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महामृत्युंजय जाप का मरीजों पर होने वाले असर का विश्लेषण

आपने अक्सर देखा होगा कि डॉक्टर बीमार मरीज़ के घरवालों को ये सलाह देते हैं कि आप प्रार्थना कीजिए, मरीज की अच्छी सेहत के लिए दुआ कीजिए. दुआओं में असर होता है, ये आपका विश्वास हो सकता है, लेकिन अगर इस शोध के नतीजे सकारात्मक हुए, तो हम ये भी कह सकेंगे कि दुआओं में सिर्फ असर ही नहीं विज्ञान भी होता है

महामृत्युंजय जाप का मरीजों पर होने वाले असर का विश्लेषण

हमारा अगला विश्लेषण धर्म और विज्ञान से जुड़ा हुआ है. अगर एक व्यक्ति किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित है तो उसे बचाने के लिए आप क्या करेंगे. सबसे पहले आप उसे डॉक्टर के पास लेकर जाएंगे. हो सकता है आप भगवान का भी सहारा लें. जरुरत पड़ने पर आपने यज्ञ, हवन और मंत्रोच्चार के तरीकों को भी अपनाया होगा. लेकिन अब देश की मेडिकल रिसर्च संस्थाएं और डॉक्टर भी मंत्रों की शक्ति को आज़मा रहे हैं.

दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल के डॉक्टर महामृत्युंजय जाप के मरीज़ों पर होने वाले असर की जांच कर रहे हैं. जिन लोगों पर ये रिसर्च किया जा रहा है, वो सभी Brain Injury यानी मस्तिष्क की चोट के मरीज हैं. ये स्टडी 40 लोगों पर की जा रही है. इन 40 लोगों को बीस बीस के दो समूहों में बांटा गया है. इसमें से एक समूह को महामृत्युंजय मंत्र सुनाया गया, जबकि दूसरे समूह को ये मंत्र नहीं सुनाया गया. जिन मरीजों के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया गया, उनमें से कई मरीज कोमा में थे. हालांकि इस रिसर्च का तरीका थोड़ा अलग है. क्योंकि मंत्र पढ़ने का काम अस्पताल में नहीं, बल्कि वहां से 13 किलोमीटर दूर संस्कृत विद्यापीठ में किया जा रहा है.

इसे समझाने के लिए हम आपको अस्पताल की कुछ तस्वीरें दिखाते हैं. ये उन मरीज़ों की तस्वीरें हैं, जिन पर राम मनोहर लोहिया अस्पताल में रिसर्च की जा रही है. सही तरीके से मंत्रों का पाठ करने के लिए RML अस्पताल के डॉक्टरों ने दिल्ली के संस्कृत विद्यापीठ से संपर्क किया. इसके बाद वहां के पंडितों ने मरीज़ों को उनके परिवार वालों की मौजूदगी में महामृत्युंजय मंत्र का संकल्प करवाया. डॉक्टरों और मंत्रोच्चार करने वाले आचार्यों का कहना है कि मंत्रों की शक्ति से 20 में से 18 मरीज़ों को बचा लिया गया. जबकि जिन मरीज़ों के लिए मंत्रों का पाठ नहीं हुआ, उनमें सुधार नहीं हो सका.

महामृत्युंजय मंत्र का अर्थ है- मृत्यु को जीतने वाला महान मंत्र. ऐसा माना जाता है कि इस मंत्र का जाप करने से अकाल मृत्यु का डर दूर होता है. इस मंत्र की रचना ऋषि मार्कण्डेय ने की थी. इस मंत्र का मतलब है कि हम भगवान शिव की पूजा करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो हर श्वास में जीवन शक्ति का संचार करते हैं और पूरे जगत का पालन पोषण करते हैं. इसे त्रयंबकम मंत्र, रूद्र मंत्र और मृत-संजीवनी मंत्र भी कहा जाता है. ऋग वेद के सातवें अध्याय, यजुर्वेद के तीसरे अध्याय और अथर्व वेद के 14वें छंद में इस मंत्र के बारे में बताया गया है. ऋषियों ने महामृत्युंजय मंत्र को 'वेदों का ह्रदय' भी कहा है.

कुछ वक्त पहले AIIMS ने भी गायत्री मंत्र के वैज्ञानिक महत्व को मरीज़ों के MRI टेस्ट में हुए बदलावों से साबित किया था. लेकिन इन दोनों रिसर्च में काफी फर्क है. AIIMS में मरीजों ने खुद गायत्री मंत्र का जाप किया था, लेकिन महामृत्युंजय पाठ संस्कृत विद्यापीठ में आचार्यों द्वारा किया जा रहा है और मरीज़ वहां से कई किलोमीटर दूर अस्पताल के ICU में भर्ती हैं. इस रिसर्च के ज़रिए ये समझने की कोशिश की जा रही है कि वेदों और धर्मग्रंथों में किसी दूसरे के लिए प्रार्थना करने के असर का जो महत्व बताया जाता है. क्या उसका कोई वैज्ञानिक आधार है या नहीं. भारत सरकार की सबसे बड़ी मेडिकल रिसर्च संस्था Indian Council for Medical Research ने इस Study को फंड किया है. ये Study तीन वर्ष के लिए की जा रही है, जिसमें से डेढ साल का वक्त पूरा हो चुका है.

यानी आप कह सकते हैं कि आस्था और विज्ञान के इस अनोखे मेल के फाइनल नतीजे आने में अभी डेढ़ साल का वक्त और लगेगा. मेडिकल साइंस की भाषा का प्रचलित शब्द है Placebo Effect. यानी अगर आप ये मान लें कि कोई दवा आपकी किसी बीमारी को ठीक कर सकती है, तो कई बार वो दवा सच में काम कर जाती है. जबकि असल में आपको दवा नहीं, सिर्फ मीठी गोलियां खिलाई जा रही होती हैं. ये सब होता है उस इलाज के प्रति आपकी आस्था और विश्वास से. इस आस्था से आपमें ऐसे शारीरिक और मानसिक बदलाव होते हैं कि आप अपने आप ठीक हो जाते हैं. इसे ही Placebo Effect कहा जाता है. विज्ञान जिसे Placebo कहता है, उसे आप आस्था या विश्वास कह सकते हैं.

आपने अक्सर देखा होगा कि डॉक्टर बीमार मरीज़ के घरवालों को ये सलाह देते हैं कि आप प्रार्थना कीजिए, मरीज की अच्छी सेहत के लिए दुआ कीजिए. दुआओं में असर होता है, ये आपका विश्वास हो सकता है, लेकिन अगर इस शोध के नतीजे सकारात्मक हुए, तो हम ये भी कह सकेंगे कि दुआओं में सिर्फ असर ही नहीं विज्ञान भी होता है. मंत्रों के उच्चारण का स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है, इस पर अभी और वैज्ञानिक रिसर्च की जरुरत है. लेकिन अब आपको एक दिलचस्प वीडियो दिखाते हैं. इस वीडियो में बच्चे को सुलाने के लिए एक ध्वनि का प्रयोग किया गया है. और हमें लगता है कि ये ध्वनि आपने पहले भी सुनी होगी. ये शायद दुनिया का सबसे प्रसिद्ध स्वर है और इसका उच्चारण आपने भी ज़रूर किया होगा.

अब हम देश की एक बड़ी राष्ट्रीय समस्या का विश्लेषण करेंगे. जिसका नाम है अतिक्रमण. एक अतिक्रमण तो हमें सड़कों पर दिखाई दे जाता है. लेकिन हम उस वैचारिक अतिक्रमण को नहीं देख पाते, जिसकी वजह से हमारा समाज अनुशासनहीन, अव्यवस्थित और आदेश का पालन ना करने वाला समाज बन जाता है. पिछले महीने 3 सितंबर को हमने दिल्ली में हो रहे अतिक्रमण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के एक एतिहासिक फैसले का विश्लेषण किया था. इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के तीन नगर निगमों और Delhi Cantonment Board को एक आदेश दिया था. इस आदेश के मुताबिक 15 दिनों में दिल्ली की सड़कों, फुटपाथों और Over Bridges से अतिक्रमण हटाया जाना था.

हमने फैसले वाले दिन दिल्ली के कुछ इलाकों का Realty Check किया था. ये इलाके अतिक्रमण से बुरी तरह ग्रस्त हैं. 15 दिन बाद यानी 17 सितंबर को हमारी टीम फिर इन्हीं इलाकों में पहुंची और ये जानने की कोशिश की कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन हुआ है या नहीं. लेकिन आपको जानकर गुस्सा भी आएगा और हैरानी भी होगी कि दिल्ली के इन इलाकों में हालात बिल्कुल नहीं बदले हैं. हमने कल एक बार फिर इन इलाकों का On The Spot DNA टेस्ट किया. लेकिन हमारे हाथ एक बार फिर से निराशा ही लगी. यानी हमारे देश में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का भी कोई महत्व नहीं रह गया है. सरकारें और प्रशासन इन आदेशों को हवा में उड़ा देते हैं. हमारे पास 2 सितंबर के सुप्रीम कोर्ट के उसी फैसले की एक Copy है. इस फैसले के पेज नंबर 18 के पैराग्राफ नंबर 1 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि जिन भी लोगों ने रास्तों पर अतिक्रमण किए हैं उन्हें 15 दिन का नोटिस दिया जाए और अगर वो खुद अतिक्रमण नहीं हटाते तो नगर निगम इसे हटाने का काम करे और इसकी लागत अतिक्रमण करने वालों से वसूली जाए.

शहर कोई भी हो, अतिक्रमण वाली समस्या से हर कोई परेशान है. आपके आसपास ऐसी कोई ना कोई सड़क ज़रूर होगी जिस पर अतिक्रमण हुआ होगा. कोई ना कोई ऐसा फुटपाथ ज़रूर होगा जिस पर किसी ने अवैध कब्ज़ा कर लिया होगा. और आप उसे देखकर किसी तरह अपना गुस्सा पी जाते होंगे. हमने अतिक्रमण की इस समस्या पर लगातार एक महीना रिसर्च किया है. इस पर Ground Reporting की है. और ये जानने की कोशिश की है कि एक महीने में भी अतिक्रमण को लेकर दिल्ली की सोच और हालात क्यों नहीं बदले.