Zee Jaankari: एक महानायक की कहानी, जिसने जिंदगी और मौत के फासले को मिटा दिया

ज़िंदगी चुनौतियों का नाम हैं,कुछ लोग ऐसे होते हैं जो चुनौतियों के आगे बिखर जाते हैं ,जबकि कुछ लोग इन चुनौतियों से संघर्ष करते हुए महानायक बन जाते हैं .

Zee Jaankari: एक महानायक की कहानी, जिसने जिंदगी और मौत के फासले को मिटा दिया

ज़िंदगी चुनौतियों का नाम हैं,कुछ लोग ऐसे होते हैं जो चुनौतियों के आगे बिखर जाते हैं ,जबकि कुछ लोग इन चुनौतियों से संघर्ष करते हुए महानायक बन जाते हैं .हमारा ये विश्लेषण आपको ज़िंदगी में कभी हार ना मानने की प्रेरणा देगा . आध्यात्मिक गुरु ओशो ने कहा था कि जीवन ऐसे जीना चाहिए...जैसे आप अभिनय कर रहे हों...और अभिनय ऐसे करना चाहिए जैसे आप जीवन जी रहे हों . किसी फिल्म की तरह जीवन में भी उतार चढ़ाव आते रहते हैं . इंटरवल आता है और Climax भी आता है . बस फर्क सिर्फ इतना है कि फिल्मों में ये सब एक क्रम में होता है...एक Script के अनुसार होता है, लेकिन जीवन की चुनौतियां किसी Script से बंधी नहीं होती हैं .

हिंदी फिल्मों के महानायक के तौर पर लोकप्रिय अमिताभ बच्चन का जीवन भी किसी फिल्म की तरह है . इसलिए आज हम उनके जीवन को आधार बनाकर एक ग़ैर फिल्मी DNA टेस्ट करेंगे . हम इसे ग़ैर फिल्मी विश्लेषण इसलिए कह रहे हैं क्योंकि इसमें हम अमिताभ बच्चन की Filmography नहीं, बल्कि उनके जीवन के पीछे छिपी Philosophy यानी दर्शन की बात करेंगे .

अमिताभ बच्चन को भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान..दादा साहेब फाल्के पुरस्कार के लिए चुना गया है . संयोग की बात ये है कि अमिताभ बच्चन का फिल्मी करियर और दादा साहेब फाल्के अवार्ड की शुरुआत एक साथ 1969 में हुई थी . इस सम्मान तक पहुंचने के लिए अमिताभ बच्चन ने कठिन परिश्रम किया है . हर बार खुद की प्रासंगकिता साबित की है .

अमिताभ बच्चन ख़ुद को निरंतर बदलते रहे हैं . वो अपने जीवन में शारीरिक, आर्थिक और पारिवारिक चुनौतियों से कभी घबराए नहीं...और इसलिए अमिताभ बच्चन...सिनेमा के साथ साथ ज़िंदगी के भी महानायक बन गए . हमने आपको अमिताभ बच्चन की जीवन यात्रा समझाने के लिए अब तक बच्चन नाम का एक ग्राफ़ भी तैयार किया है . ये ग्राफ देखकर आपको समझ आएगा कि नायक बनने की यात्रा कितने उतार-चढ़ाव से होकर गुज़रती है . इस ग्राफ में जो हरी लाइन है..वो आपको अमिताभ बच्चन की सफलता की कहानी बताती है .

जो लाल लाइन है..वो उनके जीवन में आए मुश्किल वक़्त को दर्शाती है और वर्ष 1982 के पास जो स़फ़ेद लाइन आप देख रहे हैं वो कुली फिल्म की शूटिंग के दौरान हुए उस हादसे को दर्शाती है जिसने अमिताभ का जीवन हमेशा के लिए बदल दिया . आप इसे अमिताभ का पुनर्जन्म भी कह सकते हैं और उनके जीवन को इस चोट के पहले और चोट लगने के बाद दो भागों में बांटकर भी देख सकते हैं .

अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म सात हिंदुस्तानी' वर्ष 1969 में रिलीज़ हुई थी . यानि अमिताभ बच्चन अभिनय की दुनिया में 50 वर्षों का सफर तय कर चुके हैं . अमिताभ को वर्ष 1971 में आई फिल्म आनंद से पहचान मिली . अमिताभ इस फिल्म में सह अभिनेता थे . यानी वो इस फिल्म के Lead Actor नहीं थे .

इस फिल्म के Lead Actor उस वक़्त के सुपर स्टार राजेश खन्ना थे . जीवन में भी नायक बनने से पहले आपको कई लोगों के साथ मंच साझा करना पड़ता है . यानी Co-Existence की यही भावना आपको सफलता के शिखर पर लेकर जाती है... जो लोग जीवन में दूसरों का Space नहीं छीनते, और ख़ुद अपना मुक़ाम बनाते हैं वो महानायक बन जाते हैं . वर्ष 1973 में अमिताभ बच्चन की फिल्म ज़ंजीर रिलीज हुई थी . इसमें वो एक पुलिस इंस्पेक्टर के रोल में थे...जो भ्रष्टाचार और समाज की बुराई के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ता है .

इसके बाद दीवार..मुकद्दर का सिकंदर और त्रिशूल जैसी फिल्मों में अमिताभ Angry Young Man के रोल में नज़र आए . अमिताभ साधारण चेहरे मोहरे वाले अभिनेता थे..एक ऐसा हीरो जो देखने में हीरो नहीं लगता था.. लेकिन दुबला पतला, लंबा शरीर और आवाज़ ही उनकी पहचान बन गई . वर्ष 1974 में भारत में जेपी आंदोलन की शुरुआत हो चुकी थी .

देश का युवा ग़ुस्से में था . भ्रष्टाचार, अपराध , महंगाई और बेरोज़गारी चरम पर थी . अमिताभ सिनेमा के पर्दे पर युवाओं के इसी ग़ुस्से और खीझ का प्रतीक बन गए . फिल्मी पर्दे पर उनकी लड़ाई को देश के युवाओं ने अपनी लड़ाई बना लिया और जो कुंठा सड़कों पर प्रदर्शन, नारेबाज़ी और तोड़फोड़ के ज़रिए निकल रही थी, वो Cinema Halls में अमिताभ के एक्शन और Dialouges को सुनकर तालियों में बदल गई.

अमिताभ बच्चन का Angry Young Man वाला अवतार हमें ये बताता है कि जब भी कोई काम शुरू करें.. किसी अभियान की शुरुआत करें...तो ये ध्यान में ज़रूर रखें कि सामाजिक ताना बाना कैसा है . सामाजिक ताने बाने की सही समझ, उस पर की गई गहन रिसर्च ही आपको भीड़ से अलग बनाती है . वर्ष 1975 में आई अमिताभ की शोले ने सफलता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए .

शुरुआत में इस फिल्म ने Box Office पर कुछ ख़ास कमाई नहीं की थी . लेकिन फिर धीरे धीरे इस फिल्म को देखने लिए सिनेमा घरों में लोगों की कतारें लगने लगीं और अमिताभ बच्चन उस वक्त देश के सबसे बड़े स्टार के तौर पर स्थापित हो गए . हमने उस दौर की अमिताभ बच्चन की फिल्मों के कुछ दृश्य और Dialogues आज आपके लिए निकालें है .

ये Dialogues सुनकर आपको समझ आ जाएगा कि उस दौर में अमिताभ सिर्फ फिल्मों में एक्टिंग नहीं कर रहे थे . बल्कि मध्यम वर्ग के गुस्से, अभिलाषाओं और आकांक्षाओं को व्यक्त भी कर रहे थे . आनंद फिल्म में अमिताभ बच्चन को मौका देने वाले हिंदी फिल्मों के प्रसिद्ध डायरेक्टर ऋषिकेश मुखर्जी कहा करते थे कि ज़िंदगी लंबी नहीं...

बड़ी होनी चाहिए . यानी व्यक्ति का लक्ष्य लंबी उम्र नहीं.. बल्कि सार्थक जीवन होना चाहिए . वर्ष 1982 में अमिताभ बच्चन के जीवन में भी एक ऐसी ही चुनौती आई . कुली फिल्म की शूटिंग के दौरान उन्हें जानलेवा चोट लग गई . इसके बाद अमिताभ की जिंदगी में कैसे एक के बाद एक खलनायकों की एंट्री हुई . ये हम आपको आगे बताएंगे लेकिन पहले कुली फिल्म का वो सीन देखिए...जिसने अमिताभ बच्चन की जिंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया. जब फिल्म में इस Scene को शामिल किया गया तो इसे कुछ Seconds के लिए Pause कर दिया गया . और इस पर लिखा गया कि इसी Scene के दौरान अमिताभ बच्चन को चोट लगी थी .

लेकिन चोट से उबरने की प्रकिया अमिताभ के लिए आसान नहीं थी . चोट लगने के बाद..अमिताभ का इलाज मुंबई के एक अस्पताल में शुरू हुआ . ऐसा कहा जाता है कि इलाज के दौरान डॉक्टरों को लगा कि कुछ मिनटों के लिए अमिताभ बच्चन Clinically dead हो गए हैं . लेकिन देश भर में उनके जल्द स्वस्थ होने के लिए दुआएं मांगी जा रही थी .

जिसका असर हुआ और अमिताभ बच्चन का एक तरह से पुनर्जन्म हो गया . हालांकि इस दौरान वो आंतों के संक्रमण का भी शिकार हो गए . लेकिन कहते हैं किसी की जान बचाने के लिए की गई प्रार्थनाएं व्यर्थ नहीं जाती . अमिताभ बच्चन धीरे धीरे स्वस्थ होने लगे और फिल्मों में वापसी की तैयारी में जुट गए . यानी जीवन में कई बार कुछ पल ऐसे आते हैं जब जिंदगी और मौत के बीच का फासला लगभग मिट जाता है .

इसकी कल्पना करना भी मन में डर पैदा कर देता है . लेकिन हिन्दी सिनेमा के इस महानायक ने इस मुश्किल दौर को पार कर एक उदाहरण प्रस्तुत किया . चोट से उबरने के बाद..अमिताभ ने फिल्मों में शानदार वापसी की . वर्ष 1988 में आई फिल्म शहंशाह सफल रही... लेकिन 1990 का दशक..अमिताभ बच्चन के लिए फिर से चुनौतियां लेकर आया . अमिताभ की ज्यादातर फिल्में Flop होनें लगीं . इस दौरान अमिताभ बच्चन ने एक कंपनी का निर्माण किया . जो दिवालिया हो गई . अमिताभ बच्चन करोड़ों के कर्ज में डूब गए .

यानी शारिरीक चुनौतियों के बाद अब आर्थिक चुनौतियों से निपटने का वक्त था . लेकिन अमिताभ ने यहां भी हार नहीं मानी . उन्होंने एक Quiz शो का Host बनने का Offer स्वीकार कर लिया .इस शो ने भारतीयों का Television देखने का तरीका पूरी तरह से बदल दिया .

लोग.. General Knowledge और जानकारी देने वाले Shows को बहुत पसंद करते हैं और हमारे Show यानी DNA की सफलता भी इसी का प्रमाण है . जानकारी देने वाले Quiz Shows ने Idiot Box कहलाने वाले टीवी को Wisdom Box यानी ज्ञान देने वाले माध्यम में बदल दिया . और इससे अमिताभ बच्चन के करियर को जबरदस्त फायदा पहुंचा और वो सिनेमा के साथ साथ छोटे पर्दे के भी सुपर स्टार बन गए .

यानी निराशा के दौर में लिए गए फैसले आपके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण फैसले होते है . इनसे आपके हाथ नए सिरे से सफलता की कुंजी भी लग सकती है, और आप बर्बाद भी हो सकते हैं. जिंदगी में आप करोड़पति बनें या ना बनें..आप अपने जीवन के साथ नए प्रयोग जरुर करते रहें . नई जानकारियां जुटाते रहें और लीक से हटकर काम करने से नहीं घबराएं .

सफलता और असफलता का अनुभव ही आपको जीवन में असली करोड़पति बनाता है. अमिताभ बच्चन 76 वर्ष के हैं. लेकिन वो पिछले 50 वर्षों से लगातार काम कर रहे हैं. वो आज भी शारीरिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं. लेकिन अपने काम से वो मुंह नहीं मोड़ते . और लगातार परिश्रम करते रहते हैं . वर्ष 2015 में अमिताभ बच्चन की एक फिल्म रिलीज़ हुई थी, तब मैंने उनका इंटरव्यू किया था और मैंने ये समझने की कोशिश की थी..

कि वो इतनी उम्र में भी कैसे ऊर्जावान बने रहते हैं. अमिताभ बच्चन ने इसके जवाब में क्या कहा था...आज आपको ये भी सुनना चाहिए . अमिताभ बच्चन ने जब अपने करियर की शुरुआत की थी, तब उनके सामने राजेश खन्ना जैसे सुपर स्टार थे . इसके बाद विनोद खन्ना, शत्रुघन सिन्हा, धर्मेंद्र और जितेंद्र जैसे अभिनेताओं ने उन्हें चुनौती देने की कोशिश की .

लेकिन अमिताभ बच्चन से महानायक का खिताब कोई नहीं छीन पाया . इसकी वजह ये थी कि अमिताभ ने खुद को कभी Typecast नहीं किया . यानी अमिताभ एक ही ढर्रे पर चलने से बचते रहे . उन्होंने हर दौर की ज़रूरत को समझा और उसके मुताबिक खुद को ढाला . यानी जो लोग समय के अनुसार खुद को बदल लेते हैं वो विकास क्रम में टिके रहते हैं और जो खुद को बदल नहीं पाते, दुनिया उन्हें भुला देती है .

अमिताभ बच्चन ने करीब 11 वर्ष पहले Personal Blog लिखना शुरू किया था . यानी जब भारत में लोग इंटरनेट इस्तेमाल करने के तरीके समझ रहे थे, तब अमिताभ इस क्षेत्र में अपनी जगह बना चुके थे . वर्ष 2000 के बाद अमिताभ ने अपने फिल्मी किरदारों के साथ कई तरह के प्रयोग किए, उन्होंने ज्यादातर Roles अपनी उम्र के हिसाब से चुने .

कई Super Hit फिल्में दीं . कभी वो परिवार के मुखिया के तौर पर नज़र आए . कभी शिक्षक के रूप में..कभी शेफ बने तो कभी प्रोजेरिया नामक बीमारी से पीड़ित बच्चे का किरदार निभाया . यानी पिछले 2 दशकों में भी निर्देशकों ने अमिताभ को ध्यान में रखकर फिल्में लिखीं और अमिताभ ने किसी को निराश नहीं किया .

आज उनकी फिल्मों की सफलता और असफलता पर बात नहीं होती, आज उनके किरदारों की बात होती है. यानी अमिताभ बच्चन Box Office की सफलता और असफलता के पैमानों से ऊपर उठ चुके हैं . अमिताभ आदर्शवादी भी हैं, संस्कारों का भी पालन करते हैं . उनकी पारिवारिक छवि भी लोगों को पसंद आती है और वो एक शानदार अभिनेता भी हैं.

अक्सर सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हुए लोग...अपने आदर्शों, संस्कारों और पारिवारिक रिश्तों की बलि दे देते हैं. लेकिन अमिताभ की जिंदगी का सफर हमें बताता है कि आप अपनी जड़ों से जितनी मजबूती से जुड़े रहते हैं आपके व्यक्तित्व का वृक्ष उतना ही विशाल, हरा भरा और और सबको छांव देने वाला बन जाता है .

समय बहुत बलवान होता है, लेकिन कुछ लोग समय का सामना बखूबी करते हैं . समय अच्छा हो या खराब..वो हिम्मत नहीं हारते . अमिताभ बच्चन भी उनमें से एक हैं .इसलिए हम आप आज बता रहे हैं कि उनसे क्या सीख सकते हैं .