Zee Jaankari: क्या एक लड़ाकू विमान का भी धर्म हो सकता है?

हमारे देश में नफरत की राजनीति करने वाले लोग...खाने को, पर्यावरण को, कपड़ों को...और अलग अलग रंगों को भी धर्म से जोड़कर देखते हैं. धर्म की राजनीति करने वाले अब नए रसातल में गिर गए हैं . क्योंकि अब वो देश की रक्षा करने वाले हथियारों को भी धर्म से जोड़ने लगे हैं . 

Zee Jaankari: क्या एक लड़ाकू विमान का भी धर्म हो सकता है?

आज हम सबसे पहले धर्म को हथियार बनाकर. भारत को तोड़ने का सपना देखने वालों का एक DNA टेस्ट करेंगे . हमारे देश में नफरत की राजनीति करने वाले लोग...खाने को, पर्यावरण को, कपड़ों को...और अलग अलग रंगों को भी धर्म से जोड़कर देखते हैं. धर्म की राजनीति करने वाले अब नए रसातल में गिर गए हैं . क्योंकि अब वो देश की रक्षा करने वाले हथियारों को भी धर्म से जोड़ने लगे हैं . इन लोगों के लिए धर्म भी एक शस्त्र की तरह है ये लोग इस शस्त्र को धारदार बनाने में जुटे हुए हैं और इन्हें इस शस्त्र की पूजा करते हुए बिल्कुल भी संकोच नहीं होता है.

लेकिन जब कोई देश की रक्षा करने वाले शस्त्र की पूजा करता है..तो इन्हें परेशानी होने लगती है. कल विजया-दशमी के मौके पर भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने फ्रांस में रफाल लड़ाकू विमान की शस्त्र पूजा की . उन्होंने रफाल पर ओम का चिन्ह अंकित किया और रक्षा सूत्र भी बांधा. इस दौरान विमान पर एक नारियल भी रखा गया और पहियों के आगे नींबू भी रखे गए .

ये सब इसलिए किया गया...क्योंकि हिंदू धर्म में विजया-दशमी के दिन शस्त्रों की पूजा करने की परंपरा है . लेकिन अब कांग्रेस के कुछ नेताओं को लगता है कि रफाल की शस्त्र पूजा सांप्रदायिकता की निशानी है. तो कुछ नेता इसे तमाशा कह रहे हैं. कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने कहा है कि सरकार रफाल की शस्त्र पूजा के नाम पर तमाशा कर रही है.

जबकि कांग्रेस के ही एक बड़े नेता मल्लिकार्जुन खड़गे कह रहे हैं कि रफाल की शस्त्र पूजा एक तरह का दिखावा है और इससे लोगों का भावनात्मक शोषण किया जा रहा है. खड़गे सिर्फ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नहीं है बल्कि वो 2014 से 2019 तक लोकसभा में कांग्रेस के नेता भी रहे हैं. सबसे पहले आप कांग्रेस के इन नेताओं के ये बयान सुनिए..

फिर हम ये समझने की कोशिश करेंगे कि क्या देश की रक्षा करने वाले एक लड़ाकू विमान का भी कोई धर्म हो सकता है  ?हिंदू धर्म में चार पुरुषार्थ का उल्लेख किया जाता है . पुरुषार्थ का अर्थ वो उद्देश्य हैं जिन्हें पूरा करने के लिए मनुष्य को अपना जीवन समर्पित कर देना चाहिए. ये चार पुरुषार्थ हैं. धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष...

शस्त्र पूजन का विधान धर्म की रक्षा से जुड़ा है. और एक सैनिक के लिए अपने देश और अपनी मातृभूमि की रक्षा करने से बड़ा कोई धर्म नहीं होता और इस लड़ाई में उसका साथ अस्त्र और शस्त्र ही देते हैं. इसलिए रफाल की शस्त्र पूजा किसी धर्म विशेष से नहीं बल्कि देश की एकता और अखंडता से जुड़ी है. लेकिन हमारे देश में कांग्रेस जैसी राजनीतिक पार्टियां, अंग्रेज़ी बोलने वाले सेलिब्रिटिज़ और डिजाइनर पत्रकार..

.देश के पराक्रम को भी धार्मिक रंग देने की कोशिश कर रहे हैं. आज गृहमंत्री अमित शाह ने भी हरियाणा में एक रैली के दौरान कहा कि कांग्रेस को दूसरे देशों की संस्कृति के बारे में तो पता है. लेकिन वो अपने ही देश की संस्कृति को भूल गई है. हमारे देश में हिंदू धर्म को मानने वाले लोग जब नई गाड़ी खरीदते हैं, तो उसपर ओम का चिह्न बनाते हैं, नारियल फोड़ते हैं.

मंदिर भी जाते हैं...लेकिन तब कोई उन्हें सांप्रदायिक नहीं कहता . इसी तरह गाड़ियों को देखकर कई बार ये पता चल जाता है कि ये गाड़ी किसी मुस्लिम की है, या किसी सिख की है. गाड़ियों पर 786 और वाहे गुरू जैसे शब्द लिखवाना बहुत आम बात है. लेकिन सड़क पर कोई किसी को रोककर ये नहीं पूछता कि क्या आप सांप्रदायिक हैं. कोई इन धार्मिक चिन्हों का विरोध नहीं करता और किया भी नहीं जाना चाहिए.

लेकिन नेताओं को एक लड़ाकू विमान पर ओम लिखने से दिक्कत हो जाती है. क्योंकि उनकी राजनीतिक गाड़ी...धर्म वाले ईंधन से ही चलती है . हिंदू अपनी गाड़ियों पर जातियां भी लिख देते हैं. हालांकि ये चिन्ह कई बार शक्ति प्रदर्शन का माध्यम भी बन जाते हैं. लेकिन इन सबसे भी किसी को कोई परेशानी नहीं होती जबकि देश की रक्षा करने वाले हथियारों को धर्म से जोड़ा जा रहा है.

जो कांग्रेस कल राष्ट्रवाद की ट्रेनिंग की बात कर रही थी...उसे आज देश के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से डर लग रहा है . ये कांग्रेस का दोहरा मापदंड है. यही वजह है कि खुद कांग्रेस के नेता अब कहने लगे हैं कि उनकी पार्टी को आत्म-विश्लेषण की जरूरत है. रफाल लड़ाकू विमान पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जिस ओम के चिन्ह को अंकित किया, वो हिंदू संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान है.

हिंदू सिर्फ एक धर्म नहीं है..बल्कि जीवन जीने का तरीका है. और ओम का इतिहास हिंदू धर्म से भी पुराना है. उपनिषदों में कहा गया है कि जब ब्रह्मांड की उतपत्ति हुई तो उस दौरान एक ध्वनि पैदा हुई जिसे विज्ञान की भाषा में Vibration कहा जाता है. इस Vibraton यानी कंपन की ध्वनि को ही ओम कहा गया. सृष्टि के निर्माण के वक्त पैदा होने वाली ये ध्वनि ही ओम की ध्वनि थी. छंदोग्य उपनिषद में कहा गया है कि ओम ही ब्रह्म है.

यानी ये ब्रह्मांड के निर्माण का सूचक है. वर्ष 2008 में दो भारतीय वैज्ञानिकों ने International Journal of Computer Science and Network Security नामक साइंस Journal में ओम को लेकर एक रिसर्च प्रकाशित की थी . इस रिसर्च का शीर्षक था Time-Frequency Analysis of Chanting Sanskrit Divine Sound "OM", शोध के दौरान Researchers ने पता लगाया कि ओम के उच्चारण मात्र से मन में गहरी शांति उतरती है और मानसिक तनाव में कमी आती है.

यानी ओम के महत्व का आध्यात्मिक ही नहीं. वैज्ञानिक आधार भी है . इसलिए हमें लगता है कि ओम जैसे आध्य़ात्मिक चिन्ह का विरोध करने वाले कांग्रेस के नेताओं, बुद्धिजीवियों और डिजाइनर पत्रकारों को भी ओम का उच्चारण करके.

अपने मन को शांत करना चाहिए और अपनी ऊर्जा को देश के विरोध में नहीं बल्कि देश के हित में खर्च करना चाहिए . कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा था कि कुछ लोगों को ओम और गाय शब्द सुनते ही बेचैनी होने लगती है. और ऐसे लोग इसे भारत के पिछड़ेपन से जोड़ लेते हैं. यानी जो बातें भारतीय संस्कृति की पहचान है उसे कुछ लोग बदनाम करने की साजिश कर रहे हैं.