार्टी के समर्थन से मुख्यमंत्री बन गए थे. सिर्फ 38 साल की उम्र में. पवार महाराष्ट्र के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बने थे.

तब शरद पवार ने मुख्यमंत्री बनने के लिए अपने राजनीतिक गुरु यशवंतराव चव्हाण की पार्टी को तोड़ दिया था. और आज शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने उप मुख्यमंत्री बनने के लिए उनके साथ यही काम किया है. आप कह सकते हैं कि समय का चक्र पूरा हो गया है. और जो काम शरद पवार ने करीब 4 दशक पहले किया था..

आज उनके साथ भी वही दोहराया गया है . हमारे देश की राजनीति में भी गुरु..शिष्य की परंपरा रही है... लेकिन ये कलियुग है इसमें शिष्य गुरुदक्षिणा में अपना अंगूठा नहीं देता है... बल्कि अपना मतलब निकालने के लिए गुरु के पद पर ही कब्जा कर लेता है .