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ZEE जानकारी: प्याज़ की बढ़ती कीमतों का विश्लेषण

आम दिनों में प्याज की कीमत 25 से 30 रुपये प्रति किलो के आसपास होती है . प्याज़ का भारत के लोगों से बहुत गहरा रिश्ता है . उत्तर भारत में जिसे प्याज़ कहते हैं उसे महाराष्ट्र में कांदा कहा जाता है . कर्नाटक में ये इरुली के नाम से जाना जाता है तो गुजराती इसे डुंगरी कहकर बुलाते हैं .

ZEE जानकारी: प्याज़ की बढ़ती कीमतों का विश्लेषण

नई दिल्ली: अपने जीवन काल में तीन बार Pulitzer पुरस्कार से सम्मानित..महान अमेरिकी लेखक और कवि Carl August Sandburg ने अपनी एक किताब में कहा था कि जिंदगी एक प्याज़ की तरह है . जिसकी एक परत हर साल उतर जाती है और परत दर परत कम होती ये जिंदगी कभी-कभी आपको रुला भी देती है . लेकिन फिलहाल पूरे भारत में प्याज़ की बढ़ती कीमतें आम लोगों को लगातार रुला रही हैं . भारत के ज्यादातर शहरों में प्याज़ फिलहाल 80 से 100 रुपये प्रति किलो की कीमत पर बिक रहा है .

जबकि आम दिनों में इसकी कीमत 25 से 30 रुपये प्रति किलो के आसपास होती है . प्याज़ का भारत के लोगों से बहुत गहरा रिश्ता है . उत्तर भारत में जिसे प्याज़ कहते हैं उसे महाराष्ट्र में कांदा कहा जाता है . कर्नाटक में ये इरुली के नाम से जाना जाता है तो गुजराती इसे डुंगरी कहकर बुलाते हैं .

लेकिन आप इस प्याज़ को चाहे जो नाम दे दीजिए आज की तारीख में इसका पूरे देश के लोगों के साथ एक ही रिश्ता है और वो रिश्ता है आंसुओं का . क्योंकि प्याज़ की कीमतों ने पूरे देश की आंखों में आंसू ला दिए हैं .आपको जानकर हैरानी होगी कि भारत को हर साल जितने प्याज़ की ज़रूरत होती है..भारत उससे बहुत ज्यादा प्याज़ का उत्पादन करता है . और अक्सर ये ज़रूरत से ज्यादा प्याज़ ही परेशानी की वजह बन जाता है .ये सब कैसे होता है ये आज हम आपको समझाएंगे लेकिन फिलहाल ये जान लीजिए कि देश के अलग अलग शहरों में आज प्याज़ किस कीमत पर बिक रहा है .

इसके लिए आज हमने कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक...प्याज़ की कीमतों का अध्ययन किया है . उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय की Price Monitoring Cell के मुताबिक देश के 124 शहरों में से ज्यादातर में प्याज़ की Retail कीमत 40 से 80 रुपये प्रति किलो के बीच है . हमने जब Price Monitoring Cell द्वारा बताई गई प्याज़ की कीमतों को ध्यान से देखा तो पता चला कि सिर्फ ग्वालियर, विजयवाड़ा और मैसूर में प्याज़ 40 रुपये प्रति किलो से कम की कीमत पर बिक रहा है. जबकि कुरनूल में प्याज़ की कीमत पूरे देश में सबसे कम है..वहां प्याज़ 20 रुपये प्रति किलो की दर से बेचा जा रहा है .

जबकि देश के बाकी शहरों में प्याज़ की कीमत सामान्य से दो से पांच गुना तक ज्यादा है . प्याज़ की कीमतें बढ़ने की सबसे बड़ी वजह ये है कि पिछले वर्ष भारत में जितने प्याज़ का उत्पादन हुआ था उसमें से अभी बहुत कम प्याज़ ही बाज़ार में बचा है .

दूसरी वजह ये है कि महाराष्ट्र के कई ज़िलों में हुई बेमौसम बारिश ने ज्यादातर किसानों की प्याज़ की फसल को बर्बाद कर दिया है.महाराष्ट्र के कई इलाकों में अक्टूबर महीने से ही बारिश हो रही है . इससे राज्य में कटाई के लिए तैयार 33 प्रतिशत फसलें नष्ट हो चुकी है .

भारत के बाज़ारों में नया प्याज़...जनवरी से मई महीने के बीच उपलब्ध होता है . इसके बाद देश में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में पहले से जमा किए गए प्याज़ की सप्लाई शुरु होती है . अगस्त के मध्य तक आंध्र प्रदेश के कुरनूल और कर्नाटक से भी प्याज़ सब्ज़ी मंडियों में आने लगता है . इससे प्याज़ की उपलब्धता सितंबर महीने तक बनी रहती है. और इसके बाद अक्टूबर महीने से महाराष्ट्र से और दिसंबर महीने में गुजरात से प्याज़ बाज़ार में बिकने के लिए आ जाता है . 

और इस तरह पूरे साल बाज़ार में प्याज़ बहुत आसानी से मिलता रहता है और इसकी कीमतें भी नियंत्रण में रहती हैं . लेकिन इस साल महाराष्ट्र और कर्नाटक में बाढ़ जैसे हालात हो जाने की वजह से प्याज़ की Supply में अचानक कमी आ गई है . जिससे प्याज़ की कीमत 5 गुना तक बढ़ गई है.

माना जाता है कि प्याज़ का उत्पादन 5 हज़ार वर्ष पहले शुरु हुआ था . यानी इसका इतिहास लगभग भारतीय सभ्यता जितना ही पुराना है . आयुर्वेद पर आधारित प्रसिद्ध ग्रंथ चरक संहिता में प्याज़ को एक दवाई माना गया है और कहा गया है कि ये पाचन, दिल और आंखों से जुड़ी बीमारियों को दूर करता है. लेकिन फिलहाल प्याज़ की कीमतें...पूरे देश के लिए एक मर्ज़ यानी बीमारी बन गई है . जिससे छुटकारा पाने का इलाज हमें जल्द से जल्द ढूंढना होगा .

भारत में प्याज़ से जुड़ी बहुत सारी Dishesh बनाई जाती है . इनमें पनीर दो प्याज़ा और मुर्ग दो प्याज़ा भी शामिल हैं. लेकिन जिस तरह से प्याज़ की कीमतें बढ़ रही हैं..उसे देखते हुए हमें लगता है कि इसे पनीर No प्याज़ा और मुर्ग No प्याज़ा कहा जाना चाहिए . क्योंकि सब्ज़ी में प्याज़ डालना अब लोगों के लिए बहुत महंगा साबित हो रहा है .

प्याज़ के उत्पादन में महाराष्ट्र की हिस्सेदारी 38 प्रतिशत है जबकि 16 प्रतिशत प्याज़ मध्य प्रदेश में और 12 प्रतिशत प्याज़ कर्नाटक में उगाया जाता है और बाकी कि आपूर्ति..राजस्थान, गुजरात, और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य करते हैं .जैसा कि हमने आपको पहले बताया कि भारत में प्याज़ का उत्पादन Surplus यानी आवश्यक्ता से भी ज्यादा होता है . कृषि मंत्रालय के मुताबिक वर्ष 2018 के दौरान भारत में करीब 2 हज़ार 300 करोड़ किलो प्याज़ का उत्पादन हुआ था . जबकि भारत में प्याज़ की खपत 1500 करोड़ किलो है .

सोचिए जब भारत में ज़रूरत से ज्यादा प्याज़ उगाया जाता है..तो फिर क्या वजह है कि 20 से 30 रुपये प्रति किलो बिकने वाला प्याज़ आज 100 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है . इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है देश की तमाम सरकारों का लचर रवैया . केंद्रीय खाद्य एवं आपूर्ति मंत्रालय के मुताबिक इस साल प्याज़ के उत्पादन में 30 से 40 प्रतिशत की कमी आ सकती है. लेकिन डेढ़ से 2 महीने पहले तक केंद्र सरकार के पास करीब 5 करोड़ किलो प्याज़ का Buffer Stock उपलब्ध था .

यानी ये वो अतिरिक्त प्याज़ था...जिसे भारत के बाज़ारों में उतारा जा सकता था . लेकिन ज्यादातर राज्यों ने इस Buffer Stock में से प्याज़ खरीदने में कोई रूचि नहीं दिखाई . राज्य सरकारें नई फसल के आने का इंतज़ार करती रहीं और अब नई फसल के भी खराब हो जाने की वजह से हालात काबू से बाहर हो गए हैं . केंद्र सरकार के पास जो 5 करोड़ किलो प्याज़ था उसमें से ज्यादातर सड़ गया .

केंद्र सरकार के पास अभी भी 13 लाख किलो प्याज़ उपलब्ध है . लेकिन देश के ज्यादातर राज्य ये प्याज़ खरीदना नहीं चाहते . और इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है Storage का अभाव .खेती के इलाके के हिसाब से दुनिया के मुकाबले भारत में सबसे ज्यादा प्याज़ की फसल उगाई जाती है . यानी भारत चाहे तो आसानी से दुनिया में सबसे ज्यादा प्याज़ उगाने वाला देश बन सकता है . लेकिन खराब रख-रखाव और कृषि की पुरानी तकनीकों की वजह से प्याज़ की पैदावर और सप्लाई कम हो जाती है .

भारत में प्याज़ की 65 प्रतिशत फसल रबी के मौसम में बोई जाती है . जिसे काटने का वक्त मार्च से मई महीने के बीच होता है . लेकिन Council for Agricultural Research के मुताबिक इसमें से 30 से 40 प्रतिशत फसल Storage के दौरान ही खराब हो जाती है . भारत सरकार के कृषि और किसान कल्याण विभाग के मुताबिक सिर्फ 2 प्रतिशत प्याज़ के लिए ही देश में Cold Storage की सुविधा उपलब्ध है.

जबकि बाकी का 98 प्रतिशत प्याज़ भगवान भरोसे खेतों से मंडियों तक पहुंचाया जाता है . Cold Storage की कमी की वजह से ही राज्य सरकारें भी अतिरिक्त प्याज़ नहीं खरीदना चाहतीं . केंद्रीय खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री राम विलास पासवान भी मानते हैं कि प्याज़ के महंगे दामों की असली वजह उत्पादन में आई कमी नहीं है...बल्कि इसकी जड़ में राज्य सरकारों का वो जिद्दी रवैया है..जिसकी वजह से वो केंद्र से प्याज़ नहीं खरीद रहे हैं .

भारत.. प्याज़ का उत्पादन करने के मामले में चीन के बाद दूसरे नंबर पर है . लेकिन मध्य.., पूर्व और दक्षिण एशिया के ज्यादातर देशों को 80 प्रतिशत प्याज़...भारत ही सप्लाई किया करता था . लेकिन अब इसमें तेज़ी से गिरावट आ रही है . पिछले महीने प्याज़ की बढ़ती कीमतों को देखते हुए केंद्र सरकार ने दूसरे देशों को प्याज़ बेचने पर रोक लगा दी थी . और भारत में भी थोक और खुदरा व्यापारियों को एक निश्चित सीमा में ही प्याज़ जमा करने का आदेश दिया गया था.

भारत के इस फैसले के बाद श्रीलंका,नेपाल, मलेशिया, कतर, कुवैत और बांग्लादेश समेत यूरोप के कई देशों में प्याज़ की कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ गई हैं . बांग्लादेश के कई शहरों में तो एक किलो प्याज़ 150 बांग्लादेशी टका की कीमत पर बिक रहा है. भारतीय रूपयों में बात करें तो ये कीमत करीब 125 रुपये बैठती है . पिछले महीने जब बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत आईं थी तब उन्होंने बांग्लादेश में प्याज़ की बढ़ती कीमतों को लेकर दुख ज़ाहिर किया था और कहा था कि इस वजह से अब उन्होंने प्याज़ ख़ाना बंद कर दिया है . आपके शेख हसीना का ये बयान आज एक बार फिर सुनना चाहिए

प्याज़ की बढ़ती कीमतों की एक अहम वजह इसकी जमाखोरी भी है . हालांकि केंद्र सरकार ने प्याज़ की कमी को देखते हुए जमाखोरी पर रोक लगाने की कोशिश की है. सरकार के आदेशों के मुताबिक थोक व्यापारी 50 हज़ार किलो से ज्यादा प्याज़ जमा करके नहीं रख सकते . इसी तरह Retail व्यापारी 10 हज़ार किलो से ज्यादा प्याज़ जमा नहीं कर सकते . लेकिन फिर भी देश के कई राज्यों में प्याज़ की जमाखोरी हो रही है और इस जमाखोरी की वजह से भी प्याज़ की कीमतें नियंत्रण से बाहर हो रही हैं .

आज हमने नई दिल्ली से लेकर महाराष्ट्र के नासिक तक प्याज़ की बढ़ती कीमतों का एक विश्लेषण किया है. हमारी अलग-अलग टीमें किसानों के खेतों तक भी गईं, हमने बिचौलियों से भी बात की और ये पता लगाने की कोशिश की..कि खेत से लेकर Wholesale Market और फिर आपके सब्ज़ी वाले तक पहुंचते-पहुंचते प्याज़ कैसे 5 गुना महंगा हो जाता है.

अब आपको ये भी समझ लेना चाहिए कि किसान के खेत से आपकी रसोई तक पहुंचने वाला प्याज़ सफर के दौरान कैसे महंगा हो जाता है . आज की कीमतों की बात करें तो ज्यादातर किसान 40 से 50 रुपये प्रति किलो के हिसाब से अपना प्याज़ थोक सब्ज़ी मंडियों में बेच रहे हैं . मंडी में बैठे आढ़तिए इसमें करीब 2 प्रतिशत कमीशन जोड़कर इसे 41 से 51 रुपये प्रति किलो की दर पर व्यापारियों को बेच देते हैं . व्यापारी प्याज़ की कीमत में Transportaion Cost और अपना मुनाफा जोड़कर..इसे 50 से 60 रुपये में देश के बाज़ारों में पहुंचा देते हैं . और इसके बाद से ही प्याज़ की कीमत को मनमाने तरीके से बढ़ाने का खेल शुरू होता है. क्योंकि स्थानीय सब्ज़ी वाले और Retail व्यापारी इसे मनमानी कीमत पर बेचने लगते हैं.

यानी जो प्याज़ आपको ज्यादा से ज्यादा 65 रुपये प्रति किलो में मिलना चाहिए वो 80 से 100 रुपये प्रति किलो के बीच बिक रहा है .भारत में प्याज़ की बढ़ती कीमतों को कोई सरकार हलके में नहीं ले सकती . क्योंकि जो सरकार ये गलती करती है..जनता उसे कई बार सबक सिखा देती है . भारत के इतिहास में ऐसा दो बार हो चुका है . पहली बार 1980 में इंदिरा गांधी ने चुनावों के 

दौरान प्याज़ की बढ़ी हुई कीमतों का मुद्दा उठाया था . तब कांग्रेस सत्ता से बाहर थी और देश के प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह थे . इंदिरा गांधी द्वारा चुनाव प्रचार में प्याज़ की एंट्री कराई गई और उनका ये दांव एकदम निशाने पर लगा . क्योंकि कांग्रेस लोकसभा की 67 प्रतिशत सीटें जीतक सत्ता में जबरदस्त वापसी कर ली . इसके बाद वर्ष 1998 में दिल्ली में भी प्याज़ की कीमतें नियंत्रण से बाहर हो गई थी . तब दिल्ली में बीजेपी की सरकार थीं..और मुख्यमंत्री थे साहेब सिंह वर्मा .

इसी दौरान प्याज़ की कीमतें 70 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई जिसके बाद हालात को काबू में करने के लिए सुषमा स्वराज को दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाया गया . मुख्यमंत्री बनते ही सुषमा स्वराज ने कैबिनेट की बैठक में प्याज़ की कीमतें नियंत्रित करने को लेकर फैसला लिया . लेकिन सुषमा स्वराज भी प्याज़ की कीमतों पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं कर पाईं और कांग्रेस ने इसे चुनावी मुद्दा बना लिया . इसके बाद दिसंबर 1998 में जब चुनाव हुए तो बीजेपी दिल्ली में 49 सीटों से सीधे 15 सीटों पर आ गई और कांग्रेस 14 सीटों से 52 सीटों पर पहुंच गई . बीजेपी की हार और कांग्रेस की जीत के पीछे प्याज़ की बढ़ी हुई कीमतों को सबसे बड़ी वजह माना गया .