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New India के बदलते रियल हीरो का विश्लेषण

द्रयान TWO मिशन ने पूरी दुनिया में देश का सम्मान बढ़ाया और इसका श्रेय K.SIVAN को ही जाता है. वो आज एक Celebrity बन चुके हैं.

New India के बदलते रियल हीरो का विश्लेषण

आज DNA में हम सबसे पहले आपको देश के एक असली हीरो की सादगी के दर्शन कराएंगे. इस नायक का नाम है K Sivan. भारत की अंतरिक्ष एजेंसी ISRO के चीफ K.sivan को आज देश का बच्चा-बच्चा जानता है. 135 करोड़ भारतीय ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया अब उन्हें पहचानती है. चंद्रयान TWO मिशन ने पूरी दुनिया में देश का सम्मान बढ़ाया और इसका श्रेय K.SIVAN को ही जाता है. वो आज एक Celebrity बन चुके हैं. पूरा देश उन्हें पहचानता है और उनके साथ बिताया गया एक पल भी किसी को गर्व की भावना से भर सकता है.

कुछ ऐसा ही तब हुआ, जब K.SIVAN एक फ्लाइट में जा रहे थे. विमान के Cabin Crew को जब पता चला कि K.SIVAN भी विमान के यात्रियों में शामिल हैं तो Cabin Crew ने Flight में इस बात घोषणा की और बाकी यात्रियों को उनके स्वागत के लिए कहा. इसके बाद विमान में सवार यात्रियों ने तालियां बजाकर K.SIVAN का स्वागत किया. इस दौरान K.SIVAN की विनम्रता उनके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी. वो मुस्कुरा रहे थे और हाथ हिलाकर सभी का धन्यवाद कर रहे थे. विमान के Cabin Crew ने उनके साथ Selfies भी लीं और यात्रियों ने उनकी तस्वीरें भी Click कीं. K. SIVAN ने किसी को मना नहीं किया और चेहरे पर हल्की मुस्कान के साथ वो लोगों का धन्यवाद करते रहे. आप पहले देश के इस वैज्ञानिक का हीरो जैसा स्वागत देखिए. फिर हम अपने विश्लेषण को आगे बढ़ाएंगे.

पहले हमारे देश में फिल्मी हस्तियों और Cricketers को देखकर लोग बहुत उत्साहित हो जाया करते थे, उनके साथ तस्वीरें खिंचवाने लगते थे. और फिल्मी हस्तियों के दर्शन करके खुद को बहुत भाग्यशाली समझते थे. लेकिन, एक विमान में K.SIVAN के स्वागत में बजती तालियां इस बात का प्रमाण है कि अब हमारे देश में वैज्ञानिकों को भी Heroes की तरह Treat किया जाने लगा है. यहां आपको K.SIVAN से एक बात और सीखनी चाहिए, वो देश की सबसे बड़ी वैज्ञानिक संस्था के चीफ हैं. अंतरिक्ष की दुनिया की बड़ी-बड़ी सफलताएं उनके नाम हैं. लेकिन वो खुद आज भी ज़मीन से जुड़े हुए हैं.

हमारे देश में अंग्रेज़ी बोलने वाले कई Celebreties समानता, समाजवाद और गरीबों को हक दिलाने की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं. सेमिनारों और व्याख्यानों में हिस्सा लेते हैं. लेकिन अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए Buisness Class में ही यात्रा करते हैं. Economy Class में आम लोगों के साथ बैठना इन्हें पसंद नहीं आता. जबकि K.SIVAN जैसे बड़े वैज्ञानिक एक Celebrity बन जाने के बाद भी Economy Class में आम जनता के साथ बड़े आराम से सफर कर लेते हैं. और उन्हें इसमें कोई परेशानी भी नहीं होती. इसलिए कहते हैं कि आप कितनी बड़ी हस्ती हैं इससे फर्क नहीं पड़ता, बल्कि आपकी सादगी सरलता और विनम्रता आपको असली हीरो बनाती है.

K.SIVAN जैसे भारत के वैज्ञानिकों ने देश का मान बढ़ाया है तो हमारे सैनिक देश की संप्रभुता को बचाने के लिए अपनी जान तक कुर्बान कर देते हैं. सेना और अर्धसैनिक बलों के जवान मुश्किल से मुश्किल हालात में देश की रक्षा में जुटे रहते हैं. कश्मीर जैसे इलाकों में जब हमारे यही जवान पत्थरबाज़ों, अलगाववादियों और आतंकवादियों का सामना करते हैं तो वो ये सब अपने लिए नहीं बल्कि आपके और हमारे लिए कर रहे होते हैं. लेकिन हमारे देश के कई नेता, बुद्धीजीवी, अंग्रेज़ी बोलने वाले Celebreties और डिजाइनर पत्रकार इन सैनिकों का भी विरोध करते हैं. ये लोग दावा करते हैं कि हमारे सैनिक मानवाधिकारों का उल्लंघन कर रहे हैं. लेकिन आज CRPF की एक महिला कॉन्स्टेबल ने मानव अधिकारों के ऐसे कुटिल Champions के एजेंडे का पर्दाफाश कर दिया है.

27 सितंबर को दिल्ली में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग द्वारा एक वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था. जिसका विषय था- ''क्या आतंकवाद और उग्रवाद का मुकाबला मानवाधिकारों की रक्षा करते हुए किया जा सकता है''. इस विषय के विरोध में CRPF की कॉन्स्टेबल खुशबू चौहान ने एक भाषण दिया. इस भाषण में उन्होंने मानवाधिकारों के नाम पर सेना की ताकत कम करने का सपना देखने वालों को आईना दिखाया है. आप इस भाषण का एक हिस्सा सुनिए फिर हम मानव-अधिकारों पर एक अलग दृष्टिकोण आपके सामने रखेंगे.

आपको याद होगा कि पिछले वर्ष जनवरी में जम्मू-कश्मीर के शोपियां में पत्थरबाज़ों के एक हिंसक समूह ने सेना के जवानों पर हमला कर दिया था. इस हमले में पत्थरबाज़, जवानों की हत्या करने पर तुले थे. अपनी जान बचाने के लिए आत्मरक्षा में सेना के जवानों को फायरिंग करनी पड़ी और इस फायरिंग में 3 पत्थरबाज़ों की मौत हो गई थी. इसके बाद हद तो तब हो गई जब राज्य सरकार ने इस मामले में मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दे दिए और राज्य की पुलिस ने सेना के जवानों के ख़िलाफ FIR दर्ज कर ली. तब जम्मू-कश्मीर की तत्कालीन सरकार की पूरे देश में आलोचना हुई थी. लेकिन हालात नहीं बदले और कोई भी इन सैनिकों के मानव अधिकारों की रक्षा के लिए आगे नहीं आया.

वर्ष 2018 में ही जम्मू कश्मीर की सरकार ने 9 हज़ार 730 लोगों के खिलाफ दर्ज किए गये पत्थरबाज़ी के केस वापस लेने का फैसला किया था. ये लोग 2008 से 2017 के बीच पत्थरबाज़ी की घटनाओं में शामिल रहे थे. 2016 और 2017 में 11 हज़ार 290 पत्थरबाज़ों के खिलाफ 3 हज़ार 773 केस दर्ज हुए थे. लेकिन 2018 में जम्मू-कश्मीर की तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने इनमें से 4 हज़ार पत्थरबाज़ों को माफ़ी देने का ऐलान किया था.

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा और छत्तीसगढ़ के सुकमा में जब CRPF के जवानों को आतंकवादियों और नक्सलियों ने शहीद कर दिया. तब किसी ने इन सैनिकों के मानव अधिकारों की बात नहीं की. जब सेना का कोई जवान जवाबी कार्रवाई में गोली चलाता है, या पैलेट गन का इस्तेमाल करता है, तो मानव अधिकारों के झूठे Champions सेना के खिलाफ खड़े हो जाते हैं. कोई इस बात की परवाह नहीं करता कि हमारे सैनिक किन मुश्किल परिस्थितियों में देश की रक्षा कर रहे हैं. हमारे देश में सैनिकों पर सवाल उठाना, उनके खिलाफ जांच बिठाना और उन पर आरोप लगाना तो आसान है. लेकिन उन्हें उनके Human Rights दिलाना बहुत मुश्किल काम है. और इस काम को कोई नहीं करना चाहता.

आज हमने इस दोहरे मापदंड का सच दिखाने के लिए एक फिल्म का दृश्य निकाला है. इसे देखकर आप भी समझ जाएंगे कि मानव अधिकारों की बड़ी-बड़ी बातें करना और सच में देश के लोगों की रक्षा करने में कितना फर्क है. मानव-अधिकारों को लेकर झूठे और दोहरे मापदंड सिर्फ भारत में ही नहीं अपनाए जाते. बल्कि पूरी दुनिया में इनके असली मकसद का मज़ाक उड़ाया जाता है. इसे आपको एक उदाहरण के साथ समझना चाहिए.

वर्ष 1943 में तब के बंगाल में एक भयानक सूखा पड़ा था. इस सूखे की वजह से 30 लाख लोग मारे गए थे. वैज्ञानिक मानते हैं कि इन मौतों को टाला जा सकता था. लेकिन तब ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री Winston Churchill ने भारत को मदद देने से इनकार कर दिया था. बंगाल के लोगों तक चावल और गेहूं पहुंचाने की बजाय इसकी सप्लाई ब्रिटेन की सेना को की जाती रही और भारत के लाखों लोग भूख से तड़प कर मर गए. आज वही ब्रिटेन कश्मीर में मानव-अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाकर भारत को नसीहत देने की कोशिश करता है.

वर्ष 2003 में संयुक्त राष्ट्र के मानव-अधिकार आयोग के अध्यक्ष पद के लिए वोटिंग हुई. इस वोटिंग के ज़रिए लीबिया को आयोग का अध्यक्ष चुना गया. जबकि उस वक्त लीबिया में तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी का शासन था और उन पर सैकड़ों लोगों की हत्या के आरोप थे. ये माना जाता है कि गद्दाफी के ही इशारे पर वर्ष 1988 में एक अमेरिकी एयरलाइन के विमान में बम रखा गया था. इस बम विस्फोट में 270 लोग मारे गए थे. लेकिन दुनिया हमेशा मानव अधिकारों का इस्तेमाल अपनी सुविधा अनुसार करती रही है. इसलिए अगली बार जब आपका सामना मानव-अधिकारों के किसी झूठे चैंपियन से हो तो उसे आईना दिखाने की कोशिश करें और मानव-अधिकारों के नाम पर सेना के खिलाफ एजेंडा चलाने वालों को बेनकाब करते रहें.