close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

भारत की एक और जीत और पाकिस्तान की हार का विश्लेषण

ब्रिटेन में England and Wales High Court ने 71 वर्ष पुराने Hyderabad Funds केस में भारत के पक्ष में फैसला सुनाया है. यानी ब्रिटेन की अदालत में भारत जीत गया और पाकिस्तान की हार हुई.

भारत की एक और जीत और पाकिस्तान की हार का विश्लेषण

भारत से हारना पाकिस्तान की अब आदत बन चुकी है. पहले कुलभूषण जाधव पर हार, फिर कश्मीर पर कूटनीतिक हार और अब ब्रिटेन की अदालत में हैदराबाद के निज़ाम की संपत्ति पर पाकिस्तान की हार ने इस बात को सौ प्रतिशत सही साबित किया है. आज हम ब्रिटेन की एक अदालत में हैदराबाद के निज़ाम की संपत्ति पर 71 वर्षों से चल रहे मुकदमे में भारत की जीत और पाकिस्तान की हार का विश्लेषण करेंगे. आज हम आपको सरल भाषा में ये भी बताएंगे कि हैदराबाद के निज़ाम की संपत्ति से जुड़ा ये मामला क्या था? ये मुकदमा आखिर इतना लंबा क्यों चला? निज़ाम का ख़ज़ाना पूरी दुनिया में क्यों मशहूर था? और कैसे सरदार वल्लभ भाई पटेल ने भारत में हैदराबाद की रियासत का विलय कराया?

इन सारे सवालों के जवाब जानने से पहले आपको ये खबर समझनी होगी. और खबर ये है कि ब्रिटेन में England and Wales High Court ने 71 वर्ष पुराने Hyderabad Funds केस में भारत के पक्ष में फैसला सुनाया है. यानी ब्रिटेन की अदालत में भारत जीत गया और पाकिस्तान की हार हुई. ये मुकदमा हैदराबाद के निजाम के उत्तराधिकारियों और पाकिस्तान के बीच चल रहा था. इस फैसले के बाद अब भारत और हैदराबाद के आखिरी निजाम के उत्तराधिकारियों को 306 करोड़ 45 लाख रुपए मिलेंगे. इस रकम पर अब तक पाकिस्तान दावा करता आ रहा था. लेकिन ब्रिटेन की अदालत ने पाकिस्तान के दावों को खारिज कर दिया.

अब आपको बताते हैं कि हैदराबाद के निज़ाम की संपत्ति से जुड़ा ये मामला क्या था? और इस मुकदमे का फैसला आने में आखिर 71 वर्ष क्यों लग गए? ये पूरा मामला भारत की आजादी के एक वर्ष बाद का है. 15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ लेकिन हैदराबाद 17 सितंबर 1948 तक निज़ाम शासन के तहत रियासत बना हुआ था. हैदराबाद के निजाम की कोशिश हैदराबाद का पाकिस्तान में विलय करने की थी. उस समय हैदराबाद में निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान सिद्दिक़ी की रियासत हुआ करती थी. और उन्हें दुनिया के सबसे धनी व्यक्तियों में से एक माना जाता था. सितंबर 1948 को 'ऑपरेशन Polo' नाम के सैन्य अभियान के ज़रिए हैदराबाद का विलय भारत में किया गया था.

ऑपरेशन Polo के दौरान हैदराबाद के आखिरी निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान सिद्दीक़ी के वित्त मंत्री नवाब मोइन नवाज़ जंग ने 10 लाख Pound यानी 8 करोड़ 75 लाख रुपये London के NatWest Bank के एक बैंक अकाउंट में जमा कराए थे. ये बैंक अकाउंट England में पाकिस्तान के तत्कालीन हाई कमिश्नर हबीब इब्राहिम रहमतुल्लाह का था. शायद हैदराबाद के निजाम को डर था कि हैदराबाद के विलय के बाद उनकी संपत्ति पर भारत का कब्जा हो जाएगा इसलिए उन्होंने ये फैसला किया था. हैदराबाद के विलय के बाद जब निज़ाम को पैसों के ट्रांसफर के बारे में पता चला, तो उन्होंने पाकिस्तान से पैसे लौटाने के लिए कहा लेकिन रहमतुल्लाह ने उन पैसों को पाकिस्तान की संपत्ति बताकर वापस देने से मना कर दिया था.

वर्ष 1954 में हैदराबाद के आखिरी निज़ाम मीर उस्मान अली और पाकिस्तान के बीच एक क़ानूनी लड़ाई शुरू हो गई थी. निज़ाम ने अपने पैसे वापस पाने के लिए ब्रिटेन की High Court में केस किया. लेकिन High Court के फैसले में पाकिस्तान की जीत हुई थी. इसके बाद निज़ाम ने फिर अपील की और इस बार फैसला उनके पक्ष में आया था. पाकिस्तान ने इसके बाद ब्रिटेन के सुप्रीम कोर्ट में इसके खिलाफ अपील की थी और दावा किया था कि निज़ाम पाकिस्तान पर किसी तरह का मुक़दमा नहीं कर सकते, क्योंकि पाकिस्तान अब एक अलग राष्ट्र है. अदालत ने पाकिस्तान की दलील को सही ठहराते हुए उसके पक्ष में फ़ैसला सुनाया था. लेकिन विवादित राशि 8 करोड़ 75 लाख रुपये को फ्रीज़ कर दिया. वर्ष 1967 में हैदराबाद के आखिरी निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान सिद्दिक़ी का निधन हो गया. लेकिन निजाम के उत्तराधिकारियों ने पैसों को वापस पाने की क़ानूनी जंग इसके बाद भी जारी रखी.

वर्ष 2013 में पाकिस्तान ने London के NatWest Bank से पैसे निकालने के लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू की. इसके बाद निजाम के वंशजों ने फिर से ब्रिटेन के England and Wales High Court में अपील की. अदालत में पाकिस्तान ने हैदराबाद को हथियार सप्लाई करने का दावा किया और कहा कि हैदराबाद ने आखिरी निजाम ने इसके बदले पाकिस्तान को भुगतान किया था. लेकिन ब्रिटेन की England and Wales High Court ने पाकिस्तान की दलीलों को खारिज कर दिया. और 2 अक्टूबर को England and Wales High Court ने भारत सरकार और निज़ाम के उत्तराधिकारियों के पक्ष में अपना फैसला दिया. यानी वर्ष 1948 में London के NatWest Bank में जमा 8 करोड़ 75 लाख रुपये पर भारत सरकार और निज़ाम के उत्तराधिकारियों का हक है. आपको ये भी जानना चाहिए कि 71 वर्षों बाद ये पूरी रकम बढ़कर 306 करोड़ 45 लाख रुपये हो चुकी है और अभी भी NatWest Bank में ही जमा है.

इस केस में भारत और निजाम के उत्तराधिकारियों का पक्ष भारत के वकील हरीश साल्वे ने रखा था और एक बार फिर पाकिस्तान की हार पक्की कर दी. खास बात ये रही कि इस कानूनी लड़ाई में हरीश साल्वे ने कोई फीस नहीं ली है. आपको याद होगा कुछ समय पहले कुलभूषण जाधव मामले में International Court of Justice में भारत के वकील हरीश साल्वे ने सिर्फ 1 रुपए की फीस लेकर पाकिस्तान को हरा दिया था. अब आपको बताते हैं कैसे सरदार वल्लभ भाई पटेल ने भारत में हैदराबाद रियासत का विलय कराया? और अंग्रेजों की भविष्यवाणी गलत साबित कर दी.

15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ था. तब भारत से जाते वक्त अंग्रेजों ने कहा था कि '15 वर्षों में भी कोई भारत की 565 रियासतों को जोड़ नहीं सकता'. लेकिन सरदार पटेल ने सिर्फ़ 2 वर्षों के अंदर पूरे भारत को एक सूत्र में बांध दिया था. लेकिन ये बिल्कुल भी आसान नहीं था. क्योंकि, आज़ादी से पहले भारत के एक बड़े हिस्से पर अंग्रेज़ों की सीधी हुकूमत थी. और दूसरा हिस्सा वो था, जिस पर राजाओं और रजवाड़ों की हुकूमत थी. ये ऐसी रियासतें थीं, जो ब्रिटेन की महारानी की गुलामी स्वीकार कर चुकी थीं. इनमें से कई राजाओं के पास अपनी सेनाएं और कुछ के पास तो लड़ाकू विमान भी थे. इन 565 रियासतों को भारत में जोड़ना आसान नहीं था. कश्मीर और हैदराबाद का विलय सरदार पटेल के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी. लेकिन सरदार पटेल ने अपनी कूटनीति से हैदराबाद के नवाब को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया था.

अब आपके मन में सवाल होगा कि हैदराबाद को भारत के साथ जोड़ना क्यों जरूरी था? ये समझने के लिए आपको ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित एक फिल्म का छोटा सा हिस्सा देखना चाहिए. इसे देखने के बाद आप भी सरदार पटेल के इस फैसले पर गर्व करेंगे. वर्ष 1947 में जब ब्रिटिश भारत छोड़ रहे थे तब यहां के 3 रजवाड़े कश्मीर जूनागढ़ और हैदराबाद भारत में अपना विलय नहीं चाहते थे. उस समय आबादी और जीडीपी के हिसाब से हैदराबाद भारत का सबसे बड़ा राजघराना था. हैदराबाद की अस्सी प्रतिशत आबादी हिंदू थी लेकिन अल्पसंख्यक मुसलमान वहां प्रशासन और सेना में महत्वपूर्ण पदों पर थे. हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली ख़ान सिद्दिक़ी के संरक्षण में रज़ाकार सेना का गठन किया गया था. रज़ाकार हैदराबाद के निजाम की प्राइवेट आर्मी थी जो गैर मुस्लिमों पर लगातार हमला कर रही थी. तब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस मसले को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाना चाहते थे. लेकिन गृह मंत्री सरदार पटेल का मानना था कि हैदराबाद भारत के पेट में कैंसर के समान है जिसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता था.

सरदार पटेल ने इस अराजकता पर रोक लगाने का फैसला किया और 13 सितंबर 1948 को हैदराबाद का भारत में विलय करने के लिए Operation Polo लॉन्च कर दिया. सिर्फ 100 घंटों के सैन्य अभियान के बाद ही हैदराबाद भारत का हिस्सा बन गया. भारतीय सेना की इस कार्रवाई को Operation Polo का नाम दिया गया था क्योंकि उस समय हैदराबाद में विश्व में सबसे ज़्यादा 17 Polo के मैदान थे. अब आपको बताते हैं कि हैदराबाद के निज़ाम का ख़ज़ाना पूरी दुनिया में क्यों मशहूर था?

वर्ष 1937 में अमेरिका की Times मैगजीन के Cover Page पर निजाम की तस्वीर छापी गई थी और तब उन्हें दुनिया का सबसे अमीर इंसान बताया गया था. हैदराबाद के आखिरी निजाम नवाब मीर उस्मान अली खान के पास दुनिया का सातवां सबसे बड़ा हीरा Jacob Diamond भी था. 184 कैरेट के इस हीरे की कीमत सैकड़ों करोड़ होने का दावा किया जाता है. लेकिन निजाम इस हीरे को Paper Weight की तरह इस्तेमाल करते थे. कहा जाता था कि निजाम के पास असली मोतियों का इतना बड़ा खजाना था कि अगर उन्हें सड़क पर बिछा दें तो वो कई किलोमीटर के इलाके को घेर लेता. वर्ष 2008 में Forbes मैगजीन ने उन्हें दुनिया का पांचवां सबसे धनवान व्यक्ति बताया था. Forbes ने निजाम की कुल संपत्ति 210 Billion Dollar यानी 15 लाख करोड़ रुपए होने का अनुमान लगाया था. जबकि दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति Jeff Bezos की संपत्ति सिर्फ 9 लाख करोड़ रुपए है.