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सड़कों पर होने वाली 'ध्वनि हिंसा' का विश्लेषण, शोर मचाना ताकत दिखाने का ज़रिया बनता जा रहा

सड़क को अपनी विरासत समझने वाले लोग जब बार-बार Horn बजाते हैं, और Horn बजाकर सामने वाले को रास्ते से हट जाने की धमकी देते हैं.

सड़कों पर होने वाली 'ध्वनि हिंसा' का विश्लेषण, शोर मचाना ताकत दिखाने का ज़रिया बनता जा रहा

अन्य विषयों की ही तरह, महात्मा गांधी ने पर्यावरण की समस्या को भी उस वक्त समझ लिया था, जब ये चिंता का बड़ा विषय नहीं था. और अगर दुनिया ने पर्यावरण के मुद्दे पर बापू के विचारों को समझने की कोशिश की होती, तो आज इतना प्रदूषण ना फैलता. ध्वनि प्रदूषण को आज हम ''ध्वनि हिंसा'' का नाम दे रहे हैं. क्योंकि इसने हमारे समाज को असहनशील बना दिया है. इस असहनशीलता की तस्वीरें प्रतिदिन देश की सड़कों पर दिखाई देती हैं. सड़क को अपनी विरासत समझने वाले लोग जब बार-बार Horn बजाते हैं, और Horn बजाकर सामने वाले को रास्ते से हट जाने की धमकी देते हैं. तब वो वैचारिक हिंसा को ही बढ़ावा देते हैं.

अमेरिका के मशहूर आविष्कारक Thomas Alva Edison के Right-Hand कहे जाने वाले Electrical Engineer, Miller Hutchison (मिलर हच्चीसन) ने आज से क़रीब 111 वर्ष पहले Electro-Mechanical Horn का Patent कराया था. उन्होंने Horn का आविष्कार ज़रुरत के लिए किया था. लेकिन आज वही Horn, ध्वनि हिंसा का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है.

इसलिए समय की मांग यही है, कि आज महात्मा गांधी को याद करते हुए, सड़क पर Horn वाली हिंसा के खिलाफ सत्याग्रह छेड़ा जाए. और इस सत्याग्रह की शुरुआत हम करेंगे. आप देश के किसी भी हिस्से में क्यों ना रहते हों, शोर और ध्वनि प्रदूषण साये की तरह आपका पीछा करता है. हमारे देश में लोग सड़कों पर बिना वजह गाड़ी का Horn और Pressure Horn बजाते हैं. और ऐसा करके वो शांति पसंद लोगों की जिंदगी में शोर का ज़हर घोलते हैं. हालात ये हो गए हैं कि महानगरों में ध्वनि प्रदूषण एक बड़ी समस्या बन गया है.

वर्ष 2017 में Central Pollution Control Board ने तेज़, चुभने वाले और डरावने Car Horns पर प्रतिबंध लगा दिया था. लेकिन आज भी कई लोगों ने अपनी गाड़ी में इस तरह के Horn लगा रखे हैं. 2017 में ही CPCB ने एक रिपोर्ट जारी की थी. जिसमें कहा गया था, कि शोर फैलाने वाले शहरों की सूची में दिल्ली पहले स्थान पर है. कोलकाता दूसरे, बैंगलुरु तीसरे और चेन्नई चौथे स्थान पर है.

बार-बार गाड़ी का Horn या Pressure Horn बजाना लोगों के लिए फैशन का विषय हो सकता है. लेकिन उन्हें ये नहीं मालूम कि ये भी एक तरह की हिंसा है और Horn वाली ये हिंसा लगातार बढ़ती ही जा रही है. World Health Organisation के मुताबिक इस वक्त पूरी दुनिया में 46 करोड़ से ज़्यादा लोगों को सुनने में परेशानी होती है. इनमें से 3 करोड़ से ज़्यादा बच्चे हैं. अनुमान के मुताबिक, वर्ष 2050 तक पूरी दुनिया में ऐसे लोगों की संख्या 90 करोड़ हो जाएगी. यानी हर 10 में से 1 व्यक्ति को सुनने में परेशानी होगी और इसकी एक बड़ी वजह ध्वनि प्रदूषण है.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में हर 4 में से 1 व्यक्ति सुनने की क्षमता वक्त से पहले खो देता है. मुंबई में हर 10 में से 4 ट्रैफिक पुलिसकर्मी ठीक से सुन नहीं पाते क्योंकि वो पूरे दिन ट्रैफिक के शोर के बीच काम करते हैं. चेन्नई में जब राह चलते लोगों के बीच एक सर्वे किया गया तो पता लगा, कि 15 में से 1 व्यक्ति ध्वनि प्रदूषण की वजह से ठीक से सुन नहीं पाता है. कोलकाता में लोगों के बीच गए Survey में ये बात पता लगी, कि हर 13 में से 1 व्यक्ति ध्वनि प्रदूषण की वजह से बीमार महसूस करता है. बिना वजह Horn बजाने की आदत ध्वनि प्रदूषण को बढ़ावा देती है.

दिन में एक निश्चित अवधि के दौरान Honking यानी Horn बजाने की आदत पर जब एक सर्वे किया गया तो पता चला, कि दिन के एक ख़ास हिस्से में ही दिल्ली में औसतन 1 लाख 30 हज़ार बार Horn बजाया गया. इसी अवधि में मुंबई में 2 लाख बार Horn बजाया गया, कोलकाता में 1 लाख 7 हज़ार बार और चेन्नई में करीब 90 हज़ार बार, Horn बजाया गया.

इसी वर्ष अगस्त के महीने में कोलकाता ट्रैफिक पुलिस ने 9 दिनों के अंदर साढ़े आठ हज़ार लोगों का चालान काटा. क्योंकि, ये सभी लोग गाड़ी चलाते वक्त बिना किसी कारण के Honking कर रहे थे. कुल मिलाकर ऐसा लग रहा है, कि हमारे शहरों में शोर मचाना ताकत दिखाने का ज़रिया बनता जा रहा है. ऐसे में सवाल ये है, कि क्या 80 डेसिबल से ज्यादा शोर करने वाले वाहनों को सड़कों पर चलने का अधिकार मिलना चाहिए? आज हमने इसी पैमाने पर दिल्ली से लेकर New York तक सड़कों वाली रिपोर्टिंग की है. भारत की तरह अमेरिका में भी बड़ी संख्या में गाड़ियां हैं उसे चलाने वाले लोग हैं. लेकिन भारत की तरह अमेरिका में एक चीज़ नहीं है और वो है Honking.